रिपोर्ट: स्कूल के कैंटीन में बिकते हैं 46% जंक फूड, 50 मीटर के दायरे में मिलते वाले दूसरे खाद्य-पदार्थ हेल्दी नहीं

स्कूलों के बाहर लगने वाले स्टॉल पर मिलने वाले हाई फैट, शुगर और नमक वाले फूड प्रोडक्ट्स में 76 फीसदी बढ़ोतरी पाई गई। स्टडी के अनुसार स्कूलों में पढ़ने वाले छात्रों का बॉडी मास इंडेक्स (BMI) अधिक था।

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जंक फूड से स्टूडेंट्स की सेहत को नुकसान पहुंचने का खतरा बढ़ जाता है। (प्रतीकात्मक तस्वीर)

मुंबई के प्राइवेट स्कूलों के साथ ही सरकारी सहायता प्राप्त स्कूलों की कैंटीन में स्टूडेंट्स बर्गर, चिप्स, वड़ा पाव और समोसा जैसे जंक फूड को खूब पसंद कर रहे हैं। टाइम्स ऑफ इंडिया की खबर के अनुसार एक रिपोर्ट में यह पाया गया है कि शहर के स्कूलों की कैंटीन में जो खाने का सामान बेचा जा रहा है उनमें 46 फीसदी जंक फूड है।

रिपोर्ट के अनुसार बच्चों के लंच में भी जो फूड है वह पोषण से भरपूर नहीं है। साथ ही स्कूल के 50 मीटर के दायरे में जो खाद्य सामग्री बेची जा रही है उनमें फैट, शुगर के साथ ही नमक अधिक मात्रा में पाया गया है। यह सीधे तौर पर खाद्य सुरक्षा मानकों का उल्लंघन है।

खबर के अनुसार विट्ठल दास ठाकरे कॉलेज ऑफ होम साइंस की तरफ से यह स्टडी इस साल की शुरुआत में की गई। इसमें 7 सरकारी और 13 प्राइवेट स्कूलों को शामिल किया गया। स्टडी में पाया गया कि इन स्कूलों की कैंटीन में जो खाद्य सामग्री बेची जा रही है उनमें 46 फीसदी ऐसी हैं जिनमें फैट, शुगर और नमक की मात्रा अधिक (HFSS) हैं।

वहीं, स्कूलों के बाहर लगने वाले स्टॉल पर मिलने वाले फूड प्रोडक्ट्स में फैट, शुगर और नमक की मात्रा बढ़कर 76 फीसदी पाई गई। इतना ही नहीं बच्चे जो टिफिन स्कूल में ला रहे हैं उनमें भी फैट, शुगर और नमक की मात्रा 65 फीसदी पाई गई। रिपोर्ट में कहा गया कि सरकारी स्कूलों की तुलना में प्राइवेट स्कूलों में स्टूडेंट्स फल और सब्जियां अधिक लेकर आते हैं। इसमें पाया गया कि इन स्कूलों में पढ़ने वाले छात्रों का बॉडी मास इंडेक्स (BMI) अधिक था।

इंडियन डाइटिक एसोसिएशन की अध्यक्ष और कॉलेज प्रिंसिपल डॉ. जगमीत मदान कहती हैं कि यह बेहद चौंकाने वाला है कि स्कूलों की कैंटीन के मेन्यू में 60 फीसदी जंक फूड शामिल है। इस तरह के अनहेल्दी फूड पूरी जेनरेशन में मेटॉबॉलिक विकारों से जुड़ा खतरा पैदा कर सकते हैं।

उन्होंने कहा कि फैट हार्मोन की फैक्ट्री है। जब हार्मोन में असंतुलन पैदा होता है तो इसका मेटॉबालिक हेल्थ पर असर पड़ता है। इससे डायबिटीज, इंसुलिन प्रतिरोध, हाइपरटेंशन जैसे कई बीमारियां पैदा होती हैं। फूड एंड ड्रग एसोसिएशन कमिश्नर पल्लवी डराडे ने कहा कि अभी ‘इट राइट’ अभियान चल रहा है। इस मौजूदा अभियान के दौरान सभी सरकारी स्कूलों की कैंटीन में मौजूद मीठे और कार्बोनेटेड पेय पदार्थों की जांच की जाएगी।

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