उज्जैन में सिंहस्थ कुंभ वर्ष 2028 में लगेगा। इससे पहले उज्जैन में सड़क चौड़ीकरण का अभियान नगर निगम चला रहा है। सड़क चौड़ी करने के लिए उज्जैन में शाही मस्जिद के कुछ हिस्सों को हटाने की तैयारी प्रशासन ने की थी लेकिन इस बीच मुस्लिम समुदाय के लोग रविवार को बड़ी संख्या में मस्जिद में जमा हुए। कुछ लोग रात भर अंदर ही रहने और जगह खाली करने से मना करने का प्लान बना रहे हैं। इलाके में लोकल पुलिस की कई कंपनियां तैनात की गई हैं और वे मस्जिद कमिटी के मेंबर और लोगों को तोड़-फोड़ में सहयोग करने के लिए मनाने की कोशिश कर रही हैं।

इस बारे में मस्जिद अधिकारियों की तरफ से फाइल की गई एक याचिका पर सोमवार को मध्य प्रदेश हाई कोर्ट में सुनवाई होगी। प्रशासन ने फिलहाल तोड़-फोड़ करने से मना कर दिया है। उज्जैन के पुलिस अधीक्षक प्रदीप शर्मा ने द इंडियन एक्सप्रेस को बताया कि पुलिस बातचीत से मामले को सुलझाने की कोशिश कर रही है।

फोर्स की तैनाती

प्रदीप शर्मा ने कहा, “हमने इलाके में शांति बनाए रखने के लिए काफी फोर्स तैनात की है। हमने इस मुद्दे पर मस्जिद कमिटी के मेंबर से बात की है और उन्हें मामले की लीगल बातें समझाई हैं। हम उन्हें खुद स्ट्रक्चर तोड़ने के लिए मनाने की पूरी कोशिश कर रहे हैं। हम अभी कोई तोड़-फोड़ नहीं कर रहे हैं और बातचीत से इसे सुलझाने की कोशिश कर रहे हैं।” हालांकि उज्जैन की मस्जिद के बाहर बवाल भी हुआ और भीड़ ने पुलिस पर पत्थर फेंके।

विरोध मस्जिद के उस हिस्से को लेकर है जो सड़क के प्रस्तावित अलाइनमेंट में आता है, जिसे उज्जैन नगर निगम 15 मीटर तक चौड़ा करने का प्लान बना रहा है। मुस्लिम समुदाय के लोगों ने सवाल उठाया है कि मस्जिद के सामने वाली बिल्डिंग को हटाकर सड़क को चौड़ा क्यों नहीं किया जा सकता। इमाम मोहम्मद इब्राहिम ने कहा कि मस्जिद को चौड़ा करने के काम से बाहर रखा जाना चाहिए। उन्होंने कहा, “यह एक धार्मिक शहर है। किसी भी धार्मिक जगह को नहीं गिराया जाना चाहिए। चौड़ीकरण धार्मिक जगहों को छोड़कर किया जाना चाहिए।”

636 साल पुरानी है मस्जिद

इब्राहिम ने दावा किया कि मस्जिद 636 साल पुरानी यानी 1390 की है। उन्होंने कहा कि पिछली सड़क चौड़ी करने की कोशिशों में धार्मिक इमारतों को छुआ तक नहीं गया था। उन्होंने कहा, “हमने हाई कोर्ट की डबल बेंच में एक पिटीशन फाइल की है, जिस पर सोमवार, 28 सितंबर को सुनवाई हो रही है। हमने प्रशासन से कहा कि हमने शरिया के हिसाब से जितना हो सका, उतना दिया, जिसमें कई दुकानें भी शामिल हैं। अब हम कोई भी मस्जिद नहीं दे सकते।”

मुस्लिम रिप्रेजेंटेटिव कमेटी के सदस्य मोहम्मद जाकिर ने कहा कि समुदाय के लोग मस्जिद में इसलिए इकट्ठा हुए थे क्योंकि वे इसे गिराने से रोकने के लिए पक्के इरादे वाले थे। जाकिर ने कहा, “मस्जिद के बारे में सरकार और प्रशासन से हमारी रिक्वेस्ट है कि इसे बख्श दिया जाए। हमारे शहर के सभी लोग पूरी रात मस्जिद में रहे हैं और अभी भी मस्जिद के अंदर ही हैं। हम मस्जिद को बचाना चाहते हैं। हम इसे किसी भी कीमत पर छोड़ना नहीं चाहते।”

ओवैसी ने जताया विरोध

इस बीच AIMIM चीफ असदुद्दीन ओवैसी ने कहा कि मुस्लिम कम्युनिटी गांधीवादी तरीके से तोड़फोड़ का विरोध कर रही है। उनका तर्क है कि मस्जिदों और दूसरी धार्मिक प्रॉपर्टी को इस तरह नहीं तोड़ा जा सकता।

मीडिया से बात करते हुए ओवैसी ने कहा कि यह विरोध वक्फ अमेंडमेंट कानून पर पार्लियामेंट में उठाई गई उनकी चिंताओं को भी दिखाता है। उन्होंने आरोप लगाया कि संशोधित कानून के तहत कलेक्टरों और सरकार को दी गई शक्तियों का मकसद अधिकारियों को मुस्लिम कम्युनिटी की मस्जिदों, दरगाहों, खानकाहों, कब्रिस्तानों और ईदगाहों पर कंट्रोल करने में मदद करना था।

ओवैसी ने चल रही कार्रवाई का जिक्र करते हुए कहा, “मैंने संसद में जो कहा था, वह अब सच साबित हो रहा है। इन घटनाओं से पता चलता है कि वक्फ संशोधन का मकसद वक्फ संपत्तियों को बचाना नहीं, बल्कि उन्हें मुसलमानों से छीनना है।”

मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने दिया था आदेश

यह विवाद मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के 9 सितंबर के आदेश के बावजूद हुआ है, जिसमें उज्जैन नगर निगम के शाही मस्जिद के प्रस्तावित रोड अलाइनमेंट एरिया में आने वाले हिस्से को हटाने के फैसले को चुनौती देने वाली दो याचिकाओं को खारिज कर दिया गया था। मस्जिद वक्फ प्रॉपर्टी के तौर पर रजिस्टर्ड है।

याचिकाकर्ताओं ने दलील दी थी कि प्रस्तावित कार्रवाई से प्रार्थना हॉल का एक हिस्सा, 120 फुट की मीनार और मज़हर चौक शाही पर असर पड़ेगा। उन्होंने संविधान के आर्टिकल 14, 25 और 26 के तहत कार्रवाई को चुनौती दी थी, साथ ही आर्टिकल 300A के तहत प्रॉपर्टी के अधिकारों की चिंताएं भी उठाई थीं।

जस्टिस संदीप एन भट्ट ने कहा कि नगर निगम ने कानूनी प्रक्रिया का पालन किया था और प्रभावित पक्षों को आपत्तियां उठाने का मौका दिया था। कोर्ट ने इस दलील को खारिज कर दिया कि मस्जिद को इसलिए अलग किया जा रहा था क्योंकि वह एक धार्मिक ढांचा था, यह देखते हुए कि निगम ने सड़क चौड़ी करने के काम के तहत पहले ही दूसरे धार्मिक ढांचों पर असर डालने वाली कार्रवाई की थी।

कोर्ट ने कहा कि उसी सड़क पर 10 मंदिरों और एक मस्जिद के कुछ हिस्से पहले ही हटा दिए गए थे, जबकि अधिकारियों ने उज्जैन में लगभग 80 धार्मिक स्थलों पर कार्रवाई की थी। इस आधार पर उसने याचिकाकर्ताओं के भेदभावपूर्ण व्यवहार के आरोप को खारिज कर दिया और कहा कि निगम को सिर्फ इसलिए मनमाने ढंग से काम करने वाला नहीं कहा जा सकता क्योंकि वह प्रॉपर्टी एक धार्मिक स्थल थी।

नगर निगम ने क्या तर्क दिया?

कोर्ट ने सड़क चौड़ी करने के प्रोजेक्ट के बड़े मकसद पर भी गौर किया। नगर निगम ने दलील दी थी कि चौड़ीकरण उज्जैन डेवलपमेंट प्लान, 2035 के तहत किया जा रहा था, और शाही सवारी, पेशवाई और सिंहस्थ 2028 के दौरान ट्रैफिक को आसान बनाने के लिए यह जरूरी था। कोर्ट ने करोड़ों भक्तों के आने की उम्मीद और इवेंट के दौरान बेहतर सुविधाएं देने और ट्रैफिक को मैनेज करने की जरूरत पर ध्यान दिया।

मस्जिद की जगह भी कोर्ट के तर्क के लिए जरूरी थी। फैसले में कहा गया कि यह महाकालेश्वर मंदिर के लगभग सामने और क्षिप्रा नदी के पास है। सिंहस्थ के दौरान आने वाली भीड़ और पब्लिक सेफ्टी और ट्रैफिक मैनेजमेंट की ज़रूरतों को ध्यान में रखते हुए कोर्ट ने पाया कि यह कार्रवाई कानून के मुताबिक और बड़े पब्लिक इंटरेस्ट में की गई थी।

कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं की इस बात पर भी ध्यान दिया कि प्रशासन मस्जिद के साथ अलग बर्ताव कर रहा है। कोर्ट ने देखा कि याचिकाकर्ता इस आधार पर कोई न कोई विवाद खड़ा कर रहे थे कि धार्मिक स्ट्रक्चर को खास ट्रीटमेंट दिया जा रहा है, और उस बात को खारिज कर दिया। कोर्ट ने आखिर में पाया कि नगर निगम ने कानून के तहत जरूरी कदम उठाए थे और आर्टिकल 226 के तहत कोई दखल देने की जरूरत नहीं थी।

हाई कोर्ट में होगी सुनवाई

हालांकि, कोर्ट के आदेश से जमीनी विवाद खत्म नहीं हुआ है। मस्जिद कमेटी ने एक बड़ी बेंच के सामने अर्ज़ी दी है, और इस मामले की सुनवाई सोमवार को होने की उम्मीद है। समुदाय के सदस्यों ने कहा है कि अगर उन्हें राहत नहीं मिली, तो वे सुप्रीम कोर्ट जाने पर विचार करेंगे। हाल के विरोध प्रदर्शनों ने सिंहस्थ के लिए उज्जैन की तैयारियों में एक और परत जोड़ दी है, क्योंकि प्रशासन सड़कों को चौड़ा करने और ट्रैफ़िक कैपेसिटी बढ़ाने की कोशिश कर रहा है, जबकि निवासी और धार्मिक समूह उन स्ट्रक्चर को हटाने का विरोध कर रहे हैं, जिनके बारे में उनका कहना है कि उन्हें बचाया जाना चाहिए।

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मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने एक खबर पर गंभीर चिंता जताई है, जिसमें बताया गया था कि जुलूस में बज रहे तेज लाउडस्पीकर के शोर के कारण सात साल के एक स्कूली बच्चे की मौत हो गई। जस्टिस सुबोध अभ्यंकर और जय कुमार पिल्लई की डिवीजन बेंच ने कहा कि अदालत के जजों ने भी काम से घर लौटते समय कई जगहों पर ध्वनि प्रदूषण के नियमों का खुलेआम उल्लंघन होते देखा। यहां क्लिक कर पढ़ें पूरी खबर…