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अध्यादेश लाने से बचे सरकार

नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा पिछले करीब आठ महीने में आठ अध्यादेश लाने को देखते हुए राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने कहा है कि सामान्य विधेयक के लिए अध्यादेश के रास्ते से बचना चाहिए। उन्होंने संविधान का उल्लेख करते हुए कहा, अध्यादेश असाधारण परिस्थितियों में जारी करने का प्रावधान है। ऐसी चर्चाएं हैं कि सरकार राज्यसभा में […]

देश के प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थानों के छात्रों को संबोधित करने से पूर्व अभिवादन की मुद्रा में राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी। (फोटो: जनसत्ता)

नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा पिछले करीब आठ महीने में आठ अध्यादेश लाने को देखते हुए राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने कहा है कि सामान्य विधेयक के लिए अध्यादेश के रास्ते से बचना चाहिए। उन्होंने संविधान का उल्लेख करते हुए कहा, अध्यादेश असाधारण परिस्थितियों में जारी करने का प्रावधान है।

ऐसी चर्चाएं हैं कि सरकार राज्यसभा में गतिरोध के मद्देनजर कुछ विधेयकों को पारित कराने के लिए संसद का संयुक्त सत्र बुला सकती है। राज्यसभा में सरकार को बहुमत प्राप्त नहीं है। इन चर्चाओं के बीच मुखर्जी ने कहा कि इस तरीके से विधेयक पारित कराना व्यावहारिक नहीं है क्योंकि मैंने देखा है कि 1952 से आज तक केवल चार बार संयुक्त सत्र के माध्यम से विधेयक पारित किए गए।

केंद्रीय विश्वविद्यालयों और अनुसंधान संस्थानों के प्राध्यापकों और छात्रों को वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिए संबोधन के दौरान सवालों के जवाब दे रहे राष्ट्रपति के ये बयान नरेंद्र मोदी सरकार की ओर से आठ अध्यादेश लाए जाने की पृष्ठभूमि में आए हैं। मालूम हो कि उन्होंने पिछले दिनों अरुण जेटली समेत तीन वरिष्ठ केंद्रीय मंत्रियों को बुलाया था और भूमि अधिग्रहण से जुड़े अध्यादेश को लाने की तत्काल जरूरत पर सवाल किया था। हालांकि बाद में उन्होंने इसे मंजूरी दे दी थी।

अध्यादेश के बारे में समझाते हुए उन्होंने कहा कि सरकार अध्यादेश जारी करती है। लेकिन साथ ही वह छह महीने की अधिकतम सीमा के भीतर दोनों सदनों, लोकसभा और राज्यसभा से मंजूरी नहीं पा सकने की स्थिति में उसके समाप्त होने का भी जोखिम लेती है। संविधान ने यह सुनिश्चित किया है कि ऐसे प्रावधान केवल असाधारण परिस्थितियों के लिए ही हैं।

राज्यों में क्षेत्रीय दलों का वर्चस्व होने से राज्यसभा में राष्ट्रीय दलों की मौजूदगी पर असर पड़ने का जिक्र करते हुए मुखर्जी ने कहा,‘संयुक्त सत्र के माध्यम से विधेयक पारित कराना संवैधानिक प्रावधान है लेकिन यह व्यावहारिक नहीं है। मैंने 1952 से आज तक देखा है कि केवल चार बार संयुक्त सत्र द्वारा कानून पारित किए गए।’ एक अन्य सवाल के जवाब में राष्ट्रपति ने संसद और राज्य विधानसभाओं में कार्यवाही लगातार बाधित होने से इत्तेफाक नहीं जताया। उन्होंने कहा कि सत्तारूढ़ दल और विपक्ष की जिम्मेदारी है कि साथ बैठकर अवरोधों से बचने का व्यावहारिक समाधान निकालें। संसद में हंगामा करना कामकाज में हस्तक्षेप का तरीका नहीं है। हंगामे में केवल शक्ति प्रदर्शन होता है लेकिन दूसरे लोगों की बात नहीं सुनी जा सकती। संसद चलाने में सत्तारूढ़ दल की बड़ी भूमिका होती है। उसे पहल करनी चाहिए और विपक्ष को सहयोग करना चाहिए।

राष्ट्रपति ने कहा कि संसदीय हस्तक्षेप के माध्यम के तौर पर व्यवधान डालने की प्रवृत्ति बढ़ रही है। इस संदर्भ में उन्होंने कहा कि विसम्मति एक मान्यता प्राप्त लोकतांत्रिक अभिव्यक्ति है, लेकिन व्यवधान से समय और संसाधन जाया होता है और नीति बनाने की व्यवस्था को ठप्प करता है। लेकिन किन्हीं भी परिस्थितियों में कार्यवाही बाधित नहीं होनी चाहिए। एक हंगामी अल्पमत को संयत बहुमत की आवाज बंद करने की इजाजत नहीं हो सकती। उन्होंने कहा कि भारत की विविधता और उसकी बेतहाशा समस्याओं को देखते हुए इस बात की जरूरत है कि जन नीतियों और हमारे लोकतांत्रिक आदर्शों का कवच बनने के लिए संसद सर्वानुमति कायम करने का प्रभावकारी मंच बने। संसद की कार्यवाही सहयोग, सौहार्द और उद्देश्य की भावना में चलाई जानी चाहिए। वहां चर्चाओं की सामग्री और गुणवत्ता उच्च होनी चाहिए। सदन में अनुशासन और गरिमा का पूरा ख्याल रखा जाना चाहिए।

 

 

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