NCRB Data on Indian Jail: राष्ट्रीय अपराध अभिलेख ब्यूरो यानी NCRB ने प्रिजन इन इंडिया 2024 नाम से एक रिपोर्ट जारी की है, जिसमें भारतीय जेलों के भीतर महत्वपूर्ण बदलावों के संकेत मिल रहे हैं। जेलों के जनसांख्यिकी के आंकड़े बताते हैं कि पिछले दो दशकों में जेल की डेमोग्राफी में मुसलमानों, अनुसूचित जातियों (SC) और अनुसूचित जनसजातियों (ST) की संख्या तेजी से घटा है।

हालांकि, ऐतिहासिक रूप से राष्ट्रीय जनसंख्या में इन समुदायों का प्रतिनिधित्व उनके हिस्से के सापेक्ष अधिक रहा है, लेकिन 2024 के नवीनतम आंकड़े बताते हैं कि दोषियों और विचाराधीन कैदियों दोनों में उनका अनुपात दो दशकों से अधिक समय में अपने सबसे निचले स्तर पर आ गया है।

मुसलमानों की क्या है स्थिति?

भारत की जनसंख्या में मुसलमानों की हिस्सेदारी 14.2 प्रतिशत है और वर्ष 2003 में विचाराधीन कैदियों में उनकी हिस्सेदारी 23.04 प्रतिशत थी। 2024 तक यह घटकर 18.81 प्रतिशत रह गई। इसी प्रकार दोषियों में उनकी हिस्सेदारी 2003 में 18.91 प्रतिशत से घटकर 2024 में 15.9 प्रतिशत हो गई। जेलों में बंद कैदियों की संख्या के एक दशक लंबे विश्लेषण से पता चलता है कि जेलों में मुसलमानों के आनुपातिक प्रतिनिधित्व में धीरे-धीरे गिरावट आई है, जबकि 2013 के बाद से कैदियों की कुल संख्या में तेजी से वृद्धि हुई है।

एनसीआरबी की जेल सांख्यिकी भारत 2024 रिपोर्ट के अनुसार 2013 में देश के 1,29,608 दोषियों में से 22,145 मुस्लिम थे, जो कुल दोषियों की संख्या का 17.08 प्रतिशत थे। 2024 तक, दोषियों की कुल संख्या बढ़कर 1,36,138 हो गई लेकिन मुस्लिम दोषियों की संख्या में मामूली गिरावट आई और यह घटकर 21,640 रह गई, जिससे उनका हिस्सा 15.9 प्रतिशत हो गया।

विचाराधीन कैदियों की बात करें तो उसमें भी रुझान कुछ ऐसा ही है। 2013 में भारत के 2,78,503 विचाराधीन कैदियों में से 57,936 मुस्लिम थे, जो कुल विचाराधीन कैदियों की संख्या का 20.8 प्रतिशत थे। 2024 तक हालांकि मुस्लिम विचाराधीन कैदियों की संख्या बढ़कर 69,864 हो गई थी, लेकिन कुल विचाराधीन कैदियों की संख्या बढ़कर 3,71,440 हो जाने के कारण उनकी हिस्सेदारी घटकर 18.81 प्रतिशत रह गई।

आंकड़ों से पता चलता है कि यद्यपि मुस्लिम कैदियों की संख्या पूर्ण रूप से स्थिर रही है या उसमें मामूली वृद्धि हुई है, लेकिन उनकी वृद्धि पिछले दशक में भारत की जेल आबादी में हुई तीव्र वृद्धि के साथ तालमेल नहीं बिठा पाई है।

मुस्लिमों को गलत तरीके से फंसाने का उठा था मुद्दा

बता दें कि देश कुल जनसंख्या में मुसलमानों की संख्या 14.2 प्रतिशत है लेकिन जेलों में उनकी अधिक संख्या को लेकर लंबे समय से चिंताएं जताई जाती रही हैं। एक समय तो देश में विचाराधीन कैदियों में मुसलमानों की संख्या लगभग 24.72 प्रतिशत थी। इस मुद्दे ने पहले राजनीतिक हस्तक्षेप को जन्म दिया था। 2013 में तत्कालीन केंद्रीय गृह मंत्री सुशील कुमार शिंदे ने राज्य सरकारों को पत्र लिखकर यह सुनिश्चित करने का आग्रह किया था कि निर्दोष मुस्लिम युवाओं को गलत तरीके से गिरफ्तार न किया जाए।

आंकड़ों से क्षेत्रीय स्तर पर महत्वपूर्ण भिन्नताएं भी सामने आती हैं। 2024 में उत्तर प्रदेश में सबसे अधिक 5,818 मुस्लिम कैदी दर्ज किए गए, उसके बाद मध्य प्रदेश में 2,378 और पश्चिम बंगाल में 1,836 कैदी थे। विचाराधीन कैदियों में भी उत्तर प्रदेश में सबसे अधिक 16,471 मुस्लिम कैदी थे, उसके बाद पश्चिम बंगाल में 8,423 और बिहार में 6,685 कैदी थे।

राष्ट्रीय जेल आंकड़ों के विश्लेषण में एक प्रमुख खामी यह है कि महाराष्ट्र से 2022, 2023 और 2024 के लिए धर्म के आधार पर विचाराधीन कैदियों के आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं। महाराष्ट्र की जेलों में सबसे ज्यादा कैदी है। वहा 2024 में अपने 31,523 विचाराधीन कैदियों का धार्मिक डेटा नहीं दिया है। ऐतिहासिक रूप से राज्य में मुस्लिम विचाराधीन कैदियों की संख्या अधिक रही है – 2013 में 6,182, जो उस समय देश में दूसरी सबसे अधिक संख्या थी।

जम्मू-कश्मीर, असम और बंगाल में मुस्लिम ज्यादा

साल 2024 में जम्मू और कश्मीर में मुस्लिम कैदियों का अनुपात सबसे अधिक था, जहां सभी दोषियों में मुसलमानों की हिस्सेदारी 59.41 प्रतिशत थी। पश्चिम बंगाल और असम का भी यही हाल था, जहां दोनों राज्यों में दोषियों में मुसलमानों की हिस्सेदारी 37 प्रतिशत से अधिक थी। केरल में मुस्लिम दोषियों की हिस्सेदारी 25.66 प्रतिशत थी, जबकि महाराष्ट्र और दिल्ली में यह हिस्सेदारी 23 प्रतिशत से अधिक थी।

विचाराधीन कैदियों में जम्मू और कश्मीर में 68.65 प्रतिशत और असम में 50 प्रतिशत से अधिक मुस्लिम कैदी थे। पश्चिम बंगाल में मुस्लिम विचाराधीन कैदियों की हिस्सेदारी 41.5 प्रतिशत थी जबकि केरल, उत्तर प्रदेश और दिल्ली में भी यह अनुपात काफी अधिक था।

अनुसूचित जातियों (SC) की क्या है स्थिति

देश की कुल आबादी में 16.6 प्रतिशत हिस्सा अनुसूचित जाति के लोगों का बताया जाता है और वर्ष 2003 में विचाराधीन कैदियों में उनकी हिस्सेदारी 22.37 प्रतिशत थी। 2024 तक यह हिस्सेदारी घटकर 16.62 प्रतिशत रह गई, जो सामान्य जनसंख्या में उनकी हिस्सेदारी के लगभग बराबर है। दोषियों में भी उनकी हिस्सेदारी 2003 के 20.72 प्रतिशत से घटकर 2024 में 18.42 प्रतिशत हो गई है।

लगभग एक दशक तक जेलों में अनुसूचित जाति के कैदियों की संख्या लगातार शीर्ष में रही थी। 2013 में यह अपने चरम पर पहुंच गई, जब राष्ट्रीय स्तर पर सभी कैदियों में अनुसूचित जाति के कैदियों की संख्या 22.47 प्रतिशत पर , लेकिन उसके बाद से लगातार उनकी संख्या में कमी आती जा रही है।

अनुसूचित जनजाति (ST) के कैदियों की संख्या भी घटी

आबादी में अनुसूचित जनजाति के लोगों की हिस्सेदारी 8.6 प्रतिशत तक है और पिछले दो दशकों में जेलों में इनकी संख्या में भी गिरावट देखी गई है। साल 2003 में विचाराधीन कैदियों में अनुसूचित जनजातियों (एसटी) का हिस्सा 14.25 प्रतिशत था, जो 2024 में घटकर 9.19 प्रतिशत हो गया।

वहीं दोषियों में उनके हिस्से की बात करें तो 2003 में यह संख्या 15.95 प्रतिशत थी, जो कि दो दशक बाद घटकर 2024 में 12.29 प्रतिशत है। एससी जाति के कैदियों के विपरीत अनुसूचित जनजातियों (एसटी) की उपस्थिति में वर्षों से अधिक क्रमिक लेकिन निरंतर गिरावट देखी गई है।

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