Narendra Modi BJP government challenge: to achieve full statehood - Jansatta
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मोदी सरकार की चुनौती: पूर्ण राज्य का दर्जा हासिल करना

प्रचंड बहुमत से दिल्ली में बनी आम आदमी पार्टी(आप) की सरकार ने शपथ लेने के 11 दिन बाद अपने सबसे लोकप्रिय वादे-400 यूनिट तक हर महीने बिजली खपत करने वाले परिवारों को आधी कीमत पर बिजली और हर महीने बीस हजार लीटर पानी मुफ्त में देने के फैसला कर लिया है। दिल्ली मंत्रिमंडल की बैठक […]

Author February 26, 2015 3:17 PM
इस बार पिछली बार से उलट सरकार सोच-समझकर फैसला कर रही है। 23 और 24 फरवरी को महज दो दिनों के लिए विधानसभा की बैठक बुलाकर अपनी मंशा जाहिर कर दी। (फ़ोटो-पीटीआई)

प्रचंड बहुमत से दिल्ली में बनी आम आदमी पार्टी(आप) की सरकार ने शपथ लेने के 11 दिन बाद अपने सबसे लोकप्रिय वादे-400 यूनिट तक हर महीने बिजली खपत करने वाले परिवारों को आधी कीमत पर बिजली और हर महीने बीस हजार लीटर पानी मुफ्त में देने के फैसला कर लिया है। दिल्ली मंत्रिमंडल की बैठक में पहली मार्च 2015 से इसे लागू करना तय किया गया। पिछली बार शपथ लेने के दूसरे ही दिन आप की सरकार ने यह फैसला ले लिया था।

इस बार पिछली बार से उलट सरकार सोच-समझकर फैसला कर रही है। 23 और 24 फरवरी को महज दो दिनों के लिए विधानसभा की बैठक बुलाकर अपनी मंशा जाहिर कर दी। केजरीवाल की 49 दिनों की पिछली सरकार और उनकी मौजूदा सरकार में जमीन आसमान का अंतर है। मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और उप मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने यह जता दिया कि सरकार अपने चुनावी वादों पर अमल करने की जल्दी में नहीं है। उप राज्यपाल के अभिभाषण, उस पर धन्यवाद प्रस्ताव और मुख्यमंत्री का जबाब एक ही दिन में संपन्न कराकर और उसे अपने वादों की लाइन पर रखकर भविष्य के लिए संकेत दे दिए। उन 49 दिनों में बिजली कंपनियों के खातों की सीएजी से जांच करवाने सहित कई फैसले किए गए थे। इस बार उससे ज्यादा और ठोस फैसले होने की उम्मीद है।

लोगों को पहले ही दिन से इसी तरह के फैसले होने की उम्मीद थी। लेकिन इस बार यह सरकार कोई ऐसा काम करने से बच रही है जिसे न कर पाने से उसकी जग हंसाई हो। इसीलिए केजरीवाल ने बिजली पर लोगों को राहत देने से पहले बिजली पर श्वेत पत्र जारी करने की घोषणा की और आज सीएजी से मिलने गए। इस सरकार को लगता है कि अगर सीएजी दिल्ली में बिजली देने वाली कंपनियों के खातों की जांच कर ले तो बिजली के दाम वैसे ही कम हो जाएंगे। मुख्यमंत्री ने अपने भाषण में यह भी कहा कि बजट लोगों के सुझाव लेकर बनाएंगे। सरकार के ज्यादातर विभागों को सीधी तरह से देख रहे सिसोदिया का कहना था कि जरूरी काम के लिए दिल्ली सरकार के पास पैसों की कमी नहीं है। यह उन्होंने राजस्व वसूली विभागों पर दबाव बनाने और चुनावी वादों की दिशा तय करने के लिए कहा। वास्तव में बजट की तैयारी में लगे केजरीवाल और उनके प्रमुख सहयोगी मनीष सिसोदिया को अधिकारियों ने दिल्ली की वित्तीय हालात बता दिए होंगे। कुल 36-37 हजार करोड़ के बजट में सरकार के पास ज्यादा कुछ तुरंत नया करने की संभावना कम है। पहले से ही दिल्ली जल बोर्ड, दिल्ली परिवहन निगम, दिल्ली मेट्रो, दिल्ली नगर निगम को दिए जाने वाले पैसों को कम करना आसान नहीं है। इतना ही नहीं राजस्व वसूली की दर दस फीसद से घट कर छह फीसद रह जाना भी नई सरकार के लिए कम चुनौती नहीं रहने वाली है।

उप राज्यपाल के अभिभाषण में दिल्ली को पूर्ण राज्य बनाने का मुद्दा उठा। अपने भाषण में मुख्यमंत्री ने उसे कड़े तेवरों के साथ नहीं दोहराया। फिलहाल तो यह मुद्दा ठंढा ही रहने वाला है लेकिन आगे इसी पर टकराव होने के अंदेशे भी हैं। 1993 में पुलिस (दिल्ली पुलिस) और जमीन (डीडीए) के बिना विधानसभा दी गई। दिल्ली के वीआइपी इलाके यानी एनडीएमसी और दिल्ली छावनी के इलाकों को इससे अलग रखा गया। नगर निगम भी अलग रही। शीला दीक्षित के लंबे प्रयासों के बाद 2011 में दिल्ली नगर निगम को तीन हिस्से में बांट तो दिया गया लेकिन उसे सीधे दिल्ली सरकार के अधीन नहीं किया गया। दिल्ली के शहरी विकास विभाग के माध्यम से उस पर दिल्ली सरकार का अप्रत्यक्ष नियंत्रण है।

दिल्ली की सरकार ने अपने प्रयासों से निगम से बिजली, पानी, परिवहन, फायर सर्विस, सीवरेज और बड़ी सड़कें अपने अधीन किया लेकिन जब दिल्ली और केंद्र में टकराव की नौबत आई तो केंद्र ने अपने अधिकार कम नहीं होने दिए। मौजूदा केंद्र सरकार तो खुलेआम दिल्ली को अधिकार देने पर कन्नी काटती नजर आ रही है।

भाजपा नेतृत्व वाली केंद्र सरकार तो जाते हुए चाहे दिखावा के लिए ही सही 18 अगस्त 2003 को दिल्ली राज्य विधेयक 2003 संसद में पेश किया। उसमें नई दिल्ली नगर पालिका परिषद (एनडीएमसी) इलाका केंद्र सरकार के पास रखने और वीआइपी सुरक्षा को छोड़कर बाकी पुलिस दिल्ली सरकार को देने की बात की गई थी।

उस विधेयक में बड़ी बात गैर एनडीएमसी इलाके की जमीन के अधिकार दिल्ली सरकार को होते। मौजूदा अधिकारों में थोड़ी ही बढ़ोतरी होती लेकिन दिल्ली तकनीकी रूप से भी केंद्र शासित प्रदेश से पूर्ण राज्य बन जाता। बाद में सरकार की ओर से पहल करके उसमें कई संशोधन कराए जा सकते थे। यह विधेयक भी राजनीतिक मुद्दे से ज्यादा कुछ भी साबित नहीं हुआ। इसे प्रवर समिति में भेजा गया और फिर इसे दफन ही कर दिया गया। कांग्रेस की अगुआई वाली यूपीए सरकार तो दिल्ली को पूर्ण राज्य बनाना तो दूर कुछ भी अतिरिक्त देने को तैयार नहीं थी। जाहिर है जिस तरह के जनादेश के साथ आप सरकार में आई है उससे लोगों की उम्मीदें बेहिसाब बढ़ी हैं। बिना केंद्र सरकार के सहयोग से दिल्ली में कोई बड़ा काम हो ही नहीं सकता है। आने वाले समय में यह तय होगा कि दोनों के रिश्ते किस तरह के रहने वाले हैं।

 

मनोज मिश्र

 

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