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कितने किसानों ने की आत्महत्या, दो साल से सरकार ने नहीं जारी किया आंकड़ा

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) ने 2016 और 2017 के किसानों की आत्महत्या के आंकड़े जारी नहीं किए हैं। एनसीआरबी की वेबसाइट पर प्राप्त जानकारी के मुताबिक किसानों की आत्महत्या से संबंधित पिछले आंकड़े 2015 तक के उपलब्ध हैं।

तस्वीर का इस्तेमाल प्रतीक के तौर पर किया गया है। (पीटीआई फाइल फोटो)

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) ने 2016 और 2017 के किसानों की आत्महत्या के आंकड़े जारी नहीं किए हैं। एनसीआरबी की वेबसाइट पर प्राप्त जानकारी के मुताबिक किसानों की आत्महत्या से संबंधित पिछले आंकड़े 2015 तक के उपलब्ध हैं। दो वर्षों में किसानों की आत्महत्या के आंकड़े प्रकाशित न होने पर सरकारी अधिकारियों ने बताया है कि कुछ राज्यों के द्वारा भेजे गए डेटा में गड़बड़ देरी की वजह बनी है। एनसीआरबी को पूरे देश में किसान आत्महत्या पर डेटा इकट्ठा करने और उसे संक्षेप में पेश करने की जिम्मेदारी सौंपी गई है। ब्यूरो इस डेटा को भारत में दुर्घटनाओं में मौत और आत्महत्या नाम की वार्षिक रिपोर्ट में प्रकाशित करता है। प्रत्येक वर्ष के लिए डेटा अगले वर्ष की रिपोर्ट में प्रकाशित किया जाता है। ब्यूरो ने 2015 की रिपोर्ट से पहली बार एक अलग सेक्शन के रूप में किसान आत्महत्या डेटा प्रकाशित करना शुरू किया था। एनसीआरबी डेटा के मुताबिक 2015 में 8007 किसानों और 4595 खेती-किसानी में लगे मजदूरों ने आत्महत्या की थी।

इसके पहले के साल में 5650 किसानों और 6710  कृषि मजदूरों ने आत्महत्या की थी। इसके बाद ब्यूरो ने कोई रिपोर्ट प्रकाशित नहीं की, इसका मतलब है कि 2016 और 2017 में किसानों की आत्महत्या और किसानों के बड़े आंदोलनों को सरकारी डेटा में जगह नहीं मिली। हालांकि इस साल की शुरुआत में किसान आत्महत्या के 2016 के आंकड़ों का संसद में हवाला दिया गया था। बजट सत्र में गृह मंत्रालय ने संसद में बताया था कि 2016 के किसान आत्महत्या के आंकड़ों को संकलित करना अभी बाकी है। कुछ दिनों के बाद गृहमंत्रालय ने 2016 में किसान आत्महत्या पर एक अस्थायी रिपोर्ट पेश की थी, जिसमें कहा गया था कि 6351 किसानों और 5019 कृषि मजदूरों मे आत्महत्या की। अस्थाई रिपोर्ट में आत्महत्या के कारणों के बारे में बात नहीं की गई थी।

पूर्व में किसान आत्महत्या के आंकड़ों की सही से रिपोर्ट तैयार न करने को लेकर ब्यूरो की आलोचना हो चुकी है। आलोचकों ने 2014 से ऐसी मौतों की गिनती की पद्धति में बदलाव पर एनसीआरबी को दोषी ठहराया था। एनसीआरबी के एक वरिष्ठ अधिकारी ने स्क्रॉल को बताया कि पश्चिम बंगाल और बिहार में 2016 में किसानों की आत्महत्या की रिपोर्ट में एक भी मामला नहीं सामने नहीं आया है। कुछ राज्यों में आंकड़े असामान्य रूप से ज्यादा तो कुछ में असामान्य रुप से कम बताए गए हैं। अधिकारी ने बताया कि ब्यूरो ने इन राज्यों को नोटिस भेजा है कि वे उनकी संख्या की त्वरित समीक्षा करें। एनसीआरबी के निदेशक इश कुमार ने डेटा में देरी के कारणों पर स्पष्ट जवाब नहीं दिया है। उन्होंने कहा कि डेटा जांच के अधीन है और रिपोर्ट जून के आखिर में प्रकाशित होने की संभावना है।

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