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शहीदों के बच्चों की स्कूल फीस हो माफः एनसीपीसीआर

राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (एनसीपीसीआर) ने सभी राज्यों के मुख्य सचिवों को पत्र लिखकर अनुशंसा की है कि शहीदों के बच्चों को मुफ्त एवं अनिवार्य शिक्षा अधिनियम 2009 के प्रावधानों के अनुरूप निजी स्कूलों की फीस माफ करवाई जाए।

Author नई दिल्ली | September 23, 2016 00:54 am
(Photo-PTI)

राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (एनसीपीसीआर) ने सभी राज्यों के मुख्य सचिवों को पत्र लिखकर अनुशंसा की है कि शहीदों के बच्चों को मुफ्त एवं अनिवार्य शिक्षा अधिनियम 2009 के प्रावधानों के अनुरूप निजी स्कूलों की फीस माफ करवाई जाए। आयोग ने यह पत्र बुधवार को हाल ही में उड़ी में शहीद हुए जवानों के मद्देनजर लिखा है, लेकिन इसे एक नियम के तौर पर हमेशा के लिए लागू करने की अनुशंसा की गई है।

आयोग के शिक्षा सदस्य प्रियंक कानूनगो ने कहा, ‘समस्त राज्यों के मुख्य सचिवों को पत्र लिखकर शहीदों के बच्चों को मुफ्त एवं अनिवार्य शिक्षा अधिनियम 2009 की धारा 2 डी एवं ई के तहत निजी स्कूलों की फीस माफ करवाने की अनुसंशा की है। साथ ही इन बच्चों को निजी स्कूलों में दाखिले के लिए वही मापदंड लागू करने को कहा है जो वंचित वर्ग के बच्चों के लिए लागू है’। कानूनगो ने कहा कि अधिनियम के अंतर्गत वंचित वर्ग का निर्धारण करने का अधिकार राज्य सरकारों को है, ऐसे में राज्य सरकारें शहीदों के बच्चों को इस वर्ग में डाल सकती हैं। उन्होंने कहा कि जिस दिन भी कोई शहीद होता है उस दिन से उसके बच्चों की फीस माफ होनी चाहिए, साथ ही शहीदों के बच्चों का निजी स्कूलों में दाखिले में भी वंचित वर्ग से संबंधित नियम लागू किया जाना चाहिए। शहीदों में सभी वर्दीधारी चाहे वे सेना, अर्द्धसैनिक बल या पुलिस हो सभी आएंगे।

प्रियंक कानूनगो ने अपने पत्र में उन बच्चों को भी शामिल किए जाने की बात कही है जिनके परिवार के कमाने वाले सदस्य की मौत हो चुकी है क्योंकि ऐसे बच्चों की काफी दर्दनाक कहानियां सामने आई हैं। कानूनगो ने कहा, ‘स्कूल कोई लाभ की संस्था नहीं है और उन्हें बच्चों के प्रति यह जिम्मेदारी निभानी चाहिए। अभी राज्यों के सर्व शिक्षा अभियान के बजट का जो 20 फीसद मुफ्त एवं अनिवार्य शिक्षा के लिए है वह खर्च नहीं हो पा रहा है क्योंकि निजी स्कूलों में इसका पालन नहीं हो रहा है’। एनसीपीसीआर सदस्य ने कहा कि निजी स्कूलों में आरटीई एक्ट लागू करने में उत्तर प्रदेश सबसे पीछे है जहां पिछले सत्र में पूरे राज्य में मात्र 180 दाखिले लिए गए हैं, जबकि मध्य प्रदेश और राजस्थान सबसे आगे हैं।

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