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पूंजी का दबदबा और लोकहित की कामना

शीतला सिंह भारत का भावी स्वरूप क्या होगा, बदलाव की दिशा देखकर इसका अनुमान किया जा सकता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आयोजन में जो शीर्ष उद्योगपतियों और व्यापारियों का जमावड़ा हुआ था, उन नामी हस्तियों की उपस्थिति ही नहीं बल्कि उनकी कार्यपद्धति से प्रभावित होकर यह भी देखना होगा कि आखिर वे किन लक्ष्यों […]

Author Published on: October 1, 2014 9:08 AM

शीतला सिंह

भारत का भावी स्वरूप क्या होगा, बदलाव की दिशा देखकर इसका अनुमान किया जा सकता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आयोजन में जो शीर्ष उद्योगपतियों और व्यापारियों का जमावड़ा हुआ था, उन नामी हस्तियों की उपस्थिति ही नहीं बल्कि उनकी कार्यपद्धति से प्रभावित होकर यह भी देखना होगा कि आखिर वे किन लक्ष्यों के प्रति समर्पित हैं।

यह लक्ष्य समाज की आवश्यकताओं को आंके बिना संभव नहीं है। लेकिन मूल्यांकन और निर्णय में यह प्रश्न महत्त्वपूर्ण हो जाता है कि इसमें विनियोजन करने वालों का साथ कितना सधेगा और जो पूंजी लगाई जाएगी, वह सुरक्षित रहने के साथ ही विस्तारित भी होगी क्योंकि संपदा और पूंजी में अंतर यही है कि एक यथारूप ही रह जाती है, लेकिन दूसरी जब पूंजी के रूप में परिवर्तित होती है तो उसमें विनियोजन करने वालों के स्वप्न, प्रयत्न, मेहनत और बुद्धि भी शामिल हो जाती है। यह सब स्वार्थों से परे नहीं हो सकता।

भारत की पुरातन पुस्तकों और शास्त्रों में भी जीवन के लिए धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष माना गया है। धर्म यहां जीवन दर्शन है जिसके बिना पदार्थ का अस्तित्व ही समाप्त हो जाता है। यह मानव उत्थान और सभी के सुख लाभ के लिए है इसलिए यह संकुचित नहीं। दूसरा स्थान अर्थ को दिया गया है जिसमें व्यक्ति और समाज का सारा प्रयत्न आता है। खाना, पीना, उठना, बैठना, चलना हमारी आवश्यकताएं हैं और उनकी पूर्ति यानी जब साधन जुटाने का प्रश्न आएगा, तब अर्थ निर्णायक तत्व हो जाएगा क्योंकि हम अपनी भूख भी बिना अर्थ का समावेश किए नहीं शांत कर सकते। इसलिए अर्थ के विभिन्न स्वरूप इसके अंतर्गत समाहित हो जाते हैं।

खैर, बात आरंभ हुई थी मोदी की अमेरिका यात्रा और उद्यमियों और व्यवसायियों के समागम में प्रधानमंत्री की भागीदारी, उसमें की गई घोषणाओं और उनके भारत की व्यवस्था पर पड़ने वाले प्रभाव की। इसलिए इस बैठक का प्रमुख सवाल उन प्रतिबंधों और उपबंधों को समाप्त करना था जो उद्यम, व्यवसाय में बाधक होते हैं या इस प्रकार का कार्य करने वालों के संकट का कारण। चूंकि हमने पूरे विश्व को विभिन्न राज्यों के रूप में बांट रखा है, इन राज्यों के संचालन और नियमन के लिए विभिन्न प्रकृतियों वाली व्यवस्थाएं भी रच रखी हैं। लेकिन इन सभी का मूल लक्ष्य राज्य का हित और रक्षा ही है।
इसके नियमन और नियंत्रण के लिए जो व्यवस्थापक सिद्धांत निर्धारित हैं, वे नियम और कानून के रूप में जाने जाते हैं। इनमें से कुछ स्वत: बाध्यकारी हैं और इनके लिए दंडात्मक व्यवस्थाओं का प्रावधान है। राज्य किन प्रमुख स्वार्थों द्वारा संचालित है, उनमें भी एकरूपता नहीं है। लेकिन जब यह प्रश्न उठता है कि राज्य की व्यवस्था की पूर्ति के लिए बाहर के लोग साझीदारी करें, तब शर्तों और प्रतिबंधों की स्वीकार्यता और उनमें ढील और प्रोत्साहन भी आवश्यक हो जाते हैं। लेकिन राज्य के हितों के प्रतिपादक न सही कम से कम उसे नुकसान पहुंचाने वाले नहीं होने चाहिए।

इसी प्रकार जैसे समाज के सभी वर्गों समुदायों के हित और स्वार्थ समान नहीं हो सकते, यह स्थिति विश्व स्तर पर भी देखी जा सकती है। लेकिन अब उसमें एक नया परिवर्तन भूमंडलीकरण के नाम से आया है कि हम राज्य की सीमाओं को उपभोक्ताओं के हित में ढील दें जिससे उत्पादक अपना माल बिना किसी व्यवधान के बेच सके। लेकिन यह क्रय और विक्रय दोनों ही लाभेतर तत्व नहीं हैं।

अब इस सिद्धांत को इस रूप में भी स्थापित किया गया है कि राज्य के वर्चस्व को द्वितीय और पूंजी के वर्चस्व की स्थापना को निर्णायक माना जाए। इसलिए यह कहा जा सकता है कि पूंजी के वर्चस्व को स्थापित करने का कारण क्या व्यक्ति की सत्ता व महत्ता घटाने का काम तो नहीं है। लेकिन तर्क यह दिया जाता है कि शरीर के अंगों के लिए पोषक तत्व चाहिए, जिनके बिना मस्तिष्क का संचालन भी कठिन होता है, इसलिए इसे स्वीकार करना ही पड़ेगा। लेकिन कठिनाई यह है कि एक ओर तो हम दुनिया में विभिन्न प्रकार की शासन व्यवस्थाओं के बजाय लोकतंत्र की ओर बढ़ रहे हैं जिसका मुख्य तत्व यानी लोक ही निर्णायक तत्व हो, लेकिन पूंजी का नियमन, नियंत्रण, संचालन लोक के हाथ में नहीं बल्कि कुछ लोगों के हाथ में ही सीमित है।
इसका विश्लेषण इस आधार पर भी किया जा सकता है कि हमने जो कंपनियां बनाईं हैं, उसमें शामिल होने वाले व्यक्ति नहीं बल्कि पूंजी की महत्ता है जो निर्णायक भूमिका निभाती है। इसलिए व्यक्ति का महत्त्व स्वत: ही कम होता जाएगा। साथ ही जिसे हम ‘स्वतंत्र चिंतन प्रक्रिया’ का नाम देते हैं और उसे अति महत्त्वपूर्ण मानते हैं क्योंकि वह दिशा निर्धारित करने में सहायक होती है, वह भी उससे प्रभावित होती है।

इस प्रकार नरेंद्र मोदी दुनिया भर में घूमकर पूंजी के वर्चस्व वाले युग में इसे अधिक संख्या में जुटाने का प्रयत्न कर रहे हैं जिससे देश में उपभोक्ता वस्तुओं और आवश्यकताओं की पूर्ति हो सके। तर्क यह दिया जाता है कि इसका लाभ तो साधारण लोग भी उठाएंंगे। लेकिन लोकतंत्र के बावजूद यह निर्णायक शक्ति समाहित कहां होगी? जहां तक नियम और कानूनों का संबंध है, वह तो युग की आवश्यकताओं के अनुरूप सत्तासीन लोगों की ओर से बनाए जाते हैं। इनकी उपादेयता भी शाश्वत नहीं बल्कि आवश्यकता परक है।

इस प्रकार चूंकि भारत दुनिया का बहुत बड़ा बाजार है, यहां 125 करोड़ उपभोक्ताओं का समूह है, जिनकी अपनी अलग-अलग आवश्यकताएं हैं इसलिए दुनिया की कंपनियां भी इस बाजार को अपनी झोली में डालने के लिए लालायित हैं।

मोदी के प्रयत्नों का स्वागत भी हो रहा है। लेकिन मूल प्रश्न तो यह है कि यह बाजारवाद किसके हितों की पूर्ति के लिए है। यह लोक की मानसिकताओं और आवश्यकताओं की कितनी पूर्ति करेगा या बाजार में स्वाभाविक रूप से शोषण की प्रवृत्तियां ही निर्णायक होंगी। इसके लिए प्रतिस्पर्धा वाले स्वार्थों में तो अंतर हो सकता है, लेकिन यह लोकहित कार्य कैसे बने, क्या इसके लिए भी नियोजक समूह तैयार है, अगर नहीं तो इस सवाल का जवाब शेष ही रह जाएगा कि आखिर करने क्या जा रहे हैं।

उद्यमियों का यह आयोजन वास्तव में भारत के बाजार को लक्ष्य बनाकर अधिकतम लाभ अर्जन का प्रयत्न है जो वर्तमान संदर्भ में इसलिए सफल हो सकता है कि कल्याणकारी राज्य की संज्ञा के नाम पर जिन राज्यों में सार्वजनिक उद्यम को व्यवस्था का नाम दिया था, वे पहल की कमी के कारण असफल हुए हैं और जनता ने उस पुरानी मान्यता को कि राज्य वास्तव में निरंकुशता का प्रतीक है, उन्हें अस्वीकार भी किया था, लेकिन पूंजी का वर्चस्व और एकाधिकार समाज में क्या गुणों की सृष्टि कर पाएगा? उसके सृजित मूल्य क्या होंगे, यह आज भी विश्लेषण और विचार का विषय है।

 

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