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हिंदू त्योहारों में ढोल बजाता रहा है परिवार, अंसारी बोले- बदल गए हैं हालात, मुस्लिम होने की वजह से नहीं मिल रहा काम

नासिक ढोल की शुरुआत 1950 के दशक में बादशाह अंसारी ने की थी। उन्होंने इसमें कई अन्य स्टाइल को भी जोड़ा जिसे लोगों ने खूब पसंद किया।

Author नासिक | Updated: September 11, 2019 12:49 PM
Nashik, Nashik’s Muslim drummers , maharashtra, shiv sena, ganpati pandal, muslim hindu, nashik dhol, puneहिंदू त्योहारों में ढोल बजाता रहा है परिवार। फोटो: इंडियन एक्सप्रेस

महाराष्ट्र के नासिक में एक मुस्लिम परिवार दशकों से हिंदू त्योहारों में ढ़ोल बजा रहा है। चाहे वह गणपति विसर्जन हो या फिर चुनावी रैली। ऐसा बीते पांच दशकों से चला आ रहा है। ‘द नासिक’ ढोल के नाम से मशहूर यह परिवार फिलहाल पहले की तरह महसूस नहीं कर रहा। वजह है बदले हुए हालात। परिवार के सदस्य खलील अंसारी के मुताबिक बीते पांच साल में हालात बदले हैं। उनका कहना है कि मुस्लिम होने की वजह से अब ज्यादा काम नहीं मिल रहा। वह कहते हैं ‘हमारा परिवार बीते पांच दशक से ज्यादातर हिंदू त्योहारों में ढोल बजा रहा है। इस दौरान हमें लोगों का भरपूर प्यार मिला लेकिन पिछले पांच साल में मुस्लिम होने की वजह से हमें ज्यादा काम नहीं मिल रहा।’

बता दें कि नासिक ढोल की शुरुआत 1950 के दशक में बादशाह अंसारी ने की थी। उन्होंने इसमें कई अन्य स्टाइल को भी जोड़ा जिसे लोगों ने खूब पसंद किया। इस ग्रुप के लोग रॉकस्टार की तरह हेयर स्टाइल रखते हैं। ग्रुप की मांग महाराष्ट्र तक ही सीमित नहीं है बल्कि गुजरात और राजस्थान में भी है। खलील बताते हैं ‘हम मुंबई के हर बड़े गणपति पंडाल में अपनी सेवाएं देते हैं। यही नहीं राजस्थान में भी हमारी काफी मांग है। मांग इतनी ज्यादा है कि हमें राजस्थान में ऑफिस खोलना पड़ा और वहां पर एक शख्स को कॉर्डिनेशन के लिए बैठाना पड़ा। हम मंदिरों, हिंदू शादियों और शिव सेना की रैलियों में ढोल बजाते हैं।’

वह आगे कहते है ‘मुझे कभी ऐसा महसूस नहीं हुआ जैसा अब होता है। बीते कुछ समय में मुस्लिम होने की वजह से काफी परेशानी का सामना करना पड़ा। हाल ही में हम एक कार्यक्रम में ढोल बजा रहे थे। इस दौरान जैसे ही वहां मौजूदा युवकों को इसकी भनक लगी उन्होंने हमें वहां से भेज दिया। उन्होंने हमसे कहा था कि अगर हम नहीं गए तो पैर तोड़ दिए जाएंगे।’

वहीं ग्रुप में शामिल सलीम अंसारी कहते हैं ‘मुस्लिम होने की वजह से मुझे कभी इस तरह से टारगेट नहीं किया गया लेकिन हां कई ऐसे मौके जरूर आए जब मुझे अजीब महसूस हुआ। कार्यक्रम के दौरान जब हम किसी मस्जिद के पास पहुंच जाते हैं तो लोग हमसे बहुत तेज ढोल पीटने को कहते हैं। मैं उस वक्त सोचता हूं कि वह ऐसा मुस्लिम लोगों को उकसाने के लिए कर रहे हैं। मैं पैसे कमाने के लिए ढोल बजाता हूं, लेकिन अगर आपकी कला का इस्तेमाल आपको परेशान करने के लिए किया जा रहा है, तो आप बुरा महसूस करते हैं।’

बता दें कि नासिक ढोल की सफलता के बाद कई लोगों ने उनकी नकल करने की कोशिश की लेकिन वह इस ग्रुप के स्टाइल की नकल नहीं कर सके। हालांकि छोटे-छोटे अलग ग्रुप खुलने से नासिक ढोल को वित्तीय नुकसान झेलना पड़ रहा है। वहीं गणेश उत्सव का आयोजन करने वाले सुहास केलकर बताते हैं ‘हम अगर उतस्व के लिए 10 बैंड को बुला ले तो युवा नासिक ढोल पर ही नाचना पसंद करते हैं। बहरहाल इन सभी चुनौतियों के बावजूद खलील कहते हैं कि वह अपना यह काम कभी नहीं छोड़ेंगे।

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