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2019 में भी वापसी कर सकते हैं नरेंद्र मोदी! ये रहे पांच बड़े संकेत

पिछले महीने इंडिया टुडे-कार्वी इनसाइट्स के मूड ऑफ द नेशन सर्वे में भी नरेंद्र मोदी को 49 फीसदी लोगों की पसंद के आधार पर पीएम पद का सबसे पसंदीदा चेहरा बताया गया था।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की फाइल फोटो। सोर्स- रॉयटर्स

2014 जैसी जीत न सही लेकिन 2019 में भी नरेंद्र मोदी सरकार बहुमत का जुगाड़ कर केंद्र की सत्ता में वापसी कर सकती है। अभी हाल ही में आए सर्वे में 48 फीसदी देशवासियों ने नरेंद्र मोदी को पीएम की पहली पसंद बताया था। चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर की संस्था इंडियन पॉलिटिकल एक्शन कमेटी (आई-पीएसी) ने ऑनलाइन सर्वे कराया था जिसके मुताबिक नरेंद्र मोदी पीएम के रूप में देश की पहली पसंद बने हुए हैं। बता दें कि किशोर फिर से बीजेपी के लिए काम करने लगे हैं। पिछले महीने इंडिया टुडे-कार्वी इनसाइट्स के मूड ऑफ द नेशन सर्वे में भी नरेंद्र मोदी को 49 फीसदी लोगों की पसंद के आधार पर पीएम पद का सबसे पसंदीदा चेहरा बताया गया था। हालांकि, पीएम बनने के बाद चार सालों में मोदी की लोकप्रियता में गिरावट आई है मगर विपक्षी चेहरों के सामने अब भी उनकी छवि विराट बनी हुई है।

विपक्षी एकता की चुनौतियां एवं नेतृत्वहीनता: कांग्रेस समेत कई क्षेत्रीय दलों की भी चाहत है कि केंद्र से नरेंद्र मोदी सरकार को उखाड़ फेंका जाय लेकिन चाहकर भी उनके बीच विपक्षी एकता नहीं बन पा रही है। गाहे-बगाहे विपक्षी दलों की एकता फ्लॉप होती रही है। लोकसभा में अविश्वास प्रस्ताव और राज्य सभा के उप सभापति के चुनाव के मौकों पर विपक्ष लामबंद नहीं रह सका और एनडीए को इसका सीधे-सीधे फायदा मिला। दरअसल, पूरा विपक्ष नेतृत्वहीनता की स्थिति का शिकार है। राहुल गांधी कांग्रेस पार्टी को नेतृत्व कर सकते हैं लेकिन तमाम विपक्ष को उनके नाम पर आपत्ति है। सीनियर नेताओं शरद पवार, ममता बनर्जी, मायावती या चंद्रबाबू नायडू राहुल के नेतृत्व को स्वीकार नहीं कर सकते। लिहाजा, ये दल स्थानीय स्तर पर सिर्फ गठजोड़ कर सकते हैं। ऐसे में लोकसभा चुनावों के लिए राष्ट्रीय स्तर पर मोदी के विकल्प के तौर पर शून्यता नजर आती है। यही विकल्पहीनता बीजेपी के लिए अभयदान का काम कर सकती है। बीजेपी सोशल मीडिया पर इससे संबंधित कैम्पेन चलाकर राहुल को मात दे सकती है।

नंबर दो वाली सीटों से उम्मीद: यह बात सच है कि अगर विपक्षी दलों ने 2019 में गठजोड़ किया तो उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, बिहार में एनडीए के खाते से कुछ लोकसभा सीटें खिसक सकती हैं लेकिन यह भी सच है कि बीजेपी ओडिशा, पश्चिम बंगाल, असम और दक्षिणी राज्यों (कर्नाटक, तेलंगाना, तमिलनाडु) में 2014 के मुकाबले बेहतर प्रदर्शन कर सकती है। साथ ही उन लोकसभा सीटों पर जीत की संभावना बन सकती है, जहां 2014 में बीजेपी उम्मीदवार नंबर दो पर रह गए थे। पश्चिम बंगाल में बीजेपी ने 2014 में 42 में से कुल 2 सीटें जीती थीं और पांच पर नंबर दो रही थी। बीजेपी को ओडिशा और पूर्वोत्तर के राज्यों से बहुत उम्मीदें हैं। हालिया सर्वे में भी दिखाया गया है कि ओडिशा में बीजेपी आगे बढ़ रही है लेकिन वहां नवीन पटनायक को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। साल 2014 में बीजेपी ने यहां 21 में से सिर्फ एक सीट पर जीत दर्ज की थी।

मोदी सरकार का कामकाज और ध्रुवीकरण: ‘मोदी नाम’ के अलावा मोदी सरकार का कामकाज और उपलब्धियां भी 2019 में बीजेपी को चुनावी बैतरणी पार कराने में सहायक साबित हो सकती हैं। पार्टी का दावा है कि जनधन योजना, उज्ज्वला योजना, सौभाग्य योजना, जननी सुरक्षा योजना, पीएम सिंचाई योजना, अंत्योदय अन्न योजना, बेटी बचाओ,बेटी पढ़ाओ योजना, दीन दयाल ग्राम ज्योति योजना जैसी दर्जनभर से ज्यादा योजनाओं से देशभर में करीब 22 करोड़ लोग लाभान्वित हुए हैं। पार्टी की कोशिश है कि उन्हें बीजेपी का वोटर बनाया जाए। कामकाज के अलावा पिछले चार साल में बीजेपी ने सामाजिक ध्रुवीकरण कर राष्ट्रवाद की हवा बनाने की भी कोशिश की है। राष्ट्रीय स्तर पर यह बीजेपी के लिए फायदेमंद हो सकता है।

सहयोगी संगठनों की साख: बीजेपी और आरएसएस के सहयोगी संगठनों की साख कांग्रेस या विपक्षी दलों के सहयोगी संगठनों से ज्यादा मजबूत है। बीजेपी को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, विश्व हिन्दू परिषद, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद, बजरंग दल, स्वदेशी जागरण मंच, भारतीय किसान संघ जैसे संगठनों का जमीनी स्तर पर साथ मिला हुआ है। ये सभी संगठन राजनीतिक मोर्चेबंदी में माहिर हैं जबकि कांग्रेस का सेवा दल और एनएसयूआई का प्रभाव नहीं के बराबर है। ऐसे में बीजेपी को सहयोग करने वाले ये संगठन 2014 की तरह फिर से 2019 के चुनावों में बीजेपी के पक्ष में हवा बना सकते हैं। चुनावी राजनीति में ग्रामीण और दूर देहाती इलाकों में चुनाव के आखिरी पल में बनाई गई राजनीतिक हवा बहुत प्रभावी होती है। फिलहाल मौजूदा परिप्रेक्ष्य में इस मामले में बीजेपी विपक्षी दलों से दो कदम आगे दिखती है।

ना, ना करते फिर से मोदी सरकार: हालिया ओपिनियन पोल के मुताबिक बीजेपी का ग्राफ दिनों दिन गिरता जा रहा है। तमाम सर्वे में यह दावा किया गया है कि 2014 के मुकाबले एनडीए को 2019 में कम सीटें मिलेंगी लेकिन साथ में यह भी दावा किया गया है कि बीजेपी को अगर बहुमत ना भी मिले तब भी सहयोगी दलों के साथ एनडीए की सरकार बन जाएगी। संभव है कि राष्ट्रीय स्तर पर राजनीतिक ध्रुवीकरण और चुनावी सभाओं में पीएम नरेंद्र मोदी के प्रभाव के वजह से एनडीए किसी तरह बहुमत का जुगाड़ कर ले। पिछले महीने इंडिया टुडे-कार्वी इनसाइट्स के सर्वे में यह भी बताया गया है कि एनडीए 228 सीटों तक सिमट सकती है और यूपीए 223 सीट पर। ऐसे में बची 92 सीटों पर छोटे दलों का कब्जा होगा। इनमें से कई दल पहले कभी बीजेपी के दोस्त रह चुके हैं। लिहाजा, बीजेपी बहुमत के लिए जरूरी 272 आंकड़ों का जुगाड़ कर सकती है क्योंकि उसके पास मोदी-शाह की प्रभावशाली जोड़ी होगी।

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