जून 2026 के खत्म होने में सिर्फ 2 दिन बचे हैं और इस बार सामान्य से 43 फीसदी कम बारिश हुई है। ऐसे में यह महीना अब तक का सबसे सूखा महीना साबित हो सकता है। जून मॉनसून सीजन का पहला महीना होता है, जिसमें लगभग 165.3 मिमी बारिश की उम्मीद रहती है, जो पूरे देश के लिए लंबे समय का औसत है।
1901 से जब से भारत में बारिश के रिकॉर्ड मौजूद हैं, सिर्फ़ चार साल ऐसे रहे हैं जब जून में बारिश 100 मिमी से कम बारिश हुई है। 1905, 1926, 2009 और 2014 में 100 मिमी से कम बारिश हुई थी। सबसे सूखा जून 2009 में था जब भारत में सिर्फ़ 87.5 मिमी बारिश हुई थी।
अभी तक सिर्फ 85.2 मिमी बारिश
इस साल रविवार तक देश में सिर्फ़ 85.2 मिमी बारिश रिकॉर्ड की गई है। जून में इतनी बड़ी कमी से सीज़नल अनुमान को फिर से देखने की ज़रूरत पड़ सकती है। मौसम विभाग (IMD) ने जून के लिए 92% और चार महीने के मॉनसून सीज़न के लिए 90% बारिश का अनुमान लगाया था। बाकी महीनों में एल नीनो का असर पड़ सकता है, जो अभी अपने पीक पर नहीं पहुंचा है और लगातार मज़बूत हो रहा है।
जून में 100 मिमी से कम बारिश वाले चार सालों में से तीन साल (1926, 2009 और 2014) भी एल नीनो से प्रभावित थे। हालांकि 1926 में मौसमी बारिश ने जून की कमी को पूरा कर दिया और नॉर्मल से 11% ज़्यादा रही। 2009 और 2014 में मौसमी बारिश 90% से कम थी।
कम बारिश में एल नीनो का कितना रोल?
द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार जून की बारिश को कम करने में एल नीनो का बहुत कम रोल था। प्रशांत महासागर में समुद्र-एटमोस्फेरिक इंटरेक्शन, जो दुनिया भर के मौसम पर असर डालता है, वह जून के पहले हफ़्ते के आसपास सामने आया था, लेकिन भारतीय इलाके पर इसका असर कुछ समय बाद साफ़ होगा।
जून में कम बारिश के दूसरे कारण (लोकल और ग्लोबल) भी हो सकते हैं। महीने के ज़्यादातर दिनों में मॉनसून की हवाएँ काफ़ी कमज़ोर रहीं। 4 जून को केरल में मॉनसून के आने के बाद, 8 से 15 जून तक इसकी रफ़्तार रुकी रही और 18 जून के बाद ही इसमें तेज़ी आई। इसके अलावा मैडेन जूलियन ऑसिलेशन (MJO) (इक्वेटोरियल इलाके में बारिश लाने वाला एक क्लाउड सिस्टम) मॉनसून को सपोर्ट करने के लिए सही समय पर नहीं था। वहां चल रही सूखी उत्तरी हवाएं इस इलाके पर हावी रहीं और कमजोर मॉनसून हवाओं को आगे बढ़ने से रोकती रहीं।
दिल्ली और उत्तर भारत के बड़े हिस्सों में मॉनसून के आगे बढ़ने में अभी देरी हो रही है और अब इसके जुलाई की शुरुआत में आने की उम्मीद है। खास बात यह है कि मई के आखिर और जून में नॉर्थ इंडियन ओशन बेसिन में कोई लो प्रेशर सिस्टम या साइक्लोन नहीं आया। प्री-मॉनसून के आखिर में बनने वाले साइक्लोन या लो प्रेशर सिस्टम अक्सर नमी लाते हैं और मॉनसून के शुरू होने और आगे बढ़ने के दौरान उसे रफ़्तार पकड़ने में मदद करते हैं।
मई में आते हैं चक्रवात
मई भारत के लिए सबसे ज़्यादा चक्रवात वाले महीनों में से एक है। पिछले कुछ वर्षों में हिंद महासागर क्षेत्र में हर साल मई के अंत या जून की शुरुआत में कम से कम एक बड़ा चक्रवात उभरा है। 2024 में रेमल, 2023 में मोचा और बिपरजॉय, 2022 में असानी और 2021 में तौक्ता चक्रवात आया था। 2025 और 2026 में प्री-मानसून अवधि में चक्रवाती तूफानों का कोई डेवलपमेंट नहीं हुआ।
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