पश्चिम एशिया में जारी संकट के बीच भगवान राम भारत को किस तरह पेश करते? अमेरिका, चीन और रूस के साथ भारत के संबंधों को लेकर भगवान कृष्ण क्या सलाह देते? या प्राचीन भारतीय ज्ञान परंपराएं मौजूदा ऊर्जा संकट का समाधान कैसे सुझातीं? यह कुछ ‘अटपटे’ सवाल हैं जिनपर बिहार स्थित नालंदा विश्वविद्यालय में रिसर्च किया जा रहा है।
विश्वविद्यालय के विशेष स्नातकोत्तर (Post Graduate) पाठ्यक्रम ‘इंटरनेशनल रिलेशंस एंड पीस स्टडीज’ (IRPS) के तहत रामायण, महाभारत और भारतीय ज्ञान परंपरा के आधार पर मोडर्न डिप्लेमेसी और इंटरनेशनल रिलेशन के समाधान तलाशे जा रहे हैं। माना जा रहा है कि यह अपने तरह का पहला पाठ्यक्रम है।
आधुनिक वैश्विक समस्याओं के समाधान की तलाश
नालंदा विश्वविद्यालय के कुलपति सचिन चतुर्वेदी के अनुसार, इस कोर्स का मकसक प्राचीन भारतीय परंपराओं को पुनर्जीवित करना और समकालीन वैश्विक चुनौतियों पर भारतीय ग्रंथों के जरिए सार्थक संवाद स्थापित करना है। इस पाठ्यक्रम से जुड़े रिसर्च पेपर्स पर नजर डालें तो पता चलता है कि छात्र किस तरह प्राचीन भारतीय विचारों को आधुनिक वैश्विक समस्याओं से जोड़ रहे हैं।
सचिन चतुर्वेदी ने द इंडियन एक्सप्रेस से कहा, “हाल के वर्षों में यूनिवर्सिटी ने कई बौद्धिक और बहु-विषयक शैक्षणिक पहल शुरू की हैं, जिनका उद्देश्य प्राचीन भारतीय परंपराओं को पुनर्जीवित करना और उन्हें आधुनिक वैश्विक चिंताओं के साथ जोड़ना है। कई छात्र के रिसर्च ने भारतीय ज्ञान प्रणाली को आधुनिक अंतरराष्ट्रीय संबंध, नैतिकता, शासन और रणनीतिक अध्ययन के संदर्भ में समझने की कोशिश की है। कुछ शोधों में अर्थशास्त्र के सिद्धांतों को ESG (पर्यावरण, सामाजिक और प्रशासनिक) ढांचे और भारतीय सभ्यतागत दृष्टिकोण से भी जोड़ा गया है।”
एक शोधपत्र में पारंपरिक भारतीय चिंतन को आधुनिक भारतीय विदेश नीति से जोड़ने की कोशिश की गई है, जबकि दूसरे में महाभारत के जरिए “सॉफ्ट पावर” की अवधारणा को समझाया गया है। मास्टर्स की छात्रा सुरभि रानी ने अपने शोधपत्र ‘रामायण के गठबंधनों की दृष्टि से भारत की रणनीतिक साझेदारियां’ (India’s Strategic Partnerships Through the Lens of Rāmayana Alliances) में लिखा है कि रामायण का किष्किंधा कांड कूटनीति, संप्रभुता और नैतिक हस्तक्षेप को समझने का मजबूत स्ट्रक्चर प्रदान करता है।
राम और सुग्रीव की दोस्ती का उदाहरण
रिसर्च पेपर के अनुसार, “राम और सुग्रीव का गठबंधन सिर्फ दोस्ती की कहानी नहीं बल्कि असमान साझेदारी का ऐसा मॉडल है जो मित्र धर्म, विश्वास, राजधर्म और धार्मिक यथार्थवाद पर आधारित है। यह गठबंधन प्रभुत्व के बिना साझेदारी, अधिग्रहण के बिना प्रभाव और जिम्मेदारी आधारित नेतृत्व का उदाहरण पेश करता है।”
शोधपत्र में आगे कहा गया है कि आधुनिक अंतरराष्ट्रीय संबंधों के विद्वानों स्टीफन वॉल्ट और ग्लेन स्नाइडर के गठबंधन सिद्धांतों के साथ-साथ विदेश मंत्री एस. जयशंकर की ‘विश्व बंधु’ की अवधारणा को भी इसमें जोड़ा गया है। शोधपत्र यह भी बताता है कि रामायण जैसे ग्रंथ आधुनिक कूटनीतिक विश्लेषण के उपयोगी स्रोत बन सकते हैं।
IRPS की शोधार्थी प्रीति कुमारी ने अपने शोधपत्र ‘महाभारत: नियम-आधारित व्यवस्था’ (Mahabharata: Rule-based order) में भगवान कृष्ण की ‘सॉफ्ट पावर’ रणनीति को रेखांकित किया है। शोधपत्र में कहा गया है कि कृष्ण की फिलॉसफी आधुनिक “जस्ट वॉर” सिद्धांत में वर्णित “सुप्रीम इमरजेंसी” की अवधारणा से मेल खाता है। यह अवधारणा राजनीतिक दार्शनिक माइकल वॉल्जर ने दी थी, जिसके अनुसार किसी राष्ट्र के अस्तित्व पर संकट की स्थिति में असाधारण कदम उठाए जा सकते हैं।
शोधपत्र के मुताबिक, “जिस तरह कृष्ण ने अभिमन्यु की हत्या और द्रौपदी के अपमान जैसे अधर्मपूर्ण कृत्यों के कारण कर्ण को युद्ध के नियमों का संरक्षण देने से इनकार किया, उसी तरह आधुनिक अंतरराष्ट्रीय संबंधों में भी उन आतंकवादी संगठनों या दुष्ट राष्ट्रों को संरक्षण देने पर बहस होती है जो युद्ध कानूनों का दुरुपयोग करते हैं।”
‘आहर-पाइन’ जल प्रबंधन प्रणाली का उल्लेख
ऊर्जा संकट और पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच एक अन्य शोधपत्र भी चर्चा में है। SIPS की छात्रा हिमांशी गुप्ता ने अपने शोध समुदाय की भागीदारी, पारंपरिक भारतीय ज्ञान और वैश्विक अनुभवों के आधार पर भारत के ऊर्जा बदलाव को नए नजरिए से समझना (Reframing India’s energy transition: The lens of governance through community agency, indigenous knowledge systems, and global insights) में भारतीय पारंपरिक ज्ञान और टिकाऊ विकास मॉडल का विश्लेषण किया है।
शोधपत्र में बिहार की ‘आहर-पाइन’ जल प्रबंधन प्रणाली का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि यह सामुदायिक जल वितरण का एक बेहद उन्नत मॉडल था। इसके अलावा हिमाचल प्रदेश के उदाहरण से बताया गया है कि स्थानीय समुदाय आधारित कृषि, वानिकी और जल प्रबंधन प्रणाली विकेंद्रीकृत पर्यावरणीय शासन का सफल उदाहरण हैं। यह एक ऐसी प्रणाली है जिसका बड़ी सरकार या कॉर्पोरेशन द्वारा नहीं स्थानीय स्तर समुदायों द्वारा संचालन किया जाता है।
शोधपत्र में कहा गया है, “समुदाय केवल ऊर्जा परिवर्तन का एक हितधारक नहीं, बल्कि उसकी सफलता की मूल शर्त है।” गौरतलब है कि विश्वविद्यालय अगले वर्ष से ‘शास्त्रार्थ’ जैसी पारंपरिक भारतीय वाद-विवाद पद्धतियों को भी अपने अकादमिक ढांचे में अधिक व्यवस्थित रूप से शामिल करने पर विचार कर रहा है।
सचिन चतुर्वेदी ने कहा, “जहां पश्चिमी बहसें अक्सर जीत और हार पर केंद्रित होती हैं, वहीं भारतीय ज्ञान परंपरा सामूहिक बुद्धि और निरंतर ज्ञान वृद्धि पर आधारित रही है। रामायण, महाभारत और भारतीय ज्ञान परंपरा के आधार पर हम दुनिया को संघर्ष, शांति और वैश्विक व्यवस्था को समझने का एक विशिष्ट भारतीय दृष्टिकोण दे रहे हैं।”
