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नाथूराम गोडसे की कहानी: नथ पहना कर बेटी की तरह पाला गया था, ऐसे बना संपादक से बापू का कातिल

सावरकर से प्रभावित होकर गोडसे उनके साथ हो लिए। कुछ महीने सावरकर से साथ रहने के बाद वे अपने पिता के पास वापस सांगली शहर लौट आए। यहां वे टेलर के रूप में काम करने लगे।

Nathuram Godse, Patriot, Sadhvi Pragya Thakur, bapu murder, Mahatama gandhi, BJP, Congress, lok sabha election, Vinayak sawarkar, Hindi news, news in Hindi, latest news, today news in Hindi10वीं कक्षा की परीक्षा में फेल हो गए थे नाथूराम। (फाइल फोटो)

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की हत्या करने वाले नाथू राम गोडसे के जीवन की कई ऐसे बाते हैं जिनके बारे में बहुत कम लोगों को जानकारी है। नाथूराम गोडसे के जीवन की शुरुआत ही असामान्य तरीके से हुई थी। नाथूराम के जन्म से पहले उनके माता पिता के यहां तीन संतान हुईं। ये तीनों लड़के थे लेकिन इनकी जल्द ही मौत हो गई। उनके माता पिता इसे श्राप मानने लगे थे।

इसलिए जब 1910 में जब गोडसे का जन्म हुआ तो  कथित ‘श्राप’  को खत्म करने के लिए उनका पालन पोषण लड़की की तरह किया गया था।उनके नाक को छिदवाया गया और उसमें नथ भी पहनाई गई। इसी से प्रभावित होकर उनका नाम नाथूराम भी पड़ा। उनके माता पिता का मानना था कि उनका पहला जीवित बच्चा भगवान का उपहार है।

गांधी को पसंद करते थे गोडसेः गोडसे की स्कूली शिक्षा पुणे से हुई। गोडसे समय के साथ राष्ट्रवादी भावनाएं भी विकसित होने लगीं। वे महात्मा गांधी का ब्रिटिश शासन के विरोध करने को पसंद करते थे। गोडसे 10वीं कक्षा की परीक्षा में फेल हो गए। उस समय 10वीं कक्षा की परीक्षा प्रारंभिक स्तर पर सरकारी नौकरी पाने की योग्यता हुआ करती थी। इसके बाद उन्होंने स्कूल छोड़ दिया।  उन्होंने बढ़ई का काम करना शुरू कर दिया।

विनायक दामोदर सावरकर से प्रभावितः गोडसे के जीवन में महत्वपूर्ण परिवर्तन उस समय आया जब उनके पिता उन्हें 19 साल की उम्र में लेकर रत्नागिरी आ गए। यहां विनायक दामोदर सावकर अंग्रेजों से आजादी के लिए गली-गली कार्यकर्ता के रूप में घूमते थे।

सावरकर से प्रभावित होकर गोडसे उनके साथ हो लिए। कुछ महीने सावरकर से साथ रहने के बाद वे अपने पिता के पास वापस सांगली शहर लौट आए। यहां वे टेलर के रूप में काम करने लगे। इसके साथ ही उनमें दक्षिणपंथी संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में उनकी रुचि विकसित होने लगी।

हिंदू महासभा के नेता और संपादक बनेः 1937 में सावरकर के जेल से रिहा होने के बाद गोडसे वापस अपने मार्गदर्शक के पास वापस आ गए। 1930 के दशक में हैदराबाद में विरोध प्रदर्शन की अगुवाई के बाद उन्हें गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया गया। 30 साल की उम्र में उन्होंने हिंदुत्व के भक्त के रूप में अपने जीवन को स्थापित किया। 1944 में गोडसे और उनके दोस्त नारायण आपटे ने एक दैनिक समाचार पत्र ‘अग्रणी’ की शुरुआत की। अपनी पार्टी के विचार को आगे बढ़ाने के लिए वे इस पत्र के संपादक बने।

गांधी के भूख हड़ताल से गुस्साः गोडसे भारतीय कांग्रेस द्वारा मुस्लिम लीग की मांग को मानने और गांधी के अहिंसा के तरीके से संतुष्ट नहीं थे। उन्हें अहिंसा का मार्ग अवास्तविक और अप्रभावी लगता था। 1947 में भारत के आजाद होने के बाद राष्ट्रवादी औपचारिक विभाजन से गोडसे काफी आहत थे।

जब महात्मा गांधी ने पाकिस्तान को पैसे देने को लेकर भूख हड़ताल करने की घोषणा की तो बहुत क्रोधित थे। गांधीजी के अनशन पर बैठने के एक दिन बाद 14 जनवरी को गोडसे और आपटे ट्रेन से दिल्ली के लिए रवाना हुए। इस बीच गांधीजी की प्रार्थनसभा में विस्फोट की कोशिश असफल रही।

इसके बाद शहर लौटकर गोडसे ने पिस्टल खरीदी। 30 जनवरी को शाम 5.15 बजे गांधी जी जब बिड़ला हाउस से निकल कर दूसरी प्रार्थना सभा के लिए जा रहे थे उसी समय गोडसे ने गांधीजी के सामने पहुंच कर उनकी छाती में 3 गोलियां मारीं। गोडसे का मिशन पूरा हो चुका था।

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