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क्या स्वच्छ हुआ भारत? विश्व बैंक से मिली थे 19 अरब रुपये से ज्यादा की राशि

स्वच्छ भारत मिशन को लेकर किए एक सर्वे में सरकारी दावे पर सवाल उठाया गया है। इस सर्वे और सरकारी आंकड़ों में अंतर देखने को मिल रहा है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने साल 2014 में स्वच्छ भारत मिशन की शुरुआत की थी। (फाइल फोटो)

स्वच्छ भारत मिशन को लेकर किए एक सर्वे में देश की तस्वीर सरकारी दावे से अलग है। इस सर्वे में स्वच्छ भारत मिशन की सफलता को लेकर सवाल खड़े किए गए हैं।  रिसर्च इंस्टीट्यूट फॉर कमपैशनेट इकोनॉमिक्स (RICE) सर्वे के नतीजों और सरकारी आंकड़ों में काफी अंतर सामने आया है। स्वच्छ भारत मिशन मोदी सरकार की फ्लैगशिप योजनाओं में से एक है।

प्रधानमंत्री ने साल 2014 में इस कार्यक्रम की शुरुआत की थी। सरकार के आंकड़ों के अनुसार 2.5 करोड़ से अधिक की आबादी वाला हरियाणा बिल्कुल स्वच्छ है। देश के अन्य राज्यों को तरह हरियाणा को भी पूरी तरह से खुले में शौच मुक्त राज्य घोषित किया जा चुका है। इसके विपरीत विश्व बैंक समर्थित सर्वे कहता है कि हरियाणा में 0.3 फीसदी ग्रामीण आबादी खुले में शौच के लिए जाती है।

विश्व बैंक समर्थित स्टडी में आधे दर्जन से अधिक सर्वेयर शामिल थे। दो शोधकर्ताओं ने सर्वे के तरीके और इसके परिणाम के संबंध में महत्वपूर्ण चिंता व्यक्त की है। सर्वे में पाया गया कि हरियाणा के शिकरवा में कम से कम 330 ग्रामीण शौचालय, पानी के अभाव के साथ ही पुरानी आदत के कारण अभी भी खुले में शौच के लिए जाते हैं। पास ही के नगला कानपुर गांव में भी स्थिति इससे बहुत अलग नहीं है। शोध में खुले में शौच को बीमारियों के साथ ही जल के प्रदूषित होने को परजीवियों के फैलने से जोड़ा गया है।

10 करोड़ शौचालय का निर्माणः पीएम नरेंद्र मोदी ने उत्तर भारत की एक रैली में हाल ही में कहा था कि स्वच्छ भारत मिशन के तहत देश में 10 करोड़ शौचालय का निर्माण हो चुका है। स्वच्छ भारत मिशन में विश्व बैंक 19 अरब रुपये से अधिक की आर्थिक मदद कर रहा है। इस कार्यक्रम को अक्तूबर 2019 में पूरा होना था। वहीं, आलोचकों का कहना है कि स्वच्छ भारत मिशन के सरकारी आंकड़े सफलता को बढ़ाचढ़ाकर दिखा रहे हैं।

आंकड़े गुमराह करने वालेः  विश्व बैंक के सर्वे पर एक शोधकर्ता पायल हथी ने कहा, ‘इसमें मुख्य बात लोगों के स्वास्थ्य को लेकर है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि आंकड़े गुमराह करने वाले हैं।’ विश्व बैंक के समर्थन वाले नेशनल एनुअल रूरल सैनिटेशन सर्वे (NARSS) का कहना है कि 10 फीसदी भारतीय खुले में शौच के लिए जाते हैं। इसी टाइमलाइन पर गैर लाभकारी रिसर्च इंस्टीट्यूट फॉर कमपैशनेट इकोनॉमिक्स (RICE) के एक अन्य सर्वे में कहा गया है कि देश के चार बड़े राज्यों में 44 फीसदी ग्रामीण आबादी खुले में शौच के लिए जाती है।

सरकार की उपलब्धि को कम आंकने की कोशिशः RICE के सर्वे पर पेयजल और स्वच्छता मंत्रालय ने ई-मेल के जरिये कहा कि यह संगठन बार-बार स्वच्छ भारत मिशन के संबंध में सरकार की उपलब्धियों को कम करके आंकने का प्रयास कर रहा है। रिसर्चर हथी और उनके साथी रिसर्चर निखिल श्रीवास्तव यह भी कहते हैं कि NARSS सर्वे के डिजाइन को लेकर कई खामियां हैं।

ये दोनों कहते हैं कि NARSS के जो रिजल्ट हैं वह ‘असंभव’ हैं और इन्हें एकत्र करने में काफी कम समय व्यतीत किया गया है। बिहार, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ और कर्नाटक में काम करने वाले सर्वेयरों ने नौकरी जाने के डर से अपना मान बताने से इनकार कर दिया। रिसर्चर हथी और उनके साथी रिसर्चर निखिल श्रीवास्तव RICE ही जुड़े हुए हैं।

कर्नाटक खुले में शौच मुक्त, फिर भी शौच के लिए बाहर जाते हैं ग्रामीणः रायटर्स ने भी दक्षिण भारत के कर्नाटक के कोप्पल जिले के 7 गांवों का दौरा किया। यहां कम से कम 150 लोग खुले में शौच करने जाते हैं। जबकि केंद्र सरकार कर्नाटक को भी पूरी तरह से खुले में शौच मुक्त घोषित कर चुकी है। दक्षिण भारत के साथ ही उत्तर भारत में कई लोगों ने रॉयटर्स से बताया कि खेतों के पास शौचालय के अभाव और शौचालयों का सही तरीके से निर्माण नहीं होने के कारण लोग खुले में शौच के लिए मजबूर हैं।

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