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Naxal Violence: नरेंद्र मोदी के राज में गिरफ्तार हुए 6430 वामपंथी उग्रवादी, गृह मंत्रालय की रिपोर्ट का दावा

गृहमंत्रालय की रिपोर्ट कहती है कि 2013 की तुलना में लगातार नक्सलियों की गिरफ्तारियों से हिंसा की घटनाओं में कमी हुई है। संसद में केंद्रीय गृहराज्य मंत्री हंसराज गंगाराम अहीर ने रिपोर्ट के हवाले से यर दावा किया है।

Author नई दिल्ली | July 29, 2018 5:12 PM
नक्‍सली इलाके में गश्‍त करते सुरक्षा बलों के जवान। फाइल फोटो

पिछले तीन साल में साढ़े छह हजार से ज्यादा नक्सली गिरफ्तार हुए हैं, जिन्हें गृहमंत्रालय की रिपोर्ट में वामपंथी उग्रवादी करार दिया गया है। आंकड़े बताते हैं कि मोदी सरकार में नक्सली हमलों की संख्या में कमी हुई है। सरकार का दावा है यह सब नक्सल प्रभावित इलाकों में सख्त सुरक्षा व्यवस्था सुनिश्चित करने के साथ विकास कार्यों को गति प्रदान करने से संभव हुआ है। हाल ही में संसद में पेश  रिपोर्ट के मुताबिक 2015 से लेकर 30 जून 2018 के बीच नक्सली हिंसा की घटनाओं में कमी हुई है।

आंकड़ों की अगर बात करें तो इन साढ़े तीन वर्षों के बीच कुल 246 जवान नक्सली हिंसा में मारे गए। जिसमें 122 सीआरपीएफ जवान रहे। वहीं 662 नागरिक हताहत हुए। हताहत मतलब या तो मारे गए या फिर घायल हुए। सरकार ने अपनी रिपोर्ट में नागरिकों और घायलों की अलग संख्या उजागर नहीं की है। इस दरमियान नक्सली हिंसा की कुल 3531 घटनाएं दर्ज हुईं। जबकि 6430 वामपंथी उग्रवादियों को सुरक्षा बलों ने जान पर खेलकर धर-दबोचा। मई 2017 में नक्सल  प्रभावित राज्यों के मुख्यमंत्रियों की बैठक में गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने आठ बिंदुओं पर एक्शन प्लान की समन्वित कार्ययोजना को अमलीजामा पहनाने का निर्देश दिया था। हिंसा घटना के पीछे इस एक्शन प्लान की सफलता भी एक वजह बताई जाती है।

क्या कहते हैं आंकड़ेः आंकड़ें इस बात की पुष्टि करते हैं कि हालिया वर्षों में नक्सली हिंसा की घटनाओं में कमी हुई है और जान-माल की क्षति भी कम हुई है। मिसाल के तौर पर 2015 में 1089 घटनाएं हुईं और 1668 वामपंथी गिरफ्तार हुए, वहीं अगले साल 2016 में इससे कम 1048 घटनाएं हुईं तो पहले से ज्यादा 1840 गिरफ्तारियां हुईं। हालांकि घटनाएं भले कम हुईं मगर हताहत नागरिकों और सुरक्षाबलों की मौत की संख्या ज्यादा रही। वहीं 2017 में 908 घटनाएं और 1888 गिरफ्तारियां जबकि 30 जून 2018 तक 476 घटनाएं तथा 1034 गिरफ्तारियां हुईं। 2016 में जहा 213 नागरिक हताहत हुए और 65 सुरक्षाबलों की मौत हुई, वहीं 2017 में यह आंकड़ा क्रमशः 188 और 75 का रहा, जबकि 2018 में 90 और 47। नक्सलियों ने खान, रेलवे, दूरसंचाल अवसंरचना, सड़क, स्कूल आदि प्रतिष्ठानों को भी निशाना बनाकर सरकार को आर्थिक चोट पहुंचाई। 2015 में इस तरह की 127, 2016 में 79, 2017 में 75 और 2018 में 48 घटनाएं हुईं। यानी बड़े हमलों की संख्या भी कम हुई।

नक्सल हिंसा को लेकर संसद मे गृहराज्य मंत्री हंसराज अहीर की ओर से पेश रिपोर्ट का एक अंश।

सरकार का दावाः केंद्रीय गृहराज्य मंत्री हंसराज अहीर के मुताबिक वर्ष 2013 की तुलना में वर्ष 2017 में वामपंथी उग्रवाद से संबंधित घटनाओं की संख्या में 20 प्रतिशत और इससे संबंधित मौतों में 34 प्रतिशत की कमी हुई है। उन्होंने बतााया कि सरकार ने वामपंथी उग्रवाद से निपटने के लिए एक्शन प्लान बनाया है। जिसमें सुरक्षा संबंधी उपायों के साथ विकास कार्यक्रम, स्थानीय समुदायों के अधिकारों और उनकी हकदारियां सुनिश्चित करने की बहुआयामी रणनीति शामिल है। इसी रोड मैप पर सरकार काम कर रही है। दरअसल योजना आयोग की ओर से गठित विशेषज्ञ दल ने अप्रैल, 2008 में असंतोष, अशांति और उग्रवाद के कारणों से निपटने संबंधित रिपोर्ट पेश की थी। उस रिपोर्ट की संस्तुतियों के आधार पर सरकार नक्सल समस्या का समाधान करने में लगी है।

हिंसा प्रभावित राज्यों में एक हजार करोड़ः देश के आंध्र प्रदेश, बिहार, छत्तीसगढ़, झारखंड, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, ओडिशा, तेलंगाना, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल जैसे राज्य हिंसा प्रभावित हैं। इन राज्यों के नक्सल प्रभावित जिलों में बुनियादी ढांचे और सेवाओं के बीच अंतर पाटने के लिए तीन साल खातिर हर वर्ष एक हजार करोड़ रुपये खर्च की व्यवस्था है। नक्सली बेल्ट में सड़क, बिजली, पानी, स्कूल, मोबाइल टावर की स्थापना, बैंकों, डाकघरों के नेटवर्क में सुधार आदि कार्यक्रम किए जा रहे। पिछले तीन साल में सरकार 2106.33 करोड़ रुपये जारी कर चुकी है। सबसे ज्यादा छत्तीसगढ़, झारखंड और ओडिशा को पैसा मिला है।

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