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नारदा केसः बेल पर उठा सवाल तो बोले सिंघवी- 2014 स्टिंग के साक्ष्य मिटाने के लिए अब तक इंतजार क्यों?

कोर्ट ने लॉ मिनिस्टर की कोर्ट में मौजूदगी पर सवाल उठाया। सिंघवी की दलील थी कि ये अहम नहीं है कि सीएम ममता बनर्जी और लॉ मिनिस्टर कहां मौजूद थे। सीबीआई ने जिस तरह से एक्शन लिया उससे साफ है कि उसकी मंशा सिरे से ही गलत थी। लोकतंत्र में गलत फैसलों के विरोध का अधिकार सभी को है।

नारदा मामले में एडवोकेट अभिषेक मनु सिंघवी ने सीबीआई के आरोपो को किया खारिज (फोटोः ट्विटर@ani)

नारदा मामले में CBI की पैरवी कर रहे सॉलिसिटर जनरल ने फिर से पुराना राग अलापा कि आरोपियों को बेल देना गलत था। टीएमसी नेताओं की तरफ से पेश सीनियर एडवोकेट अभिषेक मनु सिंघवी ने कोर्ट से पूछा कि ये स्टिंग 2014 में हुआ था। अगर आरोपियों को साक्ष्य मिटाने होते तो वो क्या अभी तक इसका इंतजार कर रहे थे। उन्हें ऐसा करना होता तो वो अब तक ये काम कर भी चुके होंगे।

सिंघवी ने सीबीआई के एक्शन पर सवाल उठाते हुए कहा कि गवर्नर 7 मई को एजेंसी को मंजूरी देते हैं। 10 मई को नई कैबिनेट शपथ लेती है। 17 मई को मामले की चार्जशीट दाखिल की जाती है और उसी दिन चारों नेताओं को अरेस्ट करके सीबीआई जेल में डाल देती है। सिंघवी का सवाल था कि जो मामला 2014 से चल रहा था उसमें आखिर इतनी भी क्या जल्दी आन पड़ी जो आनन-फानन में नेताओं को अरेस्ट कर लिया गया। सिंघवी ने कहा कि सीबीआई को लगता है कि इन चारों को अरेस्ट करके ही मामले की विवेचना सही तरीके से की जा सकती है। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने कर्नाटक कांग्रेस के नेता डीके शिवकुमार और यूपीए सरकार में गृह मंत्री रहे पी चिदंबरम के मामले में इस तरह की अवधारणा को ही सिरे से खारिज करा था। उनका कहना था कि सभी जांच में सहयोग कर रहे हैं। साल भर पहले सभी ने अपनी आवाज के सैंपल भी दिए थे। कोई भी आरोपी पूछताछ के भाग नहीं रहा तो उन्हें जेल में रखना कहां तक जायज है?

कोर्ट ने सुनवाई के दौरान लॉ मिनिस्टर की कोर्ट में मौजूदगी पर सवाल उठाया। 5 जजों की बेंच का कहना था कि क्या वो अक्सर कोर्ट में इसी तरह से जाते हैं? सिंघवी की दलील थी कि ये अहम नहीं है कि सीएम ममता बनर्जी और लॉ मिनिस्टर कहां मौजूद थे। सीबीआई ने जिस तरह से एक्शन लिया उससे साफ है कि उसकी मंशा सिरे से ही गलत थी। लोकतंत्र में गलत फैसलों के विरोध का अधिकार सभी को है। विरोध करने वाला सीएम है या फिर और कोई इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। सिंघवी का कहना था कि आरोपियों में 1 2011 से मंत्री है तो एक बीते 50 सालों विधायक बनता आ रहा है।

सुनवाई के दौरान भीड़तंत्र पर सवाल उठा तो सिंघवी ने दलील दी कि सीबीआई भीड़ की आड़ में बाकी तथ्यों पर बात ही नहीं करना चाहती। उनका सवाल था कि 1984 में दिल्ली और 2002 में गुजरात में भीड़ ने कोहराम मचाया था। क्या कोर्ट पर भीड़ का असर पड़ा था। क्या कोर्ट ने फैसला देते वक्त भीड़ को तरजीह दी? सिंघवी ने कहा कि संजय दत्त का मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा तो भारी तादाद में लोग कोर्ट के बाहर जमा हो गए। क्या कोर्ट पर उसका असर पड़ा?

कोलकाता हाईकोर्ट के पांच जजों की बेंच टीएमसी नेताओं फिरहाद हाकिम, सुब्रता मुखर्जी, मदन मित्रा और सोवेन चटर्जी के मामले की सुनवाई कर रही है। इन चारों को हाईकोर्ट ने हाल ही में जमानत दी थी। 5 जजों की बेंच सीबीआई की उस दलील पर सुनवाई कर रही है जिसमें उसने केस को ट्रांसफऱ करने की दरखास्त लगाई है। सीबीआई की तरफ से सॉलिसिटर जनकर तुषार मेहता ने पिछली सुनवाई में कोर्ट से अपील की थी कि आरोपियों की जमानत रद करके उन्हें जेल में डालना चाहिए। उनकी दलील थी कि सीएम ममता और उनकी सरकार के दबाव की वजह से आरोपियों को सीबीआई कोर्ट ने जमानत पर रिहा करने का फैसला सुनाया था। लेकिन अभी तक 5 जजों की बेंच ने उनकी बात को तवज्जो नहीं दी है।

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