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महिलाओं के लिए आसान नहीं घर से दफ्तर की डगर

सारी महिलाओं के पास घर में काम करने के लिए सुरक्षित और शांत माहौल नहीं होता है। ऊपर से घर पर रहें तो बुजुर्गों और बच्चों के देखभाल की जिम्मेदारी भी उन पर आ जाती है, और यह जिम्मेदारी तो पूरे चौबीस घंटे की होती है।

आकांक्षा झा, पूजा प्रियंवदा और मोनामी बसु।

केंद्र सरकार के घर से काम करने के दिशानिर्देश से पहले ही बहुत सी कंपनियों ने कर्मचारियों को जो घर से काम करने का विकल्प दिया था उसे लेकर आशंका और आश्वासन की स्थिति बनी हुई है। बहुत सारी महिलाएं इस व्यवस्था से खुश हैं तो कई ऐसी महिलाएं हैं जो इस व्यवस्था के साथ सहज नहीं हो पा रही हैं।

तनमीत ट्रेडिंग एंड सर्विसेज प्राइवेट लिमिटेड की एमडी आकांक्षा झा का कहना है कि मेरे लिए घर से बाहर जाने का जरिया ही मेरा काम था। बाहर जाना रुक जाने से मैं बंध गई हूं। मैं एक परंपरावादी परिवार का हिस्सा हूं और अब तक का सारा संघर्ष घर के बाहर जाकर काम कर अपनी पहचान बनाने का था। मेरे घरवालों को पसंद नहीं है मेरा घर से बाहर जाना और वे तो इस हालात को लेकर खुश हैं कि मेरा घर से निकले बिना ही काम चल जाए। मैं अपने काम को लेकर बहुत समर्पित हूं और कई बार तो एक दिन में 16 घंटे काम कर भी संतुष्ट नहीं हो पाती हूं।

आकांक्षा झा का कहना है कि अब जबकि पिछले 50 दिनों से भी ज्यादा मैं अपने काम को लेकर बाहर नहीं जा पा रही हूं तो मेरे अंदर इसे लेकर अवसाद पैदा हो रहा है। घर से काम को लेकर कारोबारी स्तर पर तो चीजें काबू में आ रही हैं, जो बिजनेस नेटवर्क टूट रहा है उसकी भरपाई भी हो जाएगी। अभी हम सरकार के निर्देश के अनुसार खुद को तैयार कर रहे हैं कि दुकानें कैसे खोलनी हैं।

पटना और सिलीगुड़ी में अपनी दुकानों को विषाणुमुक्त करवा रही हूं। लेकिन जो सबसे अहम है कि मेरी पहचान मुझे घर के बाहर ही मिलती है और उससे ही बनता है खुद पर भरोसा। मैं ऐसे लोगों से मिलती थी जो मेरी तारीफ करते थे, उन लोगों के बीच काम करती थी जिनके लिए मेरा महत्व था। अभी मैं घर में कितना भी बढ़िया खाना बना लेती हूं तो घरवालों का रवैया यही रहता है कि ये सब तो तुम्हारा काम था और ये सब करके किसी तरह की तारीफ की भी उम्मीद नहीं करो।

वहीं अपनी कारोबारी उपलब्धि के लिए घर के बाहर मेरी तारीफ होती है, मेरे जरिए जिनको रोजगार मिल रहा है उनके लिए मैं बहुत महत्व रखती हूं। बिना अपने सामाजिक दायरे में घुले-मिले मेरी अब तक की सारी मेहनत बर्बाद हो जाएगी। कम से कम मेरी जैसी महिलाओंं के लिए घर से अपना कारोबारी काम करना अवसाद भरा है जो कि अपनी पहचान पाने के लिए ही घर से बाहर निकली थीं।
लेखिका, अनुवादक और स्तंभकार पूजा प्रियंवदा का कहना है कि मैं तो पिछले ग्यारह सालों से घर से काम कर रही हूं। ये ज्यादातर महिलाओं के लिए दुगुना तनाव है।

सारी महिलाओं के पास घर में काम करने के लिए सुरक्षित और शांत माहौल नहीं होता है। ऊपर से घर पर रहें तो बुजुर्गों और बच्चों के देखभाल की जिम्मेदारी भी उन पर आ जाती है, और यह जिम्मेदारी तो पूरे चौबीस घंटे की होती है।

दिल्ली विश्वविद्यालय के कमला नेहरू कॉलेज में अर्थशास्त्र की प्रोफेसर मोनामी बसु का कहना है कि सबसे पहली बात तो आम घरों में बच्चों की देखभाल की जिम्मेदारी महिलाओं पर आती है। तो घर से काम करने का सकारात्मक पक्ष भी है। लेकिन घरों का माहौल ऐसा होता है कि बच्चे अपनी जरूरतों के लिए मां पर निर्भर होते हैं तो मां के घर पर होने से उनकी उम्मीद भी बढ़ जाती है। तो ऐसे में महिलाओं के लिए घर पर एकाग्र होकर काम करना मुुश्किल हो जाता है।

मोनामी बसु का कहना है कि मैं पढ़ाती हूं और मेरा काम तो घर से बिलकुल नहीं हो सकता है। अभी तक तो घर से आॅनलाइन कक्षाएं लेने का अनुभव बहुत बुरा रहा है। हमारे पास हर वर्ग के विद्यार्थी आते हैं और कई विद्यार्थियों के पास इतना पुख्ता साधन नहीं है कि वे आॅनलाइन कक्षाओं में ठीक से जुड़ सकें। तो सबसे पहले जब शिक्षक को यह एहसास हो जाए कि वह विद्यार्थियों के साथ जुड़ ही नहीं पा रहा है तो फिर वह अपने काम से तो असंतुष्ट ही रहेगा। अभी तक का मेरा वर्क फ्रॉम का अनुभव यही कहता है कि यह संभव नहीं और हमें अपनी कक्षाओं में जल्द से जल्द लौटने के इंतजाम करने ही होंगे।

दिल्ली में एक आइटी कंपनी में काम करने वाली सुजाता (आग्रह पर बदला हुआ नाम) का कहना है कि घर से दफ्तर उन घरों में ही संभव हो सकता है जहां पुरुष और महिलाओं के संबंधों को लेकर आदर्श स्थिति है। मैं एक पारंपरिक परिवार से आती हूं और मुझे बाहर जाकर नौकरी करने की इसलिए आजादी थी कि सिर्फ पति की कमाई से घर नहीं चल सकता है।

मार्च के अंतिम हफ्ते में मुझे और मेरे पति को एक साथ वर्क फ्रॉम होम मिला। दोपहर दो बजे हम घर में खाने की मेज पर बैठे तभी दफ्तर से एक जरूरी फोन आया और मैं बीच में खाना छोड़ फोन चेक कर कुछ आंकड़े बताने लगी, जिससे नाराज होकर मेरे पति ने मुझे कुछ आपत्तिजनक बातें कहीं जो फोन से मेरे बॉस के कानों में पड़ीं जिसके लिए उन्होंने बाद में मुझे ताना भी मारा। अब मैं अपने बॉस से बहस करती हूं तो वे घर में मेरे हालात का ताना मारते हैं।

मेरे घरवालों को लगता है कि मेरे दफ्तर वालों को ये समझना चाहिए कि मुझे घर के काम करने होते हैं तो उन्हें मुझे रियायत देनी चाहिए। उन्हें लगता है कि मैं ही रियायत नहीं मांगती हूं और दफ्तर को गैरजरूरी समय देती हूं। सुजाता ठंडी सांस लेते हुए कहती हैं कि महिलाओं के लिए घर से काम करना अच्छा नहीं है। दफ्तर में तो संविधान और कानून से मिले अधिकार हैं, लेकिन घर के अंदर आपके पास सिर्फ कर्तव्य है। हमारे घरों का ढांचा अभी उतना अच्छा नहीं है कि हम घर से बहुत सहज होकर अपने काम कर सकें।

पिछले 50 दिनों से भी ज्यादा समय से मैं अपने काम को लेकर बाहर नहीं जा पा रही हूं तो मेरे अंदर इसे लेकर अवसाद पैदा हो रहा है। अभी हम सरकार के निर्देश के अनुसार खुद को तैयार कर रहे हैं -आकांक्षा झा

मैं तो पिछले ग्यारह सालों से घर से काम कर रही हूं। ये ज्यादातर महिलाओं के लिए दुगुना तनाव है। सारी महिलाओं के पास घर में काम करने के लिए सुरक्षित और शांत माहौल नहीं होता है। -पूजा प्रियंवदा

बच्चे अपनी जरूरतों के लिए मां पर निर्भर होते हैं तो मां के घर पर होने से उनकी उम्मीद भी बढ़ जाती है। ऐसे में महिलाओं के लिए घर पर एकाग्र होकर काम करना मुुश्किल हो जाता है।– मोनामी बसु

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