Cyber Crime: मुंबई की यह कहानी एक ऐसे खौफ की है जिसने एक हंसते-खेलते परिवार को जीते जी नर्क का अहसास करा दिया। प्रताड़ना का स्तर यह था कि एक 5 साल का मासूम बच्चा नींद में बुदबुदाने लगा था, “सर, कल कॉल करता हूं… पेमेंट हो जाएगा… प्लीज… नहीं, घर नहीं आना।”

मुंबई के अंधेरी में रहने वाले एक 37 वर्षीय बैंक कर्मचारी और उनका परिवार पिछले एक साल से पीछा किए जाने, गाली-गलौज और शारीरिक हमलों का शिकार हो रहा था। लेकिन 25 मई को मुंबई क्राइम ब्रांच के जासूसों ने उनके अपार्टमेंट पहुंचकर इस खौफनाक सिलसिले पर विराम लगा दिया।

उत्सुकता से शुरू हुआ बर्बादी का खेल

विडंबना यह है कि पीड़ित खुद मुंबई के एक अंतरराष्ट्रीय बैंक में रिलेशनशिप मैनेजर (Relationship Manager) के पद पर कार्यरत थे। एक बैंकर होने के बावजूद वे इस डिजिटल फ्रॉड के जाल में फंस गए। इसकी शुरुआत पिछले साल 17 अप्रैल को हुई, जब वे इंटरनेट पर वीडियो देख रहे थे। तभी स्क्रीन पर एक ‘Instant Loan’ का विज्ञापन आया। लोन की प्रक्रिया समझने की उत्सुकता में उन्होंने लिंक पर क्लिक कर दिया।

लिंक खुलते ही एंड्रॉइड फोन की ‘अकाउंट एग्रीगेटर विंडो’ एक्टिवेट हो गई और ऐप ने अपने आप ओटीपी (OTP) डिटेक्ट कर लिया। पीड़ित के कुछ समझने से पहले ही उनके खाते में 23,150 रुपये जमा हो चुके थे।

34 हजार लौटाए, फिर भी शुरू हुआ वसूली का टॉर्चर

खाते में पैसे आते ही पीड़ित उसे तुरंत वापस करना चाहते थे, लेकिन ऐप पर कोई आधिकारिक संपर्क नंबर या वापस करने का विकल्प (Return Policy) मौजूद नहीं था। एक हफ्ते बाद, 23 अप्रैल को पहली वसूली कॉल आई।

डर के मारे पीड़ित ने दिए गए यूपीआई (UPI) क्यूआर कोड पर ब्याज समेत 34,750 रुपये ट्रांसफर कर दिए। लेकिन खेल यहीं खत्म नहीं हुआ। जालसाजों ने कहा कि लोन पूरा चुकता नहीं हुआ है और अंतिम भुगतान के नाम पर एक APK फाइल (ऐप लिंक) भेजी। जैसे ही पीड़ित ने उस फाइल को इंस्टॉल किया, हैकर्स ने उनके पूरे मोबाइल फोन को क्लोन कर लिया, जिससे उनके निजी डेटा और कॉन्टैक्ट लिस्ट का एक्सेस धोखेबाजों के पास चला गया।

17.6 लाख का भुगतान

अगले कुछ महीनों तक इस प्रताड़ना एक चक्र बन गया। जब भी पीड़ित भुगतान करते, कर्जदाता उसे मानने से इनकार कर देते और नया ऐप डाउनलोड करवाकर फिर से पैसे वसूलते। इस जाल से निकलने के चक्कर में साल के अंत तक पीड़ित 19 अलग-अलग लोन ऐप्स के दलदल में फंस चुके थे। अप्रैल 2025 से मई 2026 के बीच वह 17.6 लाख रुपये का भुगतान कर चुके थे, इसके बावजूद आरोपियों का दावा था कि उन पर अभी भी 10.08 लाख रुपये बकाया हैं।

सामाजिक बदनामी और घर में कैद हुआ परिवार

वसूली एजेंटों ने पीड़ित का जीना मुश्किल कर दिया था। वे उनके घर आकर पड़ोसियों के दरवाजे खटखटाते और पीड़ित को डिफॉल्टर बताकर बदनाम करते थे। उनके ऑफिस के सहकर्मियों और रिश्तेदारों को फोन करके अपशब्द कहे जाते थे।

इतना ही नहीं, पिछले साल 2 दिसंबर को तीन लोग जबरन उनके घर में घुस आए और पत्नी-बच्चों के सामने पीड़ित के साथ मारपीट की। यहां तक कि उनके ऑफिस के ठीक बाहर भी उन पर हमला किया गया। खौफ के मारे इस परिवार ने खुद को घर में कैद कर लिया। वे दूध और खाना भी ऑनलाइन मंगाते थे और डिलीवरी वाले से दरवाजे के बाहर सामान छोड़ने को कहते थे।

बच्चों को धमकी और पुलिस की ढिलाई

हैकर्स ने पीड़ित की पत्नी का मॉर्फ्ड, वीडियो और तस्वीरें भेजकर जान से मारने, अपहरण और बलात्कार की धमकियां दीं। हद तो तब हो गई जब आरोपियों ने उनके बेटे की स्कूल वैन की फोटो खींचकर भेजी। घबराकर माता-पिता ने बेटे को सुरक्षा के लिए पटना (ससुर के घर) भेज दिया, लेकिन जालसाज वहां भी पहुंच गए।

इस दौरान पीड़ित ने दो बार पुलिस से संपर्क किया। बांद्रा साइबर सेल के बाहर भी उन पर हमला हुआ, लेकिन साइबर पुलिस ने यह कहकर एफआईआर (FIR) दर्ज नहीं की कि मामला 10 लाख से कम का है। एमआईडीसी (MIDC) पुलिस स्टेशन में भी शिकायत सिर्फ लिखित रूप में ली गई, कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई।

मां के आंसू और सेना के ‘ब्रिगेडियर’ की एंट्री

मई 2026 में जब पीड़ित की मां ने फोन पर दो साल से घर न आने का कारण पूछा, तो पीड़ित का सब्र टूट गया और वे फोन पर ही फूट-फूटकर रो पड़े। उन्होंने मां को सब बता दिया। इसके बाद पीड़ित के माता-पिता ने अपने भाई (पीड़ित के चाचा) से संपर्क किया, जो सेना में ब्रिगेडियर हैं। उन्होंने दिल्ली के एक वरिष्ठ अधिकारी के जरिए मुंबई के पुलिस उपायुक्त (क्राइम ब्रांच) राज तिलक रौशन से बात की। डीसीपी ने मामले की गंभीरता को देखते हुए तुरंत एक्शन लिया।

रसोई में छिपी पुलिस: 12 घंटे का गुप्त ऑपरेशन

25 मई की सुबह करीब 8 बजे, इंस्पेक्टर दिलीप तेजंकर और जयेश कुलकर्णी के नेतृत्व में 5 सदस्यीय क्राइम ब्रांच की टीम पीड़ित के घर पहुंची। पुलिसकर्मी घर की रसोई में छिप गए और पीड़ित से वसूली एजेंटों को घर बुलाने को कहा। जैसे ही पहला आरोपी घर में घुसा, पुलिस ने उसे दबोच लिया।

इस 12 घंटे के ऑपरेशन में एक मजेदार मोड़ तब आया जब नीचे इंतजार कर रहे दूसरे आरोपी ने पुलिस कंट्रोल रूम को फोन कर दिया कि उसके दोस्त का ‘अपहरण’ हो गया है। पुलिस वैन जब मौके पर पहुंची तो जाल का पता चला और पुलिस ने गैंग के 6 सदस्यों को गिरफ्तार कर लिया। गिरफ्तार आरोपियों की बात करें तो वे सुरेश वाघमारे, परेश गरिवाल, प्रवीण जाधव, प्रवीण थोरात, रवि जायसवाल और वाल्मिक गुप्ता हैं।

आरबीआई (RBI) से पंजीकृत नहीं थे ऐप्स, परिवार ने छोड़ा मुंबई

पुलिस जांच में सामने आया है कि इस घोटाले में शामिल कोई भी लोन ऐप भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) से रजिस्टर्ड नहीं था। ये सभी अवैध चीनी या फर्जी लोन ऐप्स के नेटवर्क का हिस्सा थे। पुलिस ने कई ऐप्स को चिन्हित कर उनके ऑपरेटरों को नोटिस भेजा है। इस एक साल के सदमे ने परिवार को अंदर से तोड़ दिया। हालांकि, आरोपी पकड़े जा चुके हैं, लेकिन डर के साए में जी रहे इस रिलेशनशिप मैनेजर ने मुंबई को हमेशा के लिए छोड़ने का फैसला किया। वे अपना सारा सामान (फर्नीचर, फ्रिज, वाशिंग मशीन) वहीं छोड़कर चले गए।

जाते-जाते पीड़ित ने एक बेहद जरूरी संदेश दिया, “काश मैंने शुरुआत में चुप्पी न साधी होती। मुसीबत में आपकी चुप्पी केवल आपके दुख को बढ़ाती है।”

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