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भारत व चीन ने सीमा पर अमन कायम रखने पर सहमति जताई

भारत और चीन ने सोमवार विवादास्पद सीमा मुद्दे के समाधान के लिए 18वें दौर की बातचीत शुरू की। चीन के सरकारी मीडिया ने कहा कि दोनों पक्ष सीमा मुद्दे के समाधान से पहले अपने विवादों को उचित तरह से संभालने और नियंत्रित करने पर सहमत हो गए हैं। पिछले साल मई में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी […]

Author , March 24, 2015 9:32 AM
भारत और चीन के बीच एक बार फिर सीमा विवाद को लेकर बातचीत हुई।

भारत और चीन ने सोमवार विवादास्पद सीमा मुद्दे के समाधान के लिए 18वें दौर की बातचीत शुरू की। चीन के सरकारी मीडिया ने कहा कि दोनों पक्ष सीमा मुद्दे के समाधान से पहले अपने विवादों को उचित तरह से संभालने और नियंत्रित करने पर सहमत हो गए हैं। पिछले साल मई में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पद संभालने के बाद सीमा मुद्दे पर बातचीत के लिए विशेष प्रतिनिधियों की पहली बैठक की सह-अध्यक्षता चीन के स्टेट काउंसिलर यांग जियेची और भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल ने की।

बातचीत पर भारत की तरफ से कोई आधिकारिक बयान या प्रतिक्रिया नहीं आई लेकिन चीनी समाचार एजंसी शिन्हुआ के अनुसार, ‘दोनों पक्ष जटिल मुद्दे के समाधान से पहले अपने सीमाई क्षेत्रों में संयुक्त रूप से अमन चैन बनाए रखने के लिए सहमत हो गए।’

एजंसी ने कहा कि विशेष प्रतिनिधियों की वार्ता में पिछले सालों में हुई प्रगति की समीक्षा करते हुए उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि दोनों पक्षों को मौजूदा उपलब्धियों और सहमतियों के आधार पर रूपरेखा में तय बातचीत की प्रक्रिया को सही दिशा में आगे बढ़ाते रहना चाहिए। उन्हें द्विपक्षीय रिश्तों पर तथा दोनों की जनता के दीर्घकालिक हितों पर विचार करना चाहिए। इसमें आगे कहा गया कि दोनों पक्ष अपने नेताओं के बीच हुई महत्त्वपूर्ण सहमतियों को लागू करने के लिए साझा प्रयास करेंगे, उच्चस्तरीय यात्राएं करते रहेंगे और चीन-भारत रणनीतिक सहयोग के विकास को बढ़ाएंगे।

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एजंसी ने कहा कि दोनों पक्ष सभी क्षेत्रों में व्यवहारिक सहयोग को बढ़ाने के लिए, अंतरराष्ट्रीय और क्षेत्रीय मामलों में समन्वय प्रगाढ़ करने और वैश्विक शांति व विकास के लिए साझेदारी के करीबी रिश्ते बनाने के लिए मिलकर काम करने को भी तैयार हो गए।

इसी तरह चीन के एक और सरकारी स्वामित्व वाले मीडिया संस्थान सीसीटीवी ने कहा कि एक तरह का संकल्प रहा है लेकिन मई में मोदी की चीन यात्रा के दौरान कोई ठोस घोषणा हो सकती है जिनके आधार पर ये बातचीत आगे बढ़ी है।

हालांकि भारतीय सूत्रों ने कहा कि भारत ने व्यापारिक व वाणिज्यिक मुद्दों पर कड़ा संदेश देते हुए कि उसकी संरक्षणवादी नीतियों को लेकर भारतीय उद्योगों की नाराजगी के मद्देनजर भारत भी चीन से आयात की समीक्षा कर सकता है।

वाणिज्य मंत्रालय ने कहा कि भारत खासतौर से फार्मास्यूटिकल, कृषि उत्पादों व सूचना तकनीक जैसे उन तीन क्षेत्रों में जिसमें भारत को महारत हासिल है, को चीनी बाजार में पहुंच मुहैया कराने में जारी लालफीताशाही से परेशान है। उन्होंने बताया कि चीन की प्रशासनिक एजंसियां इस मुद्दों पर भारत की मांगों पर जवाब देने में टालमटोल कर रही हैं।

मंत्रालय का यह बयान ऐसे अहम समय में आया है जब भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अगले दो महीने में चीन की यात्रा पर जाने वाले हैं। समझा जाता है कि इस यात्रा के दौरान मोदी सीमा विवाद के अलावा व्यापार घाटे, भारतीय उत्पादों व सेवाओं की चीनी बाजार तक पहुंच व चीनी निवेश का मुद्दा भी प्रमुखता से उठाएंगे।

वाणिज्या मंत्रालय के अफसरों ने बताया कि चीन को साफ शब्दों में चेतावनी दे दी गई है आयात पर नियंत्रण के लिए भारत नए मानक तय कर सकता है और गुणवत्ता के आधार पर गैरजरूरी वस्तुओं का आयात रोक सकता है। अफसरों ने कहा कि जब भी हम किसी खास क्षेत्र से डुड़ी अपनी परेशानियां उठाते हैं, चीन का जोर इस बाबत सहमति पत्र पर दस्तखत का होता है। पर दस्तखत हो जाने के बाद इसे ठंडे बस्ते में डाल दिया जाता है और आगे कोई कार्रवाई नहीं होती।

अधिकारियों ने कहा कि हमने सूचना तकनीक और मवेशियों के मांस के निर्यात के लिए सहमति पत्रों पर दस्तखत किए थे। इन क्षेत्रों में चीन को निर्यात की अपार संभावना है पर चीनी एजंसियों का रवैया टाटमटोल वाला रहा है। इसी तरह सूचना तकनीक से जुड़ी कंपनियों के रास्ते में भी रोड़े अटकाए जा रहे हैं।

चीन की सरकारी कंपनियों में सूचना तकनीक से जुड़ी सेवाओं के टेंडर भरने के लिए यह अनिवार्यता लागू कर दी गई है कि कंपनी का टर्नओनर 100 मिलियन डालर का होना चाहिए। अधिकारियों का कहना है कि यह भारतीय कंपनियों को रेकने के लिए जानबूझ कर खड़ा किया गया ‘कृत्रिम अवरोध’ है।

इसी तरह के नियम बनाकर फार्मास्यूटिकल कंपनियों को भी चीनी बाजार से बाहर रखा जा रहा है जबकि भारतीय कंपनियों की दवाइयां काफी सस्ती हैं।

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