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मोदी सरकार पर RTI एक्ट से ‘छेड़छाड़’ का आरोप, जानें- कानून में किन बदलावों पर मचा है बवाल

सूचना का अधिकार संशोधन बिल-2019 में मूल कानून RTI एक्ट-2005 की धारा 13 और 16 में अहम बदलाव का प्रस्ताव रखा गया है।

Author नई दिल्ली | July 24, 2019 1:12 PM
विपक्ष का तर्क है कि कानून में संशोधन से RTI एक्ट कमजोर होगा और सूचना आयोग की आजादी बाधित होगी। (प्रतीकात्मक तस्वीर)

केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने शुक्रवार (19 जुलाई) को लोकसभा में सूचना का अधिकार (RTI) संशोधन विधेयक-2019 पेश किया जिसे सदन ने चर्चा के बाद पारित कर दिया। अब यह बिल राज्यसभा में पेश किया जाएगा। अगर यह बिल राज्यसभा से भी पास हो जाता है तो राष्ट्रपति के दस्तखत करते ही पुराने बिल की जगह नया कानून स्थान लेगा।

नया कानून आने के बाद कई पुराने प्रावधान बदल जाएंगे। मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस समेत टीएमसी, बसपा, सपा, डीएमके और एआईएमआईएम नए बिल का विरोध कर रही हैं और राज्य सभा में पेश करने से पहले उसे सेलेक्ट कमेटी के पास भेजने की मांग कर रहे हैं।

नए बिल में क्या-क्या बदला?

सूचना का अधिकार संशोधन बिल-2019 में मूल कानून RTI एक्ट-2005 की धारा 13 और 16 में अहम बदलाव का प्रस्ताव रखा गया है। मूल कानून 2005 की धारा 13 केंद्रीय मुख्य सूचना आयुक्त और अन्य सूचना आयुक्तों की नियुक्ति, वेतन-भत्ते एवं सेवा शर्तों से जुड़ी है। इस धारा में कहा गया है कि सीआईसी और अन्य आईसी की नियुक्ति पांच साल के लिए या उनकी उम्र 65 साल होने तक (दोनों में से जो भी पहले हो) की जाएगी लेकिन नए प्रस्तावित बिल के मुताबिक इन आयुक्तों का कार्यकाल केंद्र सरकार तय करेगी।

धारा-13 के तहत ही इन आयुक्तों का वेतन-भत्ता एवं सेवा शर्तें परिभाषित हैं। उसके मुताबिक मुख्य सूचना आयुक्त का वेतन-भत्ता एवं अन्य सेवा शर्ते मुख्य चुनाव आयुक्त के बराबर होंगी जबकि अन्य सूचना आयुक्तों का वेतन-भत्ता एवें सेवा शर्तें अन्य चुनाव आयुक्तों के बराबर होंगी लेकिन नए कानून में प्रस्तावित किया गया है कि मुख्य सूचना आयुक्त एवं अन्य सूचना आयुक्तों का वेतन-भत्ता एवं सेवा शर्तें केंद्र सरकार द्वारा तय की जाएंगी।

सूचना का अधिकार-2005 की धारा-16 राज्यों के मुख्य सूचना आयुक्त और अन्य सूचना आयुक्तों से जुड़ी है। धारा-16 के मुताबिक इन सूचना आयुक्तों की नियुक्ति पांच साल या उनकी उम्र 65 साल होने तक (जो भी पहले हो) होगी लेकिन नए प्रस्तावित कानून के मुताबिक सभी राज्य सूचना आयुक्तों का कार्यकाल केंद्र सरकार द्वारा तय किया जाएगा।

इसी तरह मूल RTI एक्ट की धारा-16 यह उपबंध करती है कि राज्यों के मुख्य सूचना आयुक्त का वेतन भत्ता एवं अन्य सेवा शर्तें चुनाव आयुक्तों के बराबर होगी जबकि अन्य राज्य सूचना आयुक्तों का वेतन भत्ता एवं सेवा शर्तें राज्यों के मुख्य सचिव के बराबर होगी लेकिन नए संशोधित प्रस्ताव के मुताबिक इसका भी निर्णय केंद्र सरकार करेगी।

बता दें कि मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों के वेतन एवं भत्ते एवं सेवा शर्तें सुप्रीम कोर्ट के जज के बराबर होती हैं। ऐसे में मुख्य सूचना आयुक्त, सूचना आयुक्तों और राज्य मुख्य सूचना आयुक्तों एवं अन्य सूचना आयुक्तों का वेतन भत्ता एवं सेवा शर्तें सुप्रीम कोर्ट के जज के बराबर हो जाती हैं। इसे केंद्र सरकार बदलना चाह रही है। विपक्ष इसका विरोध कर रहा है।

विपक्ष का तर्क है कि इससे RTI एक्ट कमजोर होगा और सूचना आयोग की आजादी बाधित होगी। विपक्ष का आरोप है कि केंद्र सरकार पर्सन-टू-पर्सन मामले को देखते हुए उनके वेतन भत्ते, कार्यकाल और सेवा शर्तें तय करेगी। इससे सूचना का अधिकार कानून की मूल भावना से खिलवाड़ होगा। कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने तो नए संशोधन बिल को RTI उन्मूलन बिल करार दिया है। उधर, भाजपा के भी कुछ सांसद नए संशोधित बिल को सेलेक्ट कमेटी के पास भेजने की बात कर रहे हैं।

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