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क्यों नरेंद्र मोदी और मोहन भागवत हिंदू सिक्के के एक ही पहलू हैं

दुत्व या हिंदू राष्ट्र को लेकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की जो समझ है वह देश के सामने कभी आई ही नहीं है, या फिर संघ परिवार के भीतर हिंदुत्व को लेकर उलझन है कि वह उसे धर्म माने या जीवन पद्धति। असल में स्वयंसेवकों के हाथ में सत्ता आते ही संविधान और संघ का मत […]

दुत्व या हिंदू राष्ट्र को लेकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की जो समझ है वह देश के सामने कभी आई ही नहीं है, या फिर संघ परिवार के भीतर हिंदुत्व को लेकर उलझन है कि वह उसे धर्म माने या जीवन पद्धति। असल में स्वयंसेवकों के हाथ में सत्ता आते ही संविधान और संघ का मत टकराता है। सत्ता और सत्ता के बाहर के स्वयंसेवकों के बीच सामजंस्य हो नहीं पाता क्योंकि हिंदू राष्ट्र का वाकई कोई खाका तो है नहीं। तो फिर देश में हिंदू राष्ट्र को लेकर नए सिरे से खौफ क्यों पैदा हो रहा है।

सवाल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी या सरसंघचालक मोहन भागवत के अलग-अलग बयान भर का नहीं है। सवाल देश को लेकर अब उस समझ का है जिससे संघ के मुखिया भी बच रहे हैं और प्रधानमंत्री की चिंता भी धार्मिक हिंसा में सिमटी दिखाई देती है। उलेमा भी हिंदू राष्ट्र को फलसफे नहीं, थ्योरी के तौर पर देखना-समझना चाहते हैं।

संघ के बनने से दो बरस पहले ही 1923 में वीर सावरकर ने रत्नागिरी में रहते हुए किताब लिखी- ‘हिंदू कौन’, जिसका मर्म यही था कि जिसकी धर्मभूमि और पावन भूमि हिंदुस्तान है वही हिंदू है। और जो हिंदू नहीं वह राष्ट्रीय नहीं। 1925 में हेडगेवार ने सावरकर के मत को खारिज कर दिया। हिंदुत्व को सभ्यता से जोड़ दिया। यानी अभी जो स्वयंसेवक हिंदुत्व को जीवन जीने के तौर-तरीकों से जोड़ते हैं, उनके जेहन में हेडगेवार का ही बीज है। इसके बावजूद संघ परिवार कभी इसका जवाब नहीं दे पाया कि हिंदू राष्ट्र कहने की जरूरत फिर है ही क्यों?

बाबा साहेब आंबेडकर ने कहा था: मैं हिंदू पैदा जरूर हुआ हूं , लेकिन हिंदू रहकर मरूंगा नहीं। सवाल धर्म का भी आया और जीवन पद्धति का भी। 1952 में हिंदू कोड बिल का समर्थन जवाहरलाल नेहरू ने किया। चूंकि मुसलिम और ईसाई ही सिर्फ अपने कानून के दायरे में थे तो बाकी धर्म चाहे वह बौद्ध धर्म हो या जैन धर्म, या फिर सिख, वैष्णव, लिंगायत या शैव, सभी हिंदू कोड बिल के दायरे में आए।

हिंदुत्व को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने भी हिंदू शब्द को धर्म से इतर जीवन पद्धति पर ही जोर दिया। इसके बावजूद यह सवाल हमेशा अनसुलझा रहा कि संघ बार-बार भारत को हिंदू राष्ट्र कहता क्यों है, क्योंकि संविधान के तहत राष्ट्रीय ध्वज और राष्ट्रीय चिह्न के तौर पर अगर अशोक चक्र को देखें तो अशोक चक्र को धर्मचक्र के तौर पर कहा जरूर गया, लेकिन अशोक चक्र की व्याख्या कभी धर्म के आधार पर नहीं हुई। बल्कि इसे न्यायचक्र माना गया।

अब सवाल है कि धर्म अगर न्याय से जुड़ा है तो बीच-बीच में संघ परिवार के संगठन विश्व हिंदू परिषद ही नहीं बल्कि खुद सरसंघचालक मोहन भागवत घर वापसी का जिक्र क्यों कर देते है। और हिंदुत्व अगर जीवन पद्धति से जुड़ा है तो फिर मुसलिम या ईसाई धर्म अपनाए लोगों का धर्मांतरण कर हिंदू बनाने का मतलब है क्या, और जिस धर्मांतरण के साथ विपक्ष में रहते हुए भाजपा संघ की हिमायती नजर आती है, वही सत्ता में आते ही संघ के धर्मांतरण मिशन से खुद को पीछे क्यों कर लेती है। यानी यह क्यों कहती है कि हमारा इससे कुछ भी लेना-देना नहीं है।

दरअसल सवाल सिर्फ भाजपा का नहीं है बल्कि संघ भी हिंदुत्व शब्द के जरिए समाज के उस हिस्से से खुद को हमेशा जोड़े रखना चाहता है जो हिंदू तो हैं, लेकिन संघ का स्वयंसेवक नहीं है। यह गजब का अंतरविरोध संघ की राजनीतिक सक्रियता के वक्त खुलकर उभरा है। 1972 में मृत्यु से कुछ दिन पहले गुरु गोलवलकर ने ठाणे में दस दिन तक चिंतन बैठक की थी। और उसमें हिंदू शब्द के प्रति आसक्ति इस तौर पर जताई थी कि हिंदू शब्द नहीं रहेगा तो फिर प्राचीन भारत का सोच ही खत्म हो जाएगा।

यानी हिंदुत्व को हेडगेवार ने सभ्यता से जोड़ा तो गोलवलकर ने हिंदू शब्द के बगैर सभ्यता के सोच के भी खत्म होने का अंदेशा जताया। लेकिन वही संघ जब आपातकाल के खिलाफ राजनीतिक तौर पर सक्रिय होता है तो हिंदू शब्द को जमीन में गाड़ने से नहीं कतराता। मधु लिमये संघ के हिंदुत्व शब्द के जरिए दोहरी सदस्यता का मसला न उछालें, इसके लिए चंद्रशेखर के कहने पर सरसंघचालक देवरस और सह कार्यवाह रज्जू भैया उस वक्त हिंदू शब्द राजनीतिक तौर पर छोड़ते हैं।

इससे पहले एकनाथ राणाडे भी विवेकानंद के प्रचार और विस्तार के लिए इंदिरा गांधी के कहने पर हिंदू शब्द की जगह भारतीय शब्द अपनाते हैं। फिर संघ के भीतर का सच भी यही है कि हिंदुत्व शब्द को जीने की पद्धति के तौर पर हर स्वयंसेवक अपनाता हो, यह भी देखने को नहीं मिलेगा। नागपुर या महाराष्ट्र के किसी भी हिस्से में चले जाइए, वहां पूजापाठ करने वाले किसी भी व्यक्ति को कोई भी संघ विरोधी संघी करार देने में नहीं हिचकेगा और टिप्पणी करेगा- ‘क्या बामण (ब्राह्मण) की तरह कर रहे हो।’ और वहां संघ यह भी नहीं कहेगा कि यह स्वयंसेवक नहीं है। जबकि हिंदू धर्म की पद्धति से जीने वाला यह जरूर कहेगा कि वह तो हिंदू है। लेकिन संघ से उसका कोई वास्ता नहीं है।

दरअसल संघ परिवार के भीतर हिंदुत्व को लेकर हिंदू राष्ट्र की परिकल्पना हेडगेवार के वक्त से ही जुड़ी हुई जरूर है, लेकिन हिंदू और भारतीय शब्द को लेकर जो चिंतन संघ के भीतर होता आया है वह स्वयंसेवक को सत्ता मिलते ही हमेशा गायब भी इसलिये हो जाता है कि संघ के सामने खुद के विस्तार का सवाल सबसे बड़ा है। सत्ता स्वयंसेवक के हाथ में रहे तो विस्तार तेजी से होता है और सत्ता कांग्रेस या किसी दूसरे राजनीतिक दल के हाथ में रहे तो संघ सिमटता है। उसे सत्ता के कटघरे से निकलने में ही अपनी ऊर्जा खपानी पड़ती है।

बहरहाल हिंदुत्व और भारतीय शब्द को लेकर गोलवलकर से देवरस तक के दौर में खूब चिंतन-मंथन हुआ है कि- हिंदू शब्द तो कभी धर्म से निकला ही नहीं है। यह भौगोलिक तौर पर निकला हुआ शब्द है। हिंदू शब्द सिंधु से निकला है। यहां तक कि वैदिक साहित्य में भी हिंदू शब्द का कहीं प्रयोग नहीं किया गया है। जबकि भारतीय शब्द धर्म-संस्कृति से जरूर निकला है। ऋग्वेद में भरत यज्ञ का जिक्र है। इंद्र से भी इंडियन शब्द की कई जगहों पर व्याख्या हुई है।

फिर भी उलेमाओं को ‘जय हिंद’ से परेशानी नहीं है। लेकिन वंदे मातरम को लेकर उन्हें मुश्किल है। बावजूद इन सबके हिंदू शब्द संघ परिवार के अस्तित्व से क्यों जुड़ा हुआ है। हिंदुत्व के बगैर अगर संघ को अपनी जमीन खोखली दिखाई देती है तो फिर प्रधानमंत्री के यह कहने का मतलब क्या है कि किसी भी धर्म के अस्तित्व पर कोई हिंसक सवाल न उठाए।

हिंदुत्व और भारतीयता को लेकर जो बहस देश में सरकार और संघ परिवार को लेकर चल रही है उसके मर्म में यही है कि स्वयंसेवक सत्ता में आए तो उसे भारतीय शब्द के साथ खड़े होना है। और सत्ता में स्वयंसेवक हो तो सत्ता के बाहर के स्वयंसेवक संघ के विस्तार में हिंदू शब्द बोलेंगे। लेकिन यह रास्ता किसे मजबूत करता है और किसे कमजोर। इस बात को मुसलिमों के नाम पर उलेमा के सवालों और जवाब के लिए सरकार की जगह संघ का दरवाजा खटखटाने वाले हालात से समझा जा सकता है।

 

पुण्य प्रसून वाजपेयी (टिप्पणीकार आजतक से संबद्ध हैं।)

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