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समंदर की न‍िगरानी के ल‍िए सबसे बड़ी डील पर नरेंद्र मोदी सरकार ने उठाया पहला कदम, छह देशों की मदद और 70 हजार करोड़ रुपए से बनेंगी पनडुब्‍ब‍ियां

केंद्र सरकार ने नवंबर 2007 में "प्रोजेक्ट-75" की "जरूरत को स्वीकार" किया था लेकिन लालफीताशाही की वजह से ये सौदा लटका पड़ा था।

तस्वीर का इस्तेमाल प्रतीकात्मक तौर पर किया गया है।

भारत ने छह देशों के साथ मिलकर समंदर के अंदर सुरक्षा के लिए सबसे बड़े सौदे की पहल कर दी है। इस सौदे के तहत भारतीय शिपयार्ड में 70 हजार करोड़ रुपये की लागत से फ्रांस, जर्मनी, रूस, स्वीडन, स्पेन और जापान के सहयोग से छह एडवांस्ड स्टेल्थ पनडुब्बियां बनाने का काम शुरू किया जा सकेगा। टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार ये सौदा अपने समय से 10 साल पीछे चल रहा है। भारत के इस रक्षा कार्यक्रम को “प्रोजेक्ट-75” नाम दिया गया है। केंद्र सरकार ने पहली बार नवंबर 2007 में इसकी “जरूरत को स्वीकार” किया था। उस समय केंद्र में मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार थी। लेकिन लालफीताशाही की वजह से ये सौदा अंतिम रूप से मंजूर नहीं हो सका। इस साल मई में रक्षा मंत्रालय ने इस सौदे पर अंतिम मंजूरी दी।

टीओआई की रपट के अनुसार भारत सरकार ने पिछले हफ्ते पनडुब्बी बनाने वाली छह कंपनियों नैवेल ग्रुप-डीसीएनएस (फ्रांस), थाइसेनक्रुप मैरीन सिस्टम (जर्मनी), रोजोबोरोनएक्सपोर्ट रुबीन डिजाइन ब्यूरो (रूस), नवानतिया (स्पेन), साब (स्वीडन) और मित्सुबिशी-कावासाकी हेवी इंडस्ट्रीज कम्बाइन (जापान) को “रिक्वेस्ट ऑफ इन्फॉर्मेशन” (आरएफआई) भेजा है। इन कंपनियों से 15 सितंबर तक जवाब देने का अनुरोध किया गया है ताकि इस सौदे को आगे बढ़ाया जा सके।

जब ये कंपनियां आरएफआई का जवाब भेज देंगी तो उसे नैवेल स्टाफ क्वालिटेटिव रिक्वायरमेंट के लिए भेजा जाएगा। इन विदेशी सहयोगियों के साथ बातचीत के दौरान ही रणनीतिक समझौते के लिए भारतीय शिपयार्ड का चुनाव किया जाएगा। इस पूरी प्रक्रिया में करीब दो साल का समय लग सकता है। सौदे पर सभी पक्षों की अंतिम मुहर लगने के सात-आठ साल बाद ही पहली पनडुब्बी तैयार हो सकेगी। रिपोर्ट के अनुसार भारतीय रक्षा मंत्रालय इस पूरी प्रक्रिया को तेजी से पूरा करना चाहता है। इस प्रोजेक्ट के तहत भारतीय नौसेना पहले छह डीजल-बिजली इंजन से चलने वाली पनडुब्बियां बनवाना चाहता है जिसमें धरती पर मार करने वाली क्रूज मिसाइल, एयर-इंडिपेंडेंट प्रोपल्सन, पानी के अंदर ज्यादा देर तक रहने की क्षमता, भारतीय आयुध और सेंसर जैसी सुविधाएं हों। प्रोजेक्ट-75 के तहत 18 डीजल-बिजली पनडुब्बियां, छह परमाणु हमले में सक्षम हमलावर पनडुब्बियां (एसएसएन) और चार परमाणु ऊर्जा से संचालित पनडुब्बियां जिनमें लम्बी दूरी की परमाणु मिसाइल (एसएसबीएन) लगी हों, बनाने की योजना है।

भारतीय नौसेना के पास अभी केवल 13 पुरानी पनडुब्बियां हैं जिनमें से आधी हरदम सक्रिय रहती है। इनमें से कम से कम 10 25 साल से ज्यादा पुरानी हैं। अभी भारत के पास दो परमाणु क्षमता संपन्न पनडुब्बियां हैं। वहीं आईएनएस अरिहंत (एसएसएसबीएन) और आईएनएस चक्र भी भारतीय नौसेना के पास हैं। छह फ्रांसीसी स्कोर्पेने पनडुब्बियां मझगांव के डॉक में बन रही हैं। 23652 करोड़ रुपये लागत वाली ये पनडुब्बियां भारत को 2021 तक इस्तेमाल के लिए मिल पाएंगी।

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