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जामिया, एएमयू के अल्‍पसंख्‍यक दर्जे के बचाव में आए मुस्‍ल‍िम बुद्धिजीवी, कहा- रवैए में बदलाव करे सरकार

हाल ही में सरकार की ओर से कहा गया था कि ये दोनों विश्वविद्यालय अल्पसंख्यक संस्थान नहीं हैं क्योंकि इनकी स्थापना संसद के अधिनियम से हुई है।

Author नई दिल्ली | Updated: February 14, 2016 5:24 PM
Jamia Millia Islamia University, Jamia Millia Islamia University issue, Jamia Millia Islamia University controversy, Organization Claims, hindu, muslim, Hindu Students, Hindu Students in Jamia, State newsकेंद्रीय विश्वविद्यालय जामिया मिल्लिया इस्लामिया। (फाइल फोटो)

जामिया मिलिया इस्लामिया और अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (एएमयू) के अल्पसंख्यक दर्जे को लेकर चल रही बहस के बीच मुस्लिम बुद्धिजीवियों ने रविवार को कहा कि इस मामले पर सरकार को अपने रुख में बदलाव करना चाहिए क्योंकि देश में अल्पसंख्यकों के पिछड़ेपन को शिक्षा के माध्यम से ही दूर किया जा सकता है और इसमें इन दोनों विश्वविद्यालयों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। हाल ही में सरकार की ओर से कहा गया था कि ये दोनों विश्वविद्यालय अल्पसंख्यक संस्थान नहीं हैं क्योंकि इनकी स्थापना संसद के अधिनियम से हुई है।

जामिया के इस्लामी अध्ययन विभाग के प्रोफेसर जुनैद हारिस ने कहा, ‘‘सरकार की ओर से गठित सच्चर कमेटी ने कहा था कि देश में मुसलमानों की हालत दलितों से भी खराब है। हमारा मानना है कि इस हालत में तालीम के जरिए ही सुधार किया जा सकता है। मुसलमानों की तालीम में इन दोनों संस्थानों की अहम भूमिका रही है। ऐसे में इनके साथ किसी तरह की छेड़छाड़ नहीं होनी चाहिए।’’ उन्होंने कहा, ‘‘हमारी मांग है कि सरकार इन दोनों विश्वविद्यालयों के लिए अल्पसंख्यक दर्जे को लेकर अपने रूख में बदलाव करे। यह पूरे देश का भला होगा।’’

फिल्मकार और जामिया ओल्ड ब्वॉयज एसोसिएशन के सदस्य शोएब चौधरी ने कहा, ‘‘जामिया से मैंने पढ़ाई की है। इसलिए पूरे यकीन के साथ कह सकता हूं कि जामिया में हमेशा सभी समुदायों का उचित प्रतिनिधित्व रहा है। ऐसी स्थिति शायद ही देश के किसी और विश्वविद्यालय में है।’’ उन्होंने कहा, ‘‘जामिया का अल्पसंख्यक दर्जा बरकरार रहना न सिर्फ इस विश्वविद्यालय, बल्कि सभी के हित में है। उम्मीद की जानी चाहिए कि सरकार अपने रूख को बदलेगी और मौजूदा स्थिति बरकरार रखेगी।’’

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