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मुसलमानों ने पुजारी की अर्थी तैयार करवाई, कंधा दिया और ‘राम नाम सत्य है’ कहा

मुसलिम समुदाय के लोगों ने अर्थी तैयार की। माथुर की शवयात्रा में चलने वाले हिंदू-मुसलिम सभी लोग राम नाम सत्य है का उदघोष भी कर रहे थे। सूरजकुंड पर रमेश माथुर के छोटे बेटे चंद्रमौली ने मुखाग्नि दी।

जलती चिता (फाइल फोटो)

‘अजानों से सुबह होती यहां पर आरती से शाम, कोई खुसरो को गाता है कोई मीरा के गाए श्याम, जहां हो देश का झंडा, हरा व केसरी रंग का, उसे दुनिया में कहते हैं हमारा प्यारा हिंदुस्तान’ ऐसी ही मिसाल शहीदों की सरजमीं मेरठ में कोरोना महामारी के बीच देखने को मिली। शहर के मुसलिम बहुल क्षेत्र में रहने वाले कायस्थ धर्मशाला के पुजारी रमेश माथुर की बीमारी के बाद हुई मौत में मुसलिम समुदाय के लोगों ने अर्थी को कंधा भी दिया व परिवार का ढांढस बंधाते हुए राम नाम सत्य भी बोला। मुसलिम समुदाय के लोगों ने रमेश माथुर की अर्थी तैयार करने में भी सहयोग दिया। साथ ही सूरज कुंड स्मशान घाट पहुंचकर कपालक्रिया तक साथ रहे।

68 वर्षीय रमेश माथुर कायस्थ धमर्शाला में अपनी पत्नी रेखा के साथ रहते थे। रमेश धर्मशाला की देखरेख करने के साथ ही वहां स्थित चित्रगुप्त जी मंदिर में पूजा-अर्चना भी करते थे। धर्मशाला के आसपास मुसलिम बहुल क्षेत्र है। पिछले करीब नौ दशकों से यह परिवार यहां रह रहा है। रमेश माथुर के दोनों बेटे नोएडा व दिल्ली में नौकरी करते हैं। रमेश के निधन के समय उनका छोटा बेटा चंद्रमौली माथुर मेरठ आया हुआ था। जबकि दिल्ली स्थित एक कंपनी में कार्यरत उनका बड़ा बेटा पूर्णबंदी के चलते पिता की मौत की खबर के बाद भी नहीं आ सका। आज देर शाम प्रशासन से इजाजत मिलने के बाद वह अपने घर पहुंचेगा।

रमेश माथुर पिछले करीब डेढ़-दो माह से आमाशय की आंत में गांठ को लेकर बीमार चल रहे थे। मंगलवार निधन के वक्त घर में उनकी पत्नी व छोटा बेटा चंद्रमौली उर्फ बिट्टू भी मौजूद था। पिता के निधन से पत्नी व बेटा असहाय हो गये। चंद्रमौली ने अपने पिता के निधन की सूचना अपने रिश्तेदारों व दोस्तों को दी। लेकिन पूर्णबंदी से बेटे के दो दोस्त व करीब के तीन-चार रिश्तेदार ही इकट्ठे हुए। माथुर परिवार में विलाप सुनकर पड़ोसी अकील मियां वहां पहुंचे। कुछ ही देर में रमेश माथुर के न रहने की खबर के बाद मुसलिम समुदाय के लोग धर्मशाला में जमा हो गए। मुसलिम समाज की महिलाओं ने भी माथुर के घर जाकर उनकी पत्नी रेखा का ढांढ़स बंधाया। पूर्व सभासद हिफ्जुर्रहमान ने भी माथुर के घर जाकर उनके बेटे को दिलासा दी। बाद में अकील मियां अपने कुछ लोगों के साथ अर्थी का सामान लेने गंगा मोटर कमेटी गए।

मुसलिम समुदाय के लोगों ने अर्थी तैयार की। माथुर की शवयात्रा में चलने वाले हिंदू-मुसलिम सभी लोग राम नाम सत्य है का उदघोष भी कर रहे थे। सूरजकुंड पर रमेश माथुर के छोटे बेटे चंद्रमौली ने मुखाग्नि दी। चंद्रमौली ने बताया कि पिता की तबियत खराब होने की सूचना मिलने पर वह मेरठ आ गया था। उसके बाद पूर्णबंदी के चलते उसे मेरठ में ही रहना पड़ा। पिता के निधन की सूचना उसने अपने बड़े भाई कोमल माथुर को भी दी, वह पूर्णबंदी की वजह से अंतिम संस्कार में शामिल नहीं हो सके। चंद्रमौली ने बताया कि उनके कुछ रिश्तेदार मेरठ के दूसरे क्षेत्रों के साथ ही अलीगढ़, कानपुर व मुरादाबाद में रहते हैं। लेकिन पिता के निधन की खबर पर नौचंदी में रहने वाले उसके दो दोस्त किसी तरह ही पहुंच पाए। चंद्रमौली का कहना है कि पिछले करीब 90 साल से उनके दादा के बाद हमारा परिवार यहीं रहता आ रहा है। आसपास खासी तादाद में मुसलिम समुदाय के लोगों के रहते हम और वह हर दुख-सुख में साथ-साथ होते हैं। चंद्रमौली ने कहा कि अकील चाचा हों या अनवर चाचा सभी को हम परिवार की तरह मानते हैं।

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