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जब संसद पहुंचे शरद पवार को ‘जीत’ की बधाई देने लगे सांसद! बीजेपी सदस्यों ने बनाई दूरी

पवार ने सोमवार को यह दावा करके सभी को चौंका दिया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उन्हें ‘‘साथ मिलकर’’ काम करने का प्रस्ताव दिया था लेकिन उन्होंने उसे ठुकरा दिया।

NCP चीफ शरद पवार। (फोटोः रॉयटर्स)

महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे की अगुआई में तीन पार्टियों के गठबंधन से सरकार बनाने का श्रेय अगर किसी एक नेता को जाता है तो वह निश्चित तौर पर एनसीपी सुप्रीमो शरद पवार हैं। वो पवार ही थे जिन्होंने तीनों पार्टियों के बीच सेतु का काम किया, आपसी मतभेद खत्म किए और गठबंधन का रास्ता साफ किया। पवार सोमवार को संसद पहुंचे।

वह जैसे ही पहुंचे, सदन में मौजूद उनके साथी सांसद और सेंट्रल हॉल में मौजूद अन्य सदस्य पवार को ‘जीत’ की बधाई देने लगे। पवार के ही पार्टी के सांसद प्रफुल्ल पटेल ने भी उनके पास जाकर हाथ मिलाकर बधाई दी। इसके अलावा, दूसरी पार्टियों के सांसद भी पवार से मिलने के लिए पहुंचे। हालांकि, बीजेपी सांसदों ने पवार से दूरी बनाए रखी।

उधर, पवार ने सोमवार को यह दावा करके सभी को चौंका दिया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उन्हें ‘‘साथ मिलकर’’ काम करने का प्रस्ताव दिया था लेकिन उन्होंने उसे ठुकरा दिया। पवार ने ऐसी खबरों को खारिज कर दिया कि मोदी सरकार ने उन्हें देश का राष्ट्रपति बनाने का प्रस्ताव दिया। उन्होंने कहा, ‘‘लेकिन, मोदी के नेतृत्व वाली कैबिनेट में सुप्रिया (सुले) को मंत्री बनाने का एक प्रस्ताव जरूर मिला था।’’

बता दें कि सुप्रिया सुले, पवार की बेटी हैं और पुणे जिला में बारामती से लोकसभा सदस्य हैं। पवार ने कहा कि उन्होंने मोदी को साफ कर दिया कि उनके लिए प्रधानमंत्री के साथ मिलकर काम करना संभव नहीं है। पवार ने सोमवार को एक मराठी टीवी चैनल को साक्षात्कार में कहा, ‘‘मोदी ने मुझे साथ मिलकर काम करने का प्रस्ताव दिया था। मैंने उनसे कहा कि हमारे निजी संबंध बहुत अच्छे हैं और वे हमेशा रहेंगे लेकिन मेरे लिए साथ मिलकर काम करना संभव नहीं है।’’

बता दें कि महाराष्ट्र में सरकार गठन को लेकर चल रहे घटनाक्रम के बीच पवार ने पिछले महीने दिल्ली में मोदी से मुलाकात की थी। मोदी कई मौके पर पवार की तारीफ कर चुके हैं। पिछले दिनों मोदी ने कहा था कि संसदीय नियमों का पालन कैसे किया जाता है इस बारे में सभी दलों को राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी से सीखना चाहिए । पवार ने कहा कि 28 नवंबर को जब उद्धव ठाकरे ने महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली तो उस समय अजित पवार को शपथ नहीं दिलाने का फैसला ‘सोच समझकर’ लिया गया।

(भाषा इनपुट्स के साथ)

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