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यूपी समेत 3 बड़े राज्यों में करीब 30 साल से नहीं बना कांग्रेस का कोई मुख्यमंत्री, जानें कैसे क्षेत्रीय पार्टियों में खिसकता गया कांग्रेस का जनाधार

पश्चिम बंगाल में कांग्रेस पार्टी का इंतजार खत्म होने का नाम ही नहीं ले रहा है। मौजूदा स्थिति की बात करें तो यहां मुख्य मुकाबला ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस और भाजपा के बीच दिख रहा है।

Author नई दिल्ली | Published on: February 18, 2020 11:23 AM
पिछले करीब तीन दशक में कांग्रेस का जनाधार लगातार खिसकता चला गया। (AP Photo)

एक दौर था जब देश की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी थीं और भारत के मौजूदा 28 राज्यों (वर्तमान में) में से 18 में कांग्रेस की सरकार थी। लेकिन पिछले करीब 30 सालों से कांग्रेस का जनाधार लगातार खिसकता चला गया। इतने लंबे वक्त से पार्टी यूपी, बिहार सहित कई राज्यों में अपना मुख्यमंत्री भी नहीं बना सकी है। वहीं पिछले 5 सालों में भाजपा का प्रदर्शन काफी बेहतर हुआ है। हालांकि लोकसभा चुनाव से पहले राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस हिंदी पट्टी के तीन राज्यों मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में अपना मुख्यमंत्री बनाने में सफल रही।

बात उत्तर प्रदेश की करें तो यहां फिलहाल भाजपा की सरकार है। इससे पहले समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी की सरकार थी। कभी यूपी में कांग्रेस का दबदबा था लेकिन पार्टी की मौजूदा स्थिति यहां बेहद कमजोर दिख रही है। पार्टी ने अपना जनाधार बढ़ाने के लिए प्रियंका गांधी को महासचिव बनाकर यहां भेजा, बावजूद स्थिति में ज्यादा सुधार नहीं आया। साल 1989 में कांग्रेस नेता नारायण दत्त तिवारी उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने थे। लेकिन उनके बाद से कांग्रेस यहां अपना मुख्यमंत्री नहीं बना पायी।

बिहार में भी कांग्रेस क्षेत्रीय पार्टी राजद के सहारे अपनी नैया खेव रही है। पहले राजद ने लगातार 1990 से 2005 तक 15 साल बिहार पर शासन किया और उसके बाद से नीतीश कुमार की पार्टी जदयू सरकार में है। हालांकि, 2015 में महागठबंधन की सरकार बनने पर कांग्रेस सत्ता में आयी थी, लेकिन मुख्यमंत्री जदयू के नीतीश कुमार ही थे। साल 1989 में कांग्रेस नेता जग्गनाथ मिश्र मुख्यमंत्री बने थे और 1990 के कुछ महीनों तक वे इस पद पर थे। इसके बाद से कोई कांग्रेसी मुख्यमंत्री नहीं बना।

पश्चिम बंगाल में कांग्रेस पार्टी का इंतजार खत्म होने का नाम ही नहीं ले रहा है। मौजूदा स्थिति की बात करें तो यहां मुख्य मुकाबला ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस और भाजपा के बीच दिख रहा है। कांग्रेस नेता सिद्धार्थ शंकर रे 1972 से 1977 तक बंगाल के मुख्यमंत्री रहे। लेकिन 1977 की इमरजेंसी के बाद कांग्रेस अभी तक यहां न तो अपने बूते सरकार बना पायी और न हीं अपने नेता को मुख्यमंत्री। हालांकि 2011 में तृणमूल कांग्रेस के साथ मिलकर पार्टी सत्ता में आयी लेकिन जल्द ही यह गठबंधन टूट गया।

तमिलनाडु में भी क्षेत्रीए पार्टी एआईडीएमके और डीएमके के बीच कांग्रेस अपना जनाधार नहीं बचा पायी। कांग्रेस नेता मिंजूर भक्तवत्सलम राज्य के अंतिम कांग्रेसी मुख्यमंत्री थे, जिनका कार्यकाल 1967 में समाप्त हो गया था। उस समय तमिलनाडु मद्रास स्टेट कहलाता था। 1969 में यह तमिलनाडु बना था।

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि एक वक्त में ओबीसी, दलित, सवर्ण और मुस्लिम सभी वोटरों के बीच कांग्रेस की मजबूत पकड़ थी। लेकिन ओबीसी और दलित वोटरों को क्षेत्रीय दलों ने अपने पाले में कर लिया। सवर्ण धीरे-धीरे भाजपा की ओर रुख कर गए। मुसलमान वोटरों का एक हिस्सा भी क्षेत्रीय पार्टियों में शिफ्ट कर गया।

हाल के दिनों में वोट का धार्मिक ध्रुवीकरण होने की वजह से कांग्रेस कांग्रेस भाजपा और क्षेत्रीय दलों के बाद राजनीतिक लड़ाई में तीसरे नंबर पर जा पहुंची है। हाल में संपन्न हुए दिल्ली चुनाव में इसका साफ असर देखा जा सकता है, जहां लगातर तीन बार सरकार बनाने वाली कांग्रेस पार्टी पिछले दो चुनाव से शून्य पर आउट हो रही है।

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