मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव इन दिनों इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के बाद विवादों में हैं। आरोप है कि उनके परिजनों ने उज्जैन में ऐसी जगहों पर जमीन खरीदी है, जहां नई सड़क परियोजनाएं शुरू होने वाली हैं। इस पूरे मामले के बीच मोहन यादव का एक 23 साल पुराना राजनीतिक किस्सा भी चर्चा में आ गया है। यह मामला 2003 के मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव का है, जब बीजेपी को उनसे चुनावी टिकट वापस लेना पड़ा था।
दरअसल, बीजेपी ने 2003 के विधानसभा चुनाव में उज्जैन जिले की बड़नगर सीट से मोहन यादव को उम्मीदवार बनाया था। लेकिन पार्टी के तत्कालीन विधायक शांतिलाल धाबी इससे नाराज हो गए। उनके समर्थक भी विरोध में सड़कों पर उतर आए थे। स्थानीय नेताओं और कार्यकर्ताओं के लिए मोहन यादव उस समय एक “बाहरी” उम्मीदवार थे, इसलिए उनकी उम्मीदवारी का विरोध होने लगा।
स्थिति ऐसी बन गई कि प्रत्याशी के नाम का ऐलान होने के बाद भी बीजेपी को मोहन यादव से टिकट वापस लेना पड़ा। इसके बाद पार्टी ने शांतिलाल धाबी को ही चुनावी मैदान में उतारा। हालांकि, 2003 के चुनाव में शांतिलाल धाबी अपनी सीट बचाने में सफल रहे और विधायक चुने गए।
दिलचस्प बात यह है कि मोहन यादव ने खुद ही पार्टी नेतृत्व को टिकट वापस करने का फैसला बताया था। इसके बाद उन्होंने उज्जैन दक्षिण विधानसभा सीट से चुनाव लड़ा और कांग्रेस के तत्कालीन प्रभावशाली नेता जयसिंह दरबार को करीब 10 हजार वोटों से हरा दिया। यहीं से उनकी राजनीतिक यात्रा ने नई रफ्तार पकड़ी और उन्होंने फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा।
मोहन यादव ने 1984 में अपने सार्वजनिक जीवन की शुरुआत की थी। शुरुआती दौर में वे अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) से जुड़े रहे। इसके अलावा उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के साथ भी काम किया।
साल 2013 में उन्होंने उज्जैन दक्षिण विधानसभा सीट से चुनाव जीता और लगातार तीसरी बार विधायक बने। पिछले विधानसभा चुनाव में उन्होंने कांग्रेस उम्मीदवार चेतन प्रेमनारायण यादव को 12,941 वोटों के अंतर से हराया था। आज वे मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री हैं और राज्य की राजनीति के सबसे प्रभावशाली नेताओं में गिने जाते हैं।
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