यारों के यारः तेरी महफिल में हम न होंगे

फैज, जफर और गालिब के लिए डीपीटी सबके पसंदीदा थे, यारों के यार थे। लेकिन डीपीटी जो थे वह उनके संसद में अंतिम भाषण में गौर करने लायक है। अपने विदाई भाषण में उन्होंने सवाल उठाया कि संसद में महिलाओं की भागीदारी अभी तक सिर्फ 11.7 फीसद क्यों है। पिछली बार वैसा कब हुआ जब संसद ने गरिमामयी तरीके से सेक्स पर संवाद किया।

राज्सयसभा में डीपीटी जब बोलने के लिए उठते थे तो बहादुरशाह जफर से शुरू होकर कालिदास के रघुवंश को उद्धृत करते। मजबूत आवाज में संस्कृत के सर्ग से लेकर फैज के शेरों के साथ बात करने वाले नेता थे।

देवीप्रसाद त्रिपाठी 29 नवंबर 1952-2 जनवरी 2020

‘देशभक्ति मक्कारों की आखिरी शरणस्थली है’। नफरत और हिंसा की राजनीति के खिलाफ जब साहित्यकारों ने पुरस्कार वापसी की और सरकार ने इसे ‘कागजी क्रांति’ कह खारिज कर दिया तो संसद में कागज और कलम की ताकत बताने वाले ‘डीपीटी’ ने ये बातें कही थीं। संसद में स्वीडिश कवि को उद्धृत करते हुए कहा था कि सच को किसी साज-शृंगार की जरूरत नहीं होती है, वह हमेशा नंगा होता है। त्रिपाठी (67) का लंबी बीमारी के बाद गुरुवार को नई दिल्ली में निधन हो गया। वे कैंसर से पीड़ित थे। उनका अंतिम संस्कार शुक्रवार को नई दिल्ली स्थित लोदी रोड शवदाह गृह में होगा। त्रिपाठी लंबे समय से बीमार थे लेकिन सामने से हाल-चाल पूछते ही बोल पड़ते थे, ‘उनके देखे से जो आ जाती है मुंह पे रौनक वो समझते हैं कि बीमार का हाल अच्छा है’। उनके जाने के बाद उनसे मोहब्त करने वालों के कानों में ये आवाज गूंज रही होगी जो त्रिपाठी अक्सर बोलते थे, ‘मोहब्बत करने वाले कम न होंगे, तेरी महफिल में हम न होंगे’।

राज्सयसभा में डीपीटी जब बोलने के लिए उठते थे तो बहादुरशाह जफर से शुरू होकर कालिदास के रघुवंश को उद्धृत करते। मजबूत आवाज में संस्कृत के सर्ग से लेकर फैज के शेरों के साथ बात करने वाले नेता थे। 1968 में दसवीं में थे तो पहली बार प्रदर्शन में भाग लिया। इलाहाबाद में राजनीतिशास्त्र की पढ़ाई की और बाद में जेएनयू छात्र संघ के नेता के तौर पर छात्र राजनीति में अपनी पहचान बनाई। पिछले कुछ सालों में चाहे वह शिक्षकों का आंदोलन या छात्रों का या कलमकारों का देवीप्रसाद त्रिपाठी वहां जरूर पहुंचते। साहित्य और संस्कृति के जिस मंच पर डीपीटी बोल लेते थे तो बाकी बोलने के लिए कुछ नहीं बचता था। लुटियन जोन में गंवई मुहावरे बोल कर समझाने वाले नेता थे। किसी पुस्तक लोकार्पण में जाते तो किताब की पृष्ठ संख्या बताते हुए उद्धरण तो देते थे ही साथ ही उससे जुड़ी बहुत सी किताबों का उद्धरण के साथ जिक्र कर डालते। उनकी अद्भुत याददाश्त और व्यापक अध्ययन ही उन्हें समकालीन राजनेताओं में सबसे विशिष्ट बना डालते थे।

फैज, जफर और गालिब के लिए डीपीटी सबके पसंदीदा थे, यारों के यार थे। लेकिन डीपीटी जो थे वह उनके संसद में अंतिम भाषण में गौर करने लायक है। अपने विदाई भाषण में उन्होंने सवाल उठाया कि संसद में महिलाओं की भागीदारी अभी तक सिर्फ 11.7 फीसद क्यों है। पिछली बार वैसा कब हुआ जब संसद ने गरिमामयी तरीके से सेक्स पर संवाद किया। जेंडर से लेकर ज्यूडीशियरी पर बहस चलाने में हम शर्मिंदा क्यों हो जाते हैं। जिस देश में हजारों लोग यौन जनित बीमारियों से मरते हैं उस देश की संसद इस पर बात क्यों नहीं करती। त्रिपाठी ने देश की संसद से सवाल पूछा था कि महात्मा गांधी और लोहिया के बाद यौन संबंधों पर किस नेता ने लिखा है? मशहूर अमेरिकी लेखक फिलिप राथ ने लिखा था कि शर्म लेखकों के लिए नहीं होती है। डीपीटी के अंदर का एक साहित्यकार ही था जो उन्हें संसद के अंदर उस झिझक से बाहर निकाल पाया और वे उस विषय पर बहस की मांग कर पाए जो भारतीय सांसदों के लिए वर्जित था।

राजनेताओं ने ‘डीपीटी’ को अपने तरीके से याद किया। उपराष्ट्रपति एम वेंकैया नायडू ने कहा, ‘राकांपा नेता और राज्यसभा के वरिष्ठ सदस्य रहे डीपी त्रिपाठी के निधन के बारे में जान कर गहरा दुख हुआ। वे अपनी विद्वता के लिए जाने जाते थे और राज्यसभा में चर्चा में सक्रिय भागीदारी करते थे। त्रिपाठी बेबाक तरीके से अपने विचार प्रकट करते थे’। राकांपा नेता सुप्रिया सुले ने ट्वीट किया, ‘उन्होंने राकांपा की स्थापना के समय से हमें बहुमूल्य परामर्श और मार्गदर्शन दिया जिसे हम याद रखेंगे। ईश्वर उनकी आत्मा को शांति दे।’

विदेश मंत्री एस जयशंकर ने ट्वीट किया, ‘डीपी त्रिपाठी के निधन से काफी दुखी हूं। 1973 में जेएनयू में दाखिला लेने के बाद से ही हम विश्व मुद्दों पर चर्चा करते रहे। खुले विचार वाले और व्यावहारिक। हम उन्हें बहुत याद करेंगे।’ माकपा के महासचिव सीताराम येचुरी ने ट्वीट किया, ‘कॉमरेड, साथी छात्र, जीवन के सहयात्री और बहुत कुछ थे। विश्वविद्यालय के दिनों से लेकर उनके जीवन के अंतिम दिनों तक हमने संवाद किया, दलील दी, असहमत हुए और एक साथ काफी कुछ सीखा। मेरे मित्र, आपकी कमी बहुत अधिक खलेगी। गहरी संवेदना प्रकट करता हूं’।

राष्ट्रीय लोक दल के नेता जयंत चौधरी ने उन्हें एक शानदार वक्ता और योद्धा के रूप में याद किया। उन्होंने कहा, ‘छात्र राजनीति से निकलकर अपनी शानदार भाषण कला और बुद्धिमता के दम पर डीपीटी (त्रिपाठी) ने पहचान बनाई। बीमारी और तमाम परेशानियों से लड़ कर एक योद्धा के तौर पर पहचाने जाने वाले, त्रिपाठी जी एक अच्छे सलाहकार और एक ऐसे शख्स थे जिन्होंने अपने वादे पूरे किए और संबंधों को सहेजा’। कांग्रेस नेता मनीष तिवारी ने भी उन्हें एक दोस्त, दार्शनिक और मार्गदर्शक के रूप में याद किया।

डीपी त्रिपाठी के निधन से काफी दुखी हूं। 1973 में जेएनयू में दाखिला लेने के बाद से ही हम विश्व मुद्दों पर चर्चा करते रहे। खुले विचार वाले और व्यावहारिक। हम उन्हें बहुत याद करेंगे।
-एस जयशंकर, विदेश मंत्री

राकांपा नेता और राज्यसभा के वरिष्ठ सदस्य रहे डीपी त्रिपाठी के निधन के बारे में जान कर गहरा दुख हुआ। वे अपनी विद्वता के लिए जाने जाते थे और राज्यसभा में चर्चा में सक्रिय भागीदारी करते थे। त्रिपाठी बेबाक तरीके से अपने विचार प्रकट करते थे।
– एम वेंकैया नायडू उपराष्ट्रपति

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