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नगा समझौते से उम्मीदें कम, आशंकाएं ज्यादा: कहीं होम करते जल ना जाए हाथ

केंद्र सरकार और नगा उग्रावदी संगठन नेशनल सोशलिस्ट कौंसिल आफ नगालैंड (एनएससीएन) के इसाक-मुइवा गुट के बीच सोमवार को हुए समझौते को भले ऐतिहासिक कहा जा रहा हो, नगालैंड और उसके तीन पड़ोसी राज्यों में इसे लेकर उम्मीदें कम हैं, आशंकाएं ज्यादा।

अमेठी में मनरेगा की राशि से रोजगार और विकास के नाम पर फर्जी तरीके से 27 करोड़ रुपए हड़प लिए गए हैं। जबकि विकास के नाम पर फावडे नहीं उठे हैं।

केंद्र सरकार और नगा उग्रावदी संगठन नेशनल सोशलिस्ट कौंसिल आफ नगालैंड (एनएससीएन) के इसाक-मुइवा गुट के बीच सोमवार को हुए समझौते को भले ऐतिहासिक कहा जा रहा हो, नगालैंड और उसके तीन पड़ोसी राज्यों में इसे लेकर उम्मीदें कम हैं, आशंकाएं ज्यादा।

समझौते की शर्तों व प्रावधानों का खुलासा नहीं होने की वजह से तमाम नगा संगठन जहां अब तक इस पर कोई टिप्पणी करने से बच रहे हैं, वहीं पड़ोसी राज्यों असम, मणिपुर और अरुणाचल प्रदेश में इससे चिंताएं बढ़ रही हैं। वैसे भी 18 साल और तीन दर्जन से ज्यादा बैठकों के बाद हुए किसी समझौते को लागू करने की राह इतनी आसान नहीं होगी।

नगालैंड के मुख्यमंत्री टी.आर. जेलियांग ने तो इस समझौते का स्वागत किया है, लेकिन नगा नेशनल कौंसिल (एनएनसी) के अलावा एनएससीएन के बाकी तीन गुटों ने अब तक इस पर कोई टिप्पणी नहीं की है। छात्र संगठन नगालैंड स्टूडेंट्स फेडरेशन (एनएसएफ) ने कहा है कि शर्तों का खुलासा हुए बिना वह समझौते पर कोई टिप्पणी नहीं करेगा। दरअसल, नगा संगठनों के पास चिंता की अपनी वजह तो है तीनों पड़ोसी राज्यों के पास अपनी। नगा उग्रवादी संगठन शुरू से ही असम, मणिपुर और अरुणाचल प्रदेश के नगाबहुल इलाकों को मिला कर ग्रेटर नगालैंड के गठन की मांग करते रहे हैं। यही उनकी प्रमुख मांग है, लेकिन समझौते में इस बारे में कुछ नहीं कहा गया है।

नगा संगठन जिन तीन राज्यों के नगा-बहुल इलाकों को लेकर ग्रेटर नगालैंड के गठन की मांग करते रहे हैं, उन सबने साफ कर दिया है कि वे अपनी एक इंच जमीन भी हाथ से नहीं निकलने देंगे। वैसी हालत में होम करते हाथ जले की तर्ज पर नगालैंड में शांति बहाल होने की बजाय पूरा इलाका ही अशांत हो उठेगा। पर्यवेक्षकों की राय में इस मांग को नहीं मानने की स्थिति में किसी समझौते का कामयाब होना संभव नहीं है। दूसरी ओर, अगर एनएससीएन नेताओं ने इस मांग के पूरी हुए बिना ही समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं तो उनके लिए स्थानीय लोगों की भावनाओं को संतुष्ट करना बेहद मुश्किल होगा। ऐसी हालत में एनएससीएन का खापलांग गुट इस मांग को नए सिरे से उठा कर दोबारा उग्रवाद भड़काने का प्रयास करेगा।

हकीकत यह है कि शांति प्रक्रिया के बावजूद नगालैंड में जमीनी हकीकत जरा भी नहीं बदली है। वहां छोटे व्यापारी से लेकर सरकारी कमर्चारी तक तमाम लोग उग्रवादी संगठनों को टैक्स देने पर मजबूर हैं। एनएससीएन के तमाम गुट राज्य में अपने प्रभाव वाले इलाकों में समांतर सरकार चलाते रहे हैं। केंद्र व राज्य सरकारों ने इसकी जानकारी के बावजूद चुप्पी साध रखी है।  दूसरी ओर, खापलांग गुट शुरू से ही शांति प्रक्रिया का विरोधी रहा है। अभी बीते जून में सेना के काफिले पर हमला कर उसने साफ कर दिया है कि इलाके में शांति बहाल करने में उसकी कोई दिलचस्पी नहीं है।

पयर्वेक्षकों का कहना है कि अगर समझौते में केंद्र ने ग्रेटर नगालैंड के गठन की शर्त मान ली तो पूरा इलाका एक बार फिर अशांत हो उठेगा। दूसरी ओर, अगर एनएससीएन नेताओं ने इस मांग के पूरी हुए बिना ही समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं तो उनके लिए नगा लोगों की भावनाओं को संतुष्ट करना बेहद कठिन होगा। फिलहाल नगालैंड का भविष्य समझौते की शर्तों और प्रावधानों पर ही टिका है।

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