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हैदराबाद में रामानुजाचार्य की 216 फीट ऊंची मूर्ति का अनावरण करेंगे पीएम मोदी, जानें कौन हैं संत

पांच फरवरी को पीएम मोदी द्वारा 216 फीट की मूर्ति का अनावरण करने के बाद राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद अंदरुनी कमरे का उद्घाटन 13 फरवरी को करेंगे।

Sant Ramanujacharya, PM Modi
वैष्णव संत रामानुजाचार्य की मूर्ति(फोटो सोर्स: ट्विटर)।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आगामी 5 फरवरी को हैदराबाद में रामानुजाचार्य की 216 फीट ऊंची प्रतिमा का अनावरण करेंगे। बता दें कि रामानुजाचार्य 11वीं सदी के संत और समाज सुधारक थे। उनकी 216 फीट ऊंची प्रतिमा को ‘स्टैच्यू ऑफ इक्वैलिटी’ नाम दिया गया है। 45 एकड़ में बनी यह प्रतिमा हैदराबाद के बाहरी इलाके शमशाबाद में स्थित है।

रामानुज सहस्राब्दी समारोहम: अनावरण कार्यक्रम के आयोजकों ने बताया कि पीएम मोदी पांच फरवरी को इस प्रतिमा को दुनिया को समर्पित करेंगे। रामानुजाचार्य की 1,000वीं जयंती उत्सव के मौके पर सामूहिक मंत्र-जाप जैसी अन्य आध्यात्मिक गतिविधियों का आयोजन किया जायेगा। जोकि दो फरवरी से शुरू होगा। आयोजन को रामानुज सहस्राब्दी समारोहम नाम दिया गया है।

जानकारी के मुताबिक आध्यात्मिक गुरु चिन्ना जियार स्वामी इस आयोजन के सहआयोजक की भूमिका में होंगे। इसके अलाव कई अन्य राज्यों के सीएम, नेता और सेलिब्रिटी भी इस कार्यक्रम में शामिल होंगे। बता दें कि एक हजार करोड़ रुपये के इस प्रोजेक्ट को सिर्फ भक्तों द्वारा दिए गए दान से ही पूरा किया गया है।

13 फरवरी को राष्ट्रपति भी पहुंचेंगे: इस मंदिर में श्री रामानुजाचार्य की दो मूर्तियां होंगी। दोनों की ही बनावट अलग होगी। जिसमें पहली मूर्ति अष्टधातु की और 216 फीट ऊंची है। तो तो दूसरी मंदिर के गर्भगृह में स्थापित की जाएगी। जो संत के 120 सालों की यात्रा की याद में 120 किलो सोने से निर्मित की गई है। बता दें पांच फरवरी को पीएम मोदी द्वारा 216 फीट की मूर्ति का अनावरण करने के बाद राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद अंदरुनी कमरे का उद्घाटन 13 फरवरी को करेंगे।

कौन थे संत रामानुजाचार्य: वैष्णव संत रामानुजाचार्य का जन्म सन 1017 में तमिलनाड़ु में श्रीपेरंबदूर गांव में तमिल ब्राह्मण परिवार में हुआ था। हुआ था। उन्होंने अलवार यमुनाचार्य से कांची में दीक्षा ली थी। श्रीरंगम के यतिराज नाम के संन्यासी से उन्होंने संन्यास ग्रहण करने की की दीक्षा ली। इसके बाद उन्होंने भारत भर में घूमकर वेदांत और वैष्णव धर्म का प्रचार प्रसार किया।

इस दौरान उन्होंने कई संस्कृत ग्रंथों की भी रचना की। उनकी रचनाओं में श्रीभाष्यम् और वेदांत संग्रह अधिक प्रसिद्ध ग्रंथ हैं। वर्ष 1137 में श्रीरंगम में रामानुजाचार्य ने 120 साल की आयु में अपना देह त्याग दिया था।

मंदिर के जरिए उन्हें श्रद्धाजंलि: समाज में उन्होंने समानता का संदेश दिया। हालांकि माना जाता है कि उन्हें समाज में वो स्थान नहीं मिल सका जिसके वो हकदार हैं। ऐसे में इस मंदिर के जरिए उन्हें श्रद्धाजंलि दी जाएगी और उनके द्वारा किये गये कार्यों को लोगों तक पहुंचाया जाएगा।

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