एक समय था जब मानसून आते ही कई दिनों तक आसमान बादलों से घिरा रहता था। कभी हल्की तो कभी मध्यम बारिश लगातार होती रहती थी। खेतों में नमी बनी रहती थी, नदियां धीरे-धीरे भरती थीं और लोगों को यह भरोसा होता था कि अब कुछ हफ्तों तक बारिश का सिलसिला चलता रहेगा। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में यह तस्वीर तेजी से बदली है। अब कई इलाकों में 8 से 10 दिन तक बारिश नहीं होती, फिर अचानक कुछ घंटों में इतनी तेज वर्षा हो जाती है कि शहरों में बाढ़ जैसे हालात बन जाते हैं। आखिर ऐसा क्यों हो रहा है? मौसम वैज्ञानिकों का कहना है कि भारत में मानसून खत्म नहीं हुआ है, बल्कि उसका स्वभाव बदल रहा है।
दरअसल, पहले मानसून की बारिश अपेक्षाकृत समान रूप से बंटी होती थी। बारिश कई दिनों तक अलग-अलग दौर में होती रहती थी, जिससे मिट्टी लगातार नम रहती थी और जल स्रोत धीरे-धीरे भरते थे। अब स्थिति यह है कि कुल मौसमी वर्षा कई बार सामान्य के आसपास रहने के बावजूद उसका वितरण असंतुलित हो गया है। यानी जितनी बारिश पहले दस दिनों में होती थी, उसका बड़ा हिस्सा अब एक-दो दिन या कुछ घंटों में ही गिर जाता है। इसी कारण लंबे सूखे अंतराल और अचानक मूसलाधार बारिश दोनों साथ-साथ देखने को मिल रहे हैं।
इस बदलाव की सबसे बड़ी वजह जलवायु परिवर्तन मानी जा रही है। पृथ्वी का औसत तापमान लगातार बढ़ रहा है। वैज्ञानिक बताते हैं कि गर्म वातावरण अपने भीतर पहले की तुलना में अधिक जलवाष्प रोक सकता है। जब मौसम की अनुकूल परिस्थितियां बनती हैं, तो यही अतिरिक्त नमी एक साथ भारी बारिश के रूप में गिरती है। इसलिए अब लगातार हल्की बारिश कम और अत्यधिक तीव्र बारिश की घटनाएं ज्यादा देखने को मिल रही हैं। यही कारण है कि कुछ घंटों में महीने भर जितनी बारिश रिकॉर्ड हो जाती है।
मानसून के नए मिजाज की वजह समुद्र का बदलता तापमान भी है
समुद्र का बदलता तापमान भी मानसून के इस नए मिजाज के पीछे एक बड़ा कारण है। अरब सागर और हिंद महासागर पहले की तुलना में अधिक गर्म हो रहे हैं। गर्म समुद्र अधिक नमी पैदा करते हैं, लेकिन यह नमी पूरे मौसम में समान रूप से नहीं बरसती। जब कोई कम दबाव का क्षेत्र या मानसूनी प्रणाली मजबूत होती है, तो यही नमी अचानक बहुत तेज बारिश का कारण बन जाती है। कई वैज्ञानिक अध्ययनों में मध्य भारत और पश्चिमी भारत में अत्यधिक वर्षा की घटनाओं में वृद्धि दर्ज की गई है, जिसे समुद्र के बढ़ते तापमान से भी जोड़ा गया है।
मानसून के ‘एक्टिव’ और ‘ब्रेक’ चरण भी पहले की तुलना में ज्यादा स्पष्ट दिखाई देने लगे हैं। मौसम विभाग (आईएमडी) के अनुसार मानसून के दौरान कुछ दिन ऐसे होते हैं जब बारिश बहुत सक्रिय रहती है और कुछ दिन ऐसे जब बारिश लगभग रुक जाती है। पहले भी यह प्रक्रिया होती थी, लेकिन अब ब्रेक चरण कई इलाकों में अधिक लंबा महसूस होने लगा है।
परिणाम यह है कि लोग कई दिनों तक बारिश का इंतजार करते रहते हैं और फिर अचानक एक-दो दिन में रिकॉर्ड बारिश हो जाती है। यही बदलाव लोगों को यह महसूस कराता है कि पहले जैसी लगातार बारिश अब नहीं होती।
मानसून की इस बदलती चाल में अल नीनो जैसी वैश्विक मौसमी घटनाओं की भी भूमिका होती है। प्रशांत महासागर का असामान्य रूप से गर्म होना समुद्री हवाओं और वायुदाब के संतुलन को प्रभावित करता है। इसका असर भारतीय मानसून पर पड़ता है और कई बार बारिश सामान्य से कम या असमान रूप से होती है। दूसरी ओर, मानसून ट्रफ का हिमालय की ओर खिसक जाना भी उत्तर भारत के मैदानी इलाकों में लंबे सूखे अंतराल का कारण बन सकता है। यानी मानसून आता तो है, लेकिन उसकी बारिश पहले जैसी लगातार नहीं रहती।
बदलते मानसून के पीछे केवल जलवायु परिवर्तन ही जिम्मेदार नहीं है। तेजी से हो रही वनों की कटाई, बढ़ता प्रदूषण और अनियोजित शहरीकरण भी स्थानीय मौसम को प्रभावित कर रहे हैं। जंगल कम होने से नमी का प्राकृतिक चक्र कमजोर पड़ता है, जबकि वायु प्रदूषण बादलों के बनने और बारिश की प्रक्रिया को प्रभावित करता है। कंक्रीट के फैलते शहर भी स्थानीय तापमान बढ़ाकर मौसम के व्यवहार में बदलाव ला रहे हैं। इन सभी कारणों का संयुक्त असर मानसून के पैटर्न पर दिखाई दे रहा है।
इस बदलाव का सबसे बड़ा असर खेती पर पड़ रहा है। किसानों के लिए सिर्फ यह मायने नहीं रखता कि पूरे मौसम में कितनी बारिश हुई, बल्कि यह ज्यादा जरूरी है कि बारिश सही समय पर हो। यदि बुवाई के बाद कई दिनों तक बारिश नहीं होती तो बीज और पौधे सूखने लगते हैं। वहीं अचानक बहुत अधिक वर्षा होने पर खेतों में जलभराव, मिट्टी का कटाव और फसलों को नुकसान होता है। इसलिए सामान्य या औसत मानसून का आंकड़ा भी अब अच्छी पैदावार की गारंटी नहीं देता।
शहरों के सामने भी नई चुनौती खड़ी हो गई है। पहले कई दिनों तक होने वाली बारिश का पानी धीरे-धीरे निकल जाता था, लेकिन अब कुछ घंटों की मूसलाधार बारिश से ही सड़कें डूब जाती हैं। अधिकतर भारतीय शहरों का ड्रेनेज सिस्टम इतनी तीव्र बारिश को संभालने के लिए तैयार नहीं है। यही वजह है कि हर मानसून में जलभराव, ट्रैफिक जाम और फ्लैश फ्लड जैसी घटनाएं बढ़ती जा रही हैं।
जून में कम बारिश ने बढ़ाई चिंता, 125 साल में पांचवें सबसे सूखे महीने का बन सकता है रिकॉर्ड
हाल के वर्षों के आंकड़े भी मानसून के इस बदलते स्वरूप की पुष्टि करते हैं। 2025 में छत्तीसगढ़ में मानसून सामान्य से पहले पहुंच गया था, जबकि 2026 में झारखंड में जून के दौरान सामान्य से 50 प्रतिशत से भी कम बारिश दर्ज की गई।
दिल्ली में 2026 का मानसून सामान्य समय से कुछ दिन देर से पहुंचा। दूसरी ओर, मेघालय के मावसिनराम और चेरापूंजी जैसे क्षेत्रों में आज भी दुनिया की सबसे अधिक वर्षा होती है। इससे साफ है कि अब पूरे देश की औसत बारिश देखने के बजाय स्थानीय स्तर पर बारिश के वितरण को समझना अधिक जरूरी हो गया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले वर्षों में यह अनिश्चितता और बढ़ सकती है। इसलिए अब सिर्फ यह जानना पर्याप्त नहीं होगा कि मानसून सामान्य रहेगा या नहीं। ज्यादा महत्वपूर्ण यह होगा कि बारिश कब होगी, कितनी देर होगी और कितनी तीव्र होगी। यही वजह है कि भारतीय मौसम विज्ञान विभाग जिला और ब्लॉक स्तर तक अधिक सटीक पूर्वानुमान और प्रभाव-आधारित चेतावनी प्रणाली विकसित कर रहा है।
दरअसल, असली बदलाव बारिश की मात्रा में नहीं, बल्कि उसके मिजाज में आया है। मानसून पहले की तरह लगातार नहीं बरस रहा, बल्कि छोटे-छोटे अंतरालों के बाद बहुत अधिक तीव्रता के साथ बरस रहा है। यही बदलता पैटर्न भविष्य की सबसे बड़ी चुनौती है।
यदि जल संरक्षण, बेहतर शहरी नियोजन, प्राकृतिक जल निकासी की सुरक्षा और मौसम के अनुरूप खेती की रणनीति पर समय रहते काम नहीं किया गया, तो आने वाले वर्षों में बाढ़, सूखा और जल संकट जैसी समस्याएं और गंभीर हो सकती हैं। इसलिए अब मानसून का इंतजार करने से ज्यादा जरूरी है, उसके बदलते स्वभाव को समझना।
फैक्ट बॉक्स: बदलते मानसून को 8 बिंदुओं में समझिए
- मानसून खत्म नहीं हुआ, उसका पैटर्न बदल रहा है।
- अब कम दिनों में ज्यादा बारिश हो रही है।
- गर्म वातावरण अधिक नमी रोकता है, इसलिए अचानक भारी वर्षा बढ़ रही है।
- एक्टिव और ब्रेक मानसून के बीच का अंतर पहले से ज्यादा स्पष्ट हो गया है।
- शहरों में जलभराव और फ्लैश फ्लड की घटनाएं बढ़ रही हैं।
- किसानों के लिए कुल बारिश नहीं, सही समय पर बारिश ज्यादा महत्वपूर्ण है।
- आईएमडी अब जिला और ब्लॉक स्तर तक अधिक सटीक पूर्वानुमान पर काम कर रहा है।
- भविष्य में जलवायु परिवर्तन के कारण मौसम की अनिश्चितता और बढ़ सकती है।
