देश में यकृत (Liver) यानी जिगर, अग्न्याशय (Pancreas), आंत (Intestine) और पाचन तंत्र से जुड़ी बीमारियों के बढ़ते बोझ को समझने के लिए जीआई (Gastrointestinal) रोगों की एक समान राष्ट्रीय पंजीकरण तैयार करने की दिशा में काम शुरू होगा। मौजूदा समय में कुछ अस्पतालों में इन रोगों से पीड़ित मरीजों का अलग-अलग स्तर पर पंजीकरण किया जा रहा है, लेकिन एक समान पंजीकरण बनने से देशभर के मरीजों और रोगों से संबंधित आंकड़े एक जगह उपलब्ध होंगे।

विशेषज्ञों का कहना है कि एकीकृत पंजीकरण व्यवस्था से यह पता लगाने में मदद मिलेगी कि देश के किन हिस्सों में किस तरह के जीआई रोगों का बोझ अधिक है। इसके आधार पर बीमारी के बढ़ते मामलों के कारणों को समझने और क्षेत्र विशेष की जरूरत के अनुसार उपचार, रोकथाम और अन्य रणनीतियां तैयार की जा सकेंगी। भविष्य में जरूरत के मुताबिक टीकाकरण समेत अन्य उपायों को भी इन आंकड़ों से जोड़ने में मदद मिल सकती है।

बढ़ते बोझ की वजहों पर भी नजर

विशेषज्ञों के मुताबिक देश में बढ़ता मोटापा, खराब खानपान, बदलती जीवनशैली, स्वच्छता और साफ-सफाई की कमी समेत कई कारण जीआई रोगों के बोझ को बढ़ा रही हैं। इनमें जीआई कैंसर के मामले भी शामिल हैं। ऐसे में केवल बीमारी का उपचार करने के बजाय उसके जोखिम कारकों की पहचान और रोकथाम पर भी ध्यान देने की जरूरत है।

एम्स के गैस्ट्रोएंटरोलॉजी विभाग और मानव पोषण इकाई के प्रोफेसर और वर्ल्ड कांग्रेस ऑफ गैस्ट्रोएंटरोलॉजी 2026 के स्थानीय आयोजन समिति के अध्यक्ष डॉ. गोविंद मखारिया ने बताया कि मौजूदा समय में गैर-संचारी रोगों की रोकथाम और नियंत्रण, खाद्य पदार्थ में तेल व दूसरे वस्तु की मात्रा की जानकारी समेत कई स्तरों पर उपाय किए गए हैं। एक समान रजिस्ट्री से उपलब्ध होने वाले आंकड़ों के आधार पर आने वाले समय में इन प्रयासों को और प्रभावी तरीके से आगे बढ़ाया जा सकता है।

उन्होंने कहा कि दिल्ली में आयोजित हुए डब्ल्यूसीओजी 2026 में जीआई रोगों के उपचार को प्रभावी बनाने के लिए दुनिया भर में इस्तेमाल हो रही विभिन्न तकनीकों को एक साथ लाकर मरीजों के लिए बेहतर उपचार विकल्प तैयार करने की रणनीति बनी है। इसमें एंडोस्कोपी, रेडियोलॉजी, प्रयोगशाला चिकित्सा और कृत्रिम मेधा (एआई) समेत विभिन्न क्षेत्रों की विशेषज्ञता को एकीकृत कर भारत की जरूरत के आधार पर विकल्प तैयार करने का लक्ष्य बनाया गया है। इसका उद्देश्य मरीज की बीमारी की अधिक सटीक पहचान करने और उसके अनुरूप उपचार तय करना है।

उन्होंने कहा कि जीआई रोगों के क्षेत्र में एआई के इस्तेमाल को लेकर देश में बड़े स्तर पर काम चल रहा है। देश की जनसंख्या आधारित जांच, बीमारी की पहचान और उपचार संबंधी निर्णयों में एआई सहायक तकनीक बन रही है। भारत में कई स्वदेशी एआई आधारित तकनीक विकसित की जा चुकी है। इससे भविष्य में देश की जरूरतों के अनुरूप कम लागत वाली और अधिक सुलभ तकनीक विकसित करने में मदद मिल सकती है।

औषधि विभाग 1,011 ई-कचरा उपकरणों का करेगा निस्तारण

गांधी जयंती के अवसर पर औषधि विभाग ने विशेष अभियान-6 की शुरुआत की है। ई-कचरा प्रबंधन अभियान का प्रमुख हिस्सा है। विभाग ने कुल 1,011 पुराने विद्युत और इलेक्ट्रानिक उपकरणों के वैज्ञानिक तरीके से निस्तारण का लक्ष्य रखा है। इनमें 602 आइटी और दूरसंचार उपकरण, 196 उपभोक्ता इलेक्ट्रिकल-इलेक्ट्रानिक एवं फोटोवोल्टिक उपकरण, 53 बड़े और छोटे विद्युत उपकरण, पांच प्रयोगशाला उपकरण तथा 154 अन्य इलेक्ट्रानिक परिसंपत्तियां और विद्युत उपकरण शामिल हैं।

विभाग के साथ उसके संबद्ध और अधीनस्थ संगठनों-राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण, फार्मास्यूटिकल्स एंड मेडिकल डिवाइसेज ब्यूरो आफ इंडिया, राष्ट्रीय औषधि शिक्षा एवं अनुसंधान संस्थानों और सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों में यह अभियान चलाया जा रहा है। अभियान का सक्रिय चरण 2 से 31 अक्तूबर तक चलेगा।

अभियान के तहत विभिन्न संगठनात्मक इकाइयों में 12,208 स्वच्छता और बाहरी कार्यालय अभियान चलाने का लक्ष्य रखा गया है। इसके अलावा सरकारी कामकाज में लंबित मामलों को कम करने के लिए भी लक्ष्य निर्धारित किए गए हैं। अभियान में पुराने अभिलेखों की छंटाई और कार्यस्थल को व्यवस्थित करने पर भी जोर दिया गया है।