Mumbai Rain: मुंबई में जुलाई की शुरुआत ही रिकॉर्डतोड़ बारिश के साथ हुई। महीने के पहले सात दिनों में ही कई इलाकों में सामान्य से ज्यादा बारिश दर्ज की गई। दिलचस्प बात यह है कि यह सब उस समय हुआ, जब देश पर ‘अल नीनो’ का असर माना जा रहा है। आमतौर पर अल नीनो को कमजोर मॉनसून और कम बारिश से जोड़कर देखा जाता है, लेकिन इस बार तस्वीर अलग नजर आई। वैज्ञानिकों का कहना है कि इसकी वजह यह है कि अब ग्लोबल वार्मिंग बारिश के पैटर्न को तेजी से बदल रही है, जिससे कम दिनों में बेहद तेज बारिश की घटनाएं बढ़ रही हैं।
जुलाई महीने के पहले हफ्ते में यानी 1 से 7 के बीच मौसम विभाग की कोलाबा ऑब्जर्वेटरी ने 791 मिलीमीटर बारिश दर्ज की, जो जुलाई के लिए इसके 768.5 मिमी के औसत से ज्यादा है। वहीं, मौसम विभाग की सांताक्रूज ऑब्जर्वेटरी ने 919.9 मिमी के मासिक औसत के मुकाबले 879 मिमी बारिश दर्ज की।
यह भारी बारिश ऐसे समय में हुई है जब देश ‘अल नीनो’ के असर से गुजर रहा है। अल नीनो एक मौसमी घटना है, जिसमें मध्य और पूर्वी प्रशांत महासागर में समुद्र की सतह का तापमान असामान्य रूप से बढ़ जाता है। इसके कारण अक्सर दक्षिण-पश्चिम मॉनसून की शुरुआत में देरी होती है।
हालांकि मॉनसून मुंबई में सामान्य समय से लगभग दो हफ्ते देरी से पहुंचा, लेकिन जून के आखिर तक यह सक्रिय हो गया, जिससे शहर और तटीय महाराष्ट्र के कई हिस्सों में जोरदार बारिश हुई।
वैज्ञानिकों ने कहा कि इसमें कोई विरोधाभास नहीं है। जहां अल नीनो मॉनसून के आने के समय और उसकी सक्रियता को प्रभावित करता है, वहीं ग्लोबल वार्मिंग बारिश के स्वरूप को तेजी से बदल रही है। एक बार जब मौसमी सिस्टम सक्रिय हो जाते हैं, तो कम समय में अधिक और अनियमित बारिश होने की संभावना बढ़ जाती है।
बारिश का यह हालिया दौर लंबे समय से दिख रहे रुझान के अनुरूप है। 1981 से 2000 के बीच मुंबई में औसत सालाना बारिश 2,325.8 मिमी थी। वहीं 2001 से 2024 के बीच यह बढ़कर 2,672.7 मिमी हो गई, यानी 346.9 मिमी या करीब 15 प्रतिशत की बढ़ोतरी।
तेज बारिश के पीछे का विज्ञान
जलवायु वैज्ञानिकों का कहना है कि गर्म वातावरण और तेज़ी से गर्म होते महासागरों के कारण हवा में ज़्यादा नमी बनी रहती है। नतीजतन, कई दिनों तक बारिश होने के बजाय अब कम समय में जोरदार बारिश होती है। बारिश के ऐसे दौर ड्रेनेज सिस्टम पर भारी पड़ सकते हैं, अचानक बाढ़ ला सकते हैं और शहरी बुनियादी ढांचे की कमजोरियों को उजागर कर सकते हैं।
मौसम विभाग के पूर्व महानिदेशक डॉ. के. जे. रमेश ने कहा, “अल नीनो वाले सालों में बारिश वाले दिनों की संख्या कम होती है। लेकिन हम जानते हैं कि ग्लोबल वार्मिंग के कारण मॉनसून का स्वरूप स्थायी रूप से बदल गया है।
अब बारिश अक्सर कम समय में जोरदार होती है, चाहे अल नीनो हो या न हो।” मैरीलैंड यूनिवर्सिटी में एमेरिटस प्रोफेसर और आईआईटी बॉम्बे के पूर्व प्रोफेसर डॉ. रघु मुर्तुगुडे ने कहा कि कई मौसम प्रणालियों के एक साथ आने से इतनी भारी बारिश हुई।
उन्होंने कहा, “मुंबई में बारिश देर से शुरू हुई, जिसकी एक वजह अल नीनो है। लेकिन उम्मीद के मुताबिक, पश्चिमी एशिया में ग्लोबल वार्मिंग का पैटर्न और अरब सागर की हवाओं में बदलाव ने भी इसमें भूमिका निभाई है। अरब सागर और बंगाल की खाड़ी दोनों ही मॉनसून सिस्टम में नमी पहुंचा रहे हैं, और बंगाल की खाड़ी के ऊपर कम दबाव का क्षेत्र बन रहा है।
जब दोनों सिस्टम सक्रिय होते हैं, तो मुख्य मॉनसून क्षेत्र में भारी बारिश होती है, और वह नमी मुंबई तक भी पहुंचती है। पश्चिमी घाट नमी वाली हवा को ऊपर उठने के लिए मजबूर करते हैं, जिससे शहर में भारी बारिश होती है।”
अल नीनो का ग्लोबल वार्मिंग से सीधा संबंध
उन्होंने आगे कहा कि अल नीनो को अब ग्लोबल वार्मिंग से अलग करके नहीं देखा जा सकता क्योंकि मॉनसून के व्यवहार को तय करने में दोनों का आपस में गहरा संबंध है।
इस बीच मौसम विभाग के आंकड़ों से पता चला कि मंगलवार सुबह तक के 24 घंटों में सांताक्रूज ऑब्जर्वेटरी में 94 मिमी बारिश दर्ज की गई, जबकि कोलाबा ऑब्जर्वेटरी में 90 मिमी बारिश हुई। पिछले पांच दिनों में यह पहली बार था जब दोनों ऑब्जर्वेटरी में बारिश का आंकड़ा तीन अंकों से नीचे रहा।
बृहन्मुंबई नगर निगम (बीएमसी) के अनुसार, इसी अवधि के दौरान पश्चिमी उपनगरों में 78 मिमी बारिश दर्ज की गई, इसके बाद पूर्वी उपनगरों में 77 मिमी और द्वीप शहर (आइलैंड सिटी) में 46 मिमी बारिश हुई।
हालांकि, फिलहाल बारिश का यह दौर कम होता दिख रहा है। जहां आईएमडी ने मंगलवार को मुंबई के लिए येलो अलर्ट जारी रखा था, वहीं उसके पांच दिनों के पूर्वानुमान से संकेत मिलता है कि आने वाले सप्ताह में शहर और पड़ोसी ठाणे में केवल हल्की बारिश होने की संभावना है, और भारी बारिश की कोई चेतावनी नहीं है।
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दिल्ली के दरियापुर कलां गांव में रहने वाले किसान सत्यवान सहारावत के सामने बासमती धान की खेती में कई चुनौतियां हैं। इनमें सबसे बड़ी दो समस्याएं हैं-पानी और मजदूर। पारंपरिक तरीके से धान की खेती में सबसे पहले खेत में पानी भरकर बार-बार जुताई की जाती है। इस प्रक्रिया को तकनीकी भाषा में पडलिंग कहा जाता है। इसके बाद नर्सरी में तैयार पौधों को मुख्य खेत में रोपा जाता है। इस पूरी प्रक्रिया में बहुत ज्यादा पानी की जरूरत पड़ती है। सत्यवान सहारावत बताते हैं, “सिर्फ पडलिंग में ही तीन बार सिंचाई जितना पानी खर्च हो जाता है। रोपाई के बाद पहले तीन हफ्तों तक हर दूसरे दिन खेत में 4 से 5 सेंटीमीटर पानी बनाए रखना जरूरी होता है। इसके बाद भी हफ्ते में एक बार सिंचाई करनी पड़ती है।” पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां पर करें क्लिक
