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पंचपर्व: दीपोत्सव…पंचोत्सव

पांच दिन तक चलने वाला दीपोत्सव ‘पंचपर्व’ कहलाता है। इन पांच दिनों में भिन्न-भिन्न देवताओं का पूजन होता है। दीपावली से एक दिन पहले चतुर्दशी तिथि को भगवान विष्णु ने माता अदिति के आभूषण चुराकर ले जाने वाले निशाचर नरकासुर का वध किया था।

दीपोत्सव का पंचपर्व, आनंद का उत्सव।

शास्त्री कोसलेन्द्रदास

दीपों के उत्सव की पौराणिक, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महिमा सर्वविदित है। दीपावली ऐसा त्योहार है, जो उत्साह और उल्लास के साथ विभिन्न प्रांतों में अनेक कृत्यों के साथ मनाया जाता है। वैसे यह पांच दिनों तक अनतरत चलने वाला उत्सव-पर्व है, जो धन त्रयोदशी से आरम्भ होकर भाई दूज तक चलता है। पर दीपावली इनके केंद्र में है। पांच दिन तक चलने वाला दीपोत्सव ‘पंचपर्वा’ कहलाता है। इन पांच दिनों में भिन्न-भिन्न देवताओं का पूजन होता है, जो धनाध्यक्ष कुबेर के पूजन से शुरू होकर मृत्यु के देवता यमराज के लिए दीपदान तक चलता है।

कुबेर एवं धन्वंतारि की पूजा
कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी धन तेरस के नाम से जानी जाती है। पौराणिक विद्वानों के अनुसार धसतेरस में ‘धन’ शब्द का संबंध संपत्ति के अधिपति कुबेर के साथ आरोग्य के प्रदाता धन्वन्तरि से भी है। इसीलिए इस दिन चिकित्सक लोग अमृतधारी भगवान धन्वन्तरि का पूजन करते हैं। प्राय: इस दिन से दीप जलाने की शुरुआत होती है, और पांच दिनों तक जलाए जाते हैं।

लोकाचार में प्रसिद्ध है कि इस दिन खरीदे गए सोने या चांदी के धातुमय पात्र अक्षय सुख देते हैं। इस नाते लोग नए बर्तन या दूसरे नए सामान धनतेरस के दिन ही खरीदते हैं। एक परंपरा यह भी है कि इस दिन नव-निधियों के नाम का उच्चारण किया जाए। नौ निधियों के नाम हैं – महापद्म, पद्म, शंख, मकर, कच्छप, मुकुंद, कुंद, नील और खर्व।

नरक चतुर्दशी है हनुमान जयंती
दीपावली से ठीक एक दिन पहले आने वाली चतुर्दशी तिथि को भगवान विष्णु ने माता अदिति के आभूषण चुराकर ले जाने वाले निशाचर नरकासुर का वध किया था। परम्परा में इसे शारीरिक सज्जा और अलंकार का दिन भी माना गया है, इसलिए इसे रूप चतुर्दशी भी कहा जाता है।

जगद्गुरु रामानन्दाचार्य ने अपने ग्रंथ वैष्णव-मताब्ज-भास्कर में लिखा है कि कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को स्वाति नक्षत्र में मंगलवार को माता अंजना के गर्भ से वायुपुत्र हनुमान का जन्म सायंकाल में हुआ था। अनेक शास्त्रीय विवेचनाओं के आधार पर यह दिन हनुमान जयंती के रूप में है। अत: श्रद्धालुओं के चाहिए कि वे इस दिन हनुमानजी का पूजन, पाठ व उत्सव का आयोजन करें। इस बार यह पर्व धनतेरस के दिन ही मनाया जा रहा है।

ज्योति पर्व है दीपोत्सव
कार्तिक अमावस्या सनातन प्रकाश पर्व के रूप में स्थापित है। यह दिन अंधेरे की अनादि सत्ता को अंत में बदल देता है, जब छोटे-छोटे ज्योति-कलश दीप जगमगाने लगते हैं। यह दिन लक्ष्मी पूजा के लिए प्रशस्त है। किसानों की बरसाती फसल दीवाली से पहले पककर तैयार हो जाती है। इस नाते यह आनंद-वितरण करने वाला उत्सव है। इस दिन सायं (जिसे प्रदोषकाल कहा जाता है) माता लक्ष्मी की आराधना की जाती है।

गणपति, कुबेर और भगवान विष्णु की पूजा भी माता लक्ष्मी के साथ होती है। सुख, सौभाग्य और सम्पत्ति की प्रदात्री भगवती सिंधुजा की पूजा नए धान और उपलब्ध पत्र-पुष्पों से होती है। स्पष्ट है कि माता लक्ष्मी के रूप में यह प्रकृति पूजन है जो शताब्दियों से चला आ रहा है। अथर्ववेद में लिखा है कि जल, अन्न और सारे सुख देने वाली पृथ्विी माता को ही दीपावली के दिन भगवती लक्ष्मी के रूप में पूजा जाता है। इसी कारण लक्ष्मी पूजन की मुख्य सामग्री गन्ना और अन्य ऐसे पदार्थ हैं, जो सर्वकाल और सार्वभौम सुलभ हैं।

गोवर्धन पूजा और अन्नकूट
दीपावली का दूसरा दिन राजा बली पर भगवान विष्णु की विजय का उत्सव है। ऋग्वेद में उल्लेख है कि भगवान विष्णु ने वामन रूप धरकर तीन पदों में सारी सृष्टि को नाप लिया था। अत: तब से आज तक यह विष्णु विजय दिवस कहलाता है। यशोदानंदन श्रीकृष्ण ने इसी दिन देवेन्द्र के मानमर्दन हेतु गोवर्धन को धारण किया था। अत: स्थान-स्थान पर नव धान्य के बने हुए पर्वत शिखरों का भोग अन्नकूट प्रसाद के रूप में वितरित किया जाता है। वामनपुराण में इसे वीर-प्रतिपदा भी कहा गया है। इस दिन गो माता एवं बैलों की विशिष्ट पूजा की जाती है।

भाई-बहन के प्रेम का भाई दूज
कार्तिक शुक्ल तृतीय को एक सुन्दर उत्सव होता है, जिसका नाम है यमद्वितीया या भाई दूज। भविष्य पुराण में आया है कि इस दिन यमुना ने अपने भाई यम को अपने घर पर भोजन करने के लिए आमंत्रित किया था। अत: आज भी इस दिन समझदार लोग अपने घर मध्याह्न का भोजन नहीं करते। लोगों को इस दिन अपनी बहन के घर में ही स्नेहवश भोजन करना चाहिए, जिससे कल्याण और समृद्धि प्राप्त होती है।

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