जून खत्म होने को है लेकिन इस बार मानसून की चाल ने किसानों से लेकर अर्थशास्त्रियों तक की चिंता बढ़ा दी है। देश के कई हिस्सों में बारिश सामान्य से काफी कम हुई है जिसका असर अब खेतों में भी दिखने लगा है। खरीफ फसलों की बुआई पिछले साल की तुलना में करीब 23 फीसदी पीछे चल रही है। अगर जुलाई के पहले पखवाड़े में बारिश ने रफ्तार नहीं पकड़ी तो इसका असर सिर्फ खेती तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि सब्जियों, दालों, खाद्य तेल और अन्य जरूरी खाद्य पदार्थों की कीमतों पर भी पड़ सकता है।
भारत की अर्थव्यवस्था में मानसून की भूमिका सिर्फ मौसम तक सीमित नहीं है। देश की लगभग आधी कृषि भूमि आज भी सिंचाई के बजाय बारिश पर निर्भर है। धान, मक्का, सोयाबीन, कपास, दालें और कई तिलहनी फसलों की बुआई जून और जुलाई में होने वाली बारिश पर टिकी रहती है। ऐसे में मानसून की हर देरी सीधे कृषि उत्पादन, ग्रामीण आय और खाद्य महंगाई को प्रभावित करती है।
खरीफ बुआई क्यों चिंता बढ़ा रही है?
कृषि मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार 25 जून तक खरीफ फसलों की बुआई करीब 18.27 मिलियन हेक्टेयर में हुई जबकि पिछले वर्ष इसी अवधि में यह कहीं अधिक थी। सबसे ज्यादा गिरावट सोयाबीन की बुआई में दर्ज की गई जो लगभग 65 फीसदी कम रही। कपास का रकबा करीब 35 फीसदी, धान लगभग 25 फीसदी और मक्का करीब 16 फीसदी कम बोया गया। केवल गन्ने की बुआई में मामूली बढ़ोतरी दर्ज हुई है।
हालांकि विशेषज्ञ मानते हैं कि जुलाई खरीफ सीजन का सबसे महत्वपूर्ण महीना होता है। अगर इस दौरान पर्याप्त बारिश होती है तो किसान तेजी से बुआई पूरी कर सकते हैं। लेकिन अगर बारिश में और देरी होती है तो उत्पादन पर असर पड़ना तय माना जा रहा है।
कृषि एवं विज्ञान कल्याण विभाग द्वारा जारी लेटेस्ट रिपोर्ट के मुताबिक, राजस्थान में खरीफ बुवाई की अच्छी शुरुआत हुई है। जून में समय से पहले बारिश होने के कारण कई इलाकों में खरीफ फसलें उगनी (crop emergence) शुरू हो गई हैं। तेलंगाना, महाराष्ट्र और गुजरात में पिछले साल की तुलना में हरियाली (NDVI) कम दर्ज की गई है जिससे संकेत मिलता है कि इन राज्यों में खरीफ फसलों की शुरुआती बढ़वार कमजोर रही है।
पिछले 5 वर्षों के औसत (2021-25) की तुलना में भी तेलंगाना, महाराष्ट्र और गुजरात में NDVI कम है जबकि राजस्थान में समय से पहले बुवाई का सकारात्मक असर दिख रहा है।
राजस्थान में सतही नमी (Surface Moisture) पिछले वर्ष और पिछले 5 वर्षों के औसत से बेहतर है जिससे खरीफ फसलों के लिए अनुकूल परिस्थितियां बनी हैं।
महाराष्ट्र, तेलंगाना, गुजरात, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, उत्तरी कर्नाटक और उत्तर प्रदेश के कुछ हिस्सों में भूमि की नमी (LSWI) सामान्य से कम है जिससे खरीफ बुवाई और फसलों की शुरुआती वृद्धि प्रभावित हो सकती है।
रूट ज़ोन मिट्टी की नमी (Root Zone Soil Moisture) भी महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, ओडिशा, मध्य प्रदेश, तेलंगाना, झारखंड, बिहार, गुजरात, उत्तर प्रदेश के पूर्वी व बुंदेलखंड क्षेत्र और पूर्वोत्तर के कुछ हिस्सों में 10 साल के औसत से कम पाई गई है।
कुल मिलाकर देखें तो रिपोर्ट के अनुसार राजस्थान खरीफ बुवाई के मामले में बेहतर स्थिति में है जबकि महाराष्ट्र, तेलंगाना, गुजरात, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में कम वर्षा और मिट्टी की नमी की कमी के कारण खरीफ फसलों की शुरुआती स्थिति अपेक्षाकृत कमजोर दिखाई दे रही है।
जून में सामान्य से 42 प्रतिशत कम बारिश
जून महीने में देशभर में सामान्य से करीब 42 प्रतिशत कम बारिश दर्ज की गई है। हालांकि जुलाई में मानसून कुछ हद तक इस कमी की भरपाई करता हुआ नजर आ सकता है। यह कहना है स्काईमेट वेदर के मौसम विज्ञान एवं जलवायु परिवर्तन के उपाध्यक्ष महेश पलावत का।
महेश पलावत के अनुसार, जुलाई के पहले 10 दिन मानसून काफी सक्रिय रहने की संभावना है। उनका कहना है कि बंगाल की खाड़ी में एक के बाद एक चक्रवाती परिसंचरण बनने की संभावना है, जो पश्चिम और उत्तर-पश्चिम दिशा में आगे बढ़ेंगे। इनके प्रभाव से 3 से 6 जुलाई के बीच दक्षिणी मध्य प्रदेश, विदर्भ, गुजरात और दक्षिण-पूर्वी राजस्थान में भारी बारिश हो सकती है। उनका मानना है कि इस दौरान पूर्वी मध्य प्रदेश और गुजरात में वर्षा की कमी काफी हद तक कम हो जाएगी।
हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि 10 से 12 जुलाई के बाद मानसून की गतिविधियों में फिर से कुछ कमी आ सकती है। ऐसे में जून महीने में हुई बारिश की पूरी कमी की भरपाई जुलाई में हो पाना मुश्किल दिखाई देता है।
महेश पलावत के मुताबिक, जैसे-जैसे मानसून का मौसम आगे बढ़ेगा, अल-नीनो का प्रभाव भी धीरे-धीरे बढ़ सकता है जिससे मानसून के कमजोर पड़ने की आशंका रहेगी।
उन्होंने कहा कि यदि बारिश सामान्य से कम रहती है तो इसका सबसे अधिक असर पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, पश्चिमी राजस्थान, छत्तीसगढ़ तथा मध्य प्रदेश के उत्तरी जिलों में देखने को मिल सकता है।
अल-नीनो की शुरुआत की घोषणा
11 जून 2026 को अमेरिका के राष्ट्रीय महासागरीय एवं वायुमंडलीय प्रशासन (NOAA) ने आधिकारिक रूप से अल नीनो की शुरुआत की घोषणा की जबकि भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) ने मानसून के दौरान दीर्घकालिक औसत (LPA) का केवल 90% वर्षा होने और सामान्य से कम बारिश की 60% संभावना जताई है।
कृषि मंत्रालय ने लगभग 200 जिलों में वर्षा की कमी का जोखिम चिन्हित किया है तथा 28 मई से 3 जून के बीच साप्ताहिक वर्षा भी एलपीए से 10% कम दर्ज की गई जिससे खरीफ फसलों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की आशंका बढ़ गई है।

कृषि अर्थशास्त्री अशोक गुलाटी ने कहा, ”कई अलग-अलग देशों के मीट्रियोलॉजिकल डिपार्टमेंट ने कह दिया है कि अल-नीनो इफेक्ट है। हमारे मौसम विभाग ने कहा है कि कुल 90 प्रतिशत वर्षा ही होगी और अगर यह 89 प्रतिशत होती तो बिल्कुल सूखा पड़ता। यानी सूखे से बाल-बाल बचे ही हैं। और महंगाई पर इसका असर सितंबर-अक्टूबर यानी फेस्टिवल के समय दिखाई देगा। सूखा प्रभावित और कम सिंचाई वाली जगहों पर फसलें प्रभावित होंगी। दालें, ऑयल सीड्स, कॉटन सीड्स, फल, सब्जियों पर इसका असर दिखाई जरूर देगा।”
सबसे पहले किन खाद्य पदार्थों के दाम बढ़ेंगे? इस पर गुलाटी ने कहा, ”दालें महंगी होंगी। सब्जियां के दाम बढ़ेंगे। अगर बरसात कम होती है तो सब्जियां-फल महंगे होंगे।” उनका कहना है कि सिर्फ भारत में ही अल-नीनो का असर नहीं पड़ेगा बल्कि भूमध्य रेखा के पास बसे अन्य देश जैसे मलेशिया, इंडोनेशिया आदि जहां से हमारा खाद्य तेल आता है तो हमारा एडिबल ऑयल महंगा होगा और ऑयल सीड्स भी महंगा हो जाएगा।
आखिर बारिश और महंगाई का क्या संबंध है?
बारिश कम होने का मतलब सिर्फ सूखे खेत नहीं होता। इसका सीधा असर बाजार तक पहुंचने वाली फसलों की मात्रा पर पड़ता है। इसकी पूरी कड़ी कुछ इस तरह काम करती है-
कम बारिश → बुआई में देरी → उत्पादन घटने की आशंका → बाजार में कम आपूर्ति → कीमतों में बढ़ोतरी → खाद्य महंगाई।
सबसे पहले असर हरी सब्जियों, टमाटर, प्याज और दालों पर देखने को मिलता है। अगर चारे का उत्पादन भी प्रभावित होता है तो दूध और डेयरी उत्पादों की लागत बढ़ सकती है। भारत में खाद्य वस्तुओं का उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) में बड़ा हिस्सा है। इसलिए खाद्य महंगाई बढ़ने का असर पूरे महंगाई दर पर दिखाई देता है।

क्या अभी से सब्जियों की आवक या कीमतों में मानसून का असर दिखने लगा है? आजादपुर टोमैटो एसोसिएशन के अध्यक्ष अशोक कौशिक इस सवाल के जवाब पर कहते हैं कि अभी मानसून का असर शुरुआती चरण में है लेकिन आने वाले दिनों में इसका असर सब्जियों की आवक और कीमतों पर साफ दिखाई देगा। अगर लगातार और ज्यादा बारिश होती है तो कई क्षेत्रों में फसलों की कटाई, परिवहन और आपूर्ति प्रभावित हो सकती है जिससे सब्जियों की उपलब्धता कम होगी और कीमतों में बढ़ोतरी देखने को मिल सकती है।
उनका कहना है कि अगले एक-दो महीनों में सब्जियों के दाम बढ़ने की संभावना है। खासतौर पर दक्षिण भारत और हिमाचल प्रदेश जैसे क्षेत्रों में अगर भारी बारिश होती है तो फसल उत्पादन और आपूर्ति प्रभावित होगी। इसका सीधा असर बाजार भाव पर पड़ेगा। अशोक कौशिक का कहना है कि आम उपभोक्ताओं को आने वाले समय में खाद्य महंगाई पर नजर रखनी चाहिए। अगर बारिश सामान्य से अधिक होती है तो सब्जियों की कीमतों में बढ़ोतरी हो सकती है। ऐसे में मौसम और बाजार की स्थिति को देखते हुए जरूरत के अनुसार खरीदारी की योजना बनाना बेहतर रहेगा।
क्या इस बार सरकार पहले से तैयार है?
कमजोर मानसून की आशंका को देखते हुए केंद्र सरकार ने 315 जिलों के लिए आकस्मिक (Contingency) कृषि योजना तैयार की है। इनमें 111 जिलों को सबसे ज्यादा संवेदनशील माना गया है जहां सिंचाई की सुविधा बेहद सीमित है। राज्यों को कम पानी वाली फसलें अपनाने, जल संरक्षण बढ़ाने, तालाबों और जलाशयों की मरम्मत तथा स्थानीय स्तर पर वैकल्पिक कृषि योजना लागू करने के निर्देश दिए गए हैं।
क्या चावल और गेहूं की कीमतें भी बढ़ेंगी?
फिलहाल इसकी आशंका कम मानी जा रही है। इसकी वजह यह है कि सरकार के पास चावल और गेहूं का पर्याप्त बफर स्टॉक मौजूद है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर जुलाई में मानसून सामान्य हो जाता है तो इन फसलों की स्थिति संभल सकती है। हालांकि सब्जियों और कुछ दालों की कीमतें मौसम के उतार-चढ़ाव के प्रति ज्यादा संवेदनशील रहती हैं।
जुलाई पर टिकी हैं उम्मीदें
मौसम वैज्ञानिकों और कृषि विशेषज्ञों की नजर अब जुलाई के पहले दो सप्ताह पर है। यही वह समय है जब खरीफ बुआई अपनी रफ्तार पकड़ती है। यदि इस दौरान अच्छी बारिश होती है तो जून की कमी की काफी हद तक भरपाई हो सकती है। लेकिन अगर बारिश फिर कमजोर रही तो इसका असर खेती, ग्रामीण आय, खाद्य कीमतों और आर्थिक वृद्धि- चारों पर दिखाई दे सकता है।
क्या आम आदमी को अभी चिंता करनी चाहिए?
तुरंत घबराने की जरूरत नहीं है लेकिन यह साफ है कि इस साल मानसून सिर्फ किसानों के लिए नहीं बल्कि हर परिवार के किचन बजट के लिए अहम होने वाला है। अगले दो से तीन सप्ताह यह तय करेंगे कि आने वाले महीनों में आपकी थाली सस्ती रहेगी या महंगी। इसलिए इस बार आसमान से गिरने वाली हर बूंद सिर्फ खेतों के लिए नहीं बल्कि देश की अर्थव्यवस्था और आम आदमी की जेब के लिए भी बेहद अहम है।
गेहूं की फसल पर अदृश्य हमला: दिन नहीं, रात की बढ़ती गर्मी से सूख रहे दाने
जब भी जलवायु परिवर्तन की चर्चा होती है तो सबसे पहले दिमाग में तपती दोपहरें, लू और दिन में रिकॉर्ड तोड़ रहा तापमान आता है। लेकिन भारत की गेहूं की फसल के सामने खड़ा नया संकट दिन की गर्मी नहीं बल्कि रातों की बढ़ती गर्मी है। एक नई रिपोर्ट बताती है कि भारत के प्रमुख गेहूं उत्पादक राज्यों में न्यूनतम तापमान यानी रात का तापमान, दिन के तापमान की तुलना में अधिक तेजी से बढ़ रहा है। इसका असर सीधे गेहूं की पैदावार, गुणवत्ता और किसानों की आमदनी पर पड़ रहा है।
