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अदालत में गोडसे न‍े दिया था हलफनामा- राजनीति करना जरूरी लगा इसलिए छोड़ दिया RSS

अाजादी के बाद, गोडसे अपने गुरु वीर सावरकर द्वारा सरकार को समर्थन करने की आलोचना करने लगा।

Author September 9, 2016 8:16 AM
नाथू राम गोडसे ने 30 जनवरी 1948 को महात्‍मा गांधी की हत्‍या की थी।

कांग्रेस और आरएसएस के बीच महात्‍मा गांधी की हत्‍या से संघ के जुड़ाव को लेकर जारी विवाद में नया मोड़ आ गया है। गांधी की हत्‍या करने वाले नाथूराम गोडसे द्वारा ट्रायल कोर्ट में दिया गया हलफनामा कई विवादास्पद मुद्दों पर साफ तस्‍वीर सामने रखता है। 30 जनवरी, 1948 को महात्‍मा गांधी की हत्‍या को लेकर राजनैतिक जमात गोडसे को लेकर विभाजित रही है। जहां आरएसएस ने हमेशा यही कहा कि गोडसे तब संघ का सदस्‍य नहीं था, वहीं उसके परिवार ने कई मौकों पर कहा कि गोडसे अपनी मौत तक स्‍वयंसेवक बना रहा। 8 नवंबर, 1948 को दाखिल किया गया गोडसे का हलफनामा बताता है कि वह विचाराधारा और हिंदुओं को एक करने के लिए किए जा रहे कार्यों से प्रेरणा लेकर उसने आरएसएस ज्‍वाइन किया, लेकिन सिर्फ अपने आकाओं से सीखे मकसद को अंजाम को देने के लिए। एफिडेविट में गोडसे ने कहा था, ”मैंने कई सालों तक आरएसएस में काम किया। बाद में मुझे लगा कि हिंदुओं के अधिकारों की रक्षा के लिए देश की राजनैतिक गतिविधियों में हिस्‍सा लेना जरूरी है। इसलिए मैंने संघ छोड़कर हिंदू महासभा की सदस्‍यता ले ली।”

नाथूराम गोडसे के भाई, गोपाल गोडसे ने जेल से छूटने के बाद अपने भाई के आरएसएस के जुड़ाव के बारे में लिखा था। उसने लिखा, ”वह (नाथूराम) महसूस करने लगा था कि हिंदुओं को एक करने का कार्य कितना बड़ा था और यह भी कि आरएसएस के काम को राजनैतिक क्षेत्र में भी उभारने की जरूरत है। उसे लगता कि उसके लिए सांगली बहुत छोटी जगह है, इसलिए वह पुणे चला गया। नाथूराम ने खुद को पूरी तरह हिंदू संगठन के लिए समर्पित कर दिया था।” गोडसे का एफिडेविट इस बात पर जोर देता है कि कैसे हिंदुओं के प्रति सहानुभूति ने उसे बेचैन और आक्रामक बना दिया। वीर सावरकर के ‘सार्वजनिक जीवन से खुद को अलग करने के बाद’ उसने कहा, ”जब डॉ. श्‍यामा प्रसाद मुखर्जी हिंदू महासभा के अध्‍यक्ष बने तो उसकी साख और गिर गई और वह कांग्रेस के हाथों की कठपुतली बन गई।”’

एफिडेविट के अनुसार, इससे गोडसे की जिंदगी में बदलाव आया। इसके मुताबिक, ”हिंदू महासभा खतरनाक हिंदू विरोधी गतिविधियों को रोक पाने में अक्षम साबित होने लगी। जिसे देखकर मैंने हिंदू संगठन आंदोलन को संवैधानिक दायरे में चल पाने की सारी उम्‍मीदें खो दीं और अपने लिए नया ढूंढने लगा।” धीरे-धीरे गोडसे का गुस्‍सा बढ़ता चला गया। उसने एफिडेविट में कहा, ”मेरा और हिंदू युवाओं का भरोसा वीर सावरकर और महासभा के अन्‍य पुराने नेताओं से कम होने लगा। अाजादी के बाद, गोडसे अपने गुरु वीर सावरकर द्वारा सरकार को समर्थन करने की आलोचना करने लगा। उसने पब्लिक प्रॉसीक्‍यूटर के आरोप कि ‘मुझे वीर सावरकर के हाथों का खिलौना साबित करने” को भी सिरे से खारिज कर दिया। इस बयान को अपने फैसले और कार्य की आजादी की जानबूझकर की गई बेइज्‍जती बताते हुए उसने अदालत को कहा, ”मैं फिर से कहता हूं कि यह सच नहीं है कि वीर सावरकर को मेरी उन गतविधियों की जरा भी भनक थी जिनकी वजह से मुझे गांधी को गोली मारनी पड़ी। ”

अपने बयान में, नाथूराम ने खुद को ऐसा हिंदू बताया जिसने आरएसएस और हिंदू महासभा से शुरुआती शिक्षा ली। जिसने धीरे-धीरे उसे आक्रामक बनाया और देश के सबसे बड़ी राजनैतिक हत्‍या करवाई। गोडसे पर लिखे असली निबंध The Politics of the assasination of Gandhi में समाजशास्‍त्री आशीष नंदी लिखते हैं कि ”गोडसे ने आरएसएस को लड़ाका नहीं पाया” इसलिए ”हिंदू राष्‍ट्र दल नाम से नई संस्‍था बनाई।” गांधी की हत्‍या करने के लिए गोडसे पर प्रभाव डालने वाली ताकतों का जिक्र करते हुए नंदी ने लिखा, ”कोई भी राजनैतिक हत्‍या किसी एक व्‍यक्ति का काम नहीं होती। चाहे हत्‍यारा मानसिक रूप से बीमार हो और अकेले वारदात को अंजाम दे, वह अपनी बीमारी के जरिए बड़े पैमाने पर ऐतिहासिक और मनोवैज्ञानिक कारणों को दर्शाता जो उसे उसके शिकार से जोड़ती हैं।”

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