RSS Chief Mohan Bhagwat: आरएसएस चीफ मोहन भागवत ने हाल ही में संगठन, समाज, भाषा, रोजगार, धर्मांतरण, जनसंख्या, घुसपैठ और राष्ट्रीय एकता जैसे कई अहम मुद्दों पर खुलकर बात की। भागवत ने साफ कहा कि संघ में कोई पद जाति, वर्ग या क्षेत्र के आधार पर नहीं मिलता, बल्कि जो व्यक्ति काम करता है और योग्य होता है, वही जिम्मेदारी संभालता है।

RSS प्रमुख ने साफ कहा कि संघ में सरसंघचालक बनने के लिए किसी जाति या वर्ग की कोई शर्त नहीं है। उन्होंने बताया कि यह जरूरी नहीं है कि सरसंघचालक एससी, एसटी, ब्राह्मण या किसी खास समाज से ही हो। उनके मुताबिक, जो व्यक्ति हिंदू हो, संघ के लिए काम करता हो और जिम्मेदारी निभाने के लिए सबसे उपयुक्त हो, वही सरसंघचालक बनता है। उन्होंने यह भी कहा कि जब उन्हें यह जिम्मेदारी दी गई, उस समय वो खाली थे, इसलिए उन्हें यह दायित्व सौंपा गया। RSS चीफ ने दोहराया कि संघ में जाति या वर्ग कोई मापदंड नहीं है, बल्कि योग्यता और सेवा ही सबसे अहम है।

सरसंघचालक ने कहा कि RSS का काम प्रचार करना नहीं, बल्कि लोगों में अच्छे संस्कार देना है। उन्होंने बताया कि जब किसी व्यक्ति का ज्यादा प्रचार होता है तो उससे प्रसिद्धि मिलती है और प्रसिद्धि से अहंकार पैदा हो जाता है, जो सही नहीं है। इसी वजह से संघ किसी व्यक्ति का प्रचार नहीं करता, बल्कि किए गए काम को महत्व देता है। उन्होंने कहा कि शायद इसी सोच के कारण संघ प्रचार के मामले में कई बार पीछे रह जाता है, लेकिन संघ अपने मूल उद्देश्य से समझौता नहीं करता।

RSS प्रमुख ने मातृभाषा को लेकर साफ बात कही। उन्होंने कहा कि अंग्रेजी जरूर सीखनी चाहिए, इतनी अच्छी कि अंग्रेज भी आपकी अंग्रेजी सुनने के लिए टिकट खरीदें। लेकिन इसके साथ ही उन्होंने जोर दिया कि अपनी मातृभाषा को कभी नहीं छोड़ना चाहिए। उन्होंने बताया कि संघ में अंग्रेजी का उपयोग नहीं किया जाएगा। वहां बातचीत और कामकाज केवल मातृभाषा में ही होगा, क्योंकि मातृभाषा से ही संस्कार और अपनी पहचान जुड़ी होती है।

भागवत ने बताया कि उनके 75 वर्ष पूरे हो चुके हैं और उन्होंने खुद निवृत्त होने की इच्छा जताई थी, लेकिन संघ के कार्यकर्ताओं ने कहा कि जब तक काम करने की क्षमता है, तब तक सेवा जारी रखनी चाहिए। उन्होंने कहा कि वह पद से निवृत्त हो सकते हैं, लेकिन कार्य से नहीं। अंतिम खून की बूंद तक काम करना संघ की परंपरा है।

मुस्लिम समाज के साथ संघ के संबंधों पर बोलते हुए मोहन भागवत ने कहा कि जैसे दांतों के बीच जीभ आ जाए तो हम दांत नहीं तोड़ते, वैसे ही मुस्लिम समाज भी हमारे समाज का हिस्सा है। उन्होंने कहा कि स्वयंसेवक मुस्लिम समाज के बीच जाकर सेवा कार्य करते हैं और उन्हें अलग नहीं माना जाता।

मोहन भागवत वे जनसंख्या के सवाल पर कहा कि अगर परिवार में तीन भाई-बहन होते हैं तो लोग बचपन से ही एक-दूसरे के साथ रहना और संतुलन बनाना सीख लेते हैं। उन्होंने कहा कि संतान की संख्या से ज्यादा जरूरी उनकी परवरिश है और इसके लिए समाज के पास कई उपाय मौजूद हैं। धर्मांतरण पर मोहन भागवत ने कहा कि भगवान चुनना व्यक्ति का निजी अधिकार है, लेकिन जोर-जबरदस्ती या लालच देकर धर्म परिवर्तन कराना गलत है। उन्होंने कहा कि ऐसे मामलों में घर वापसी एक समाधान है और जो लोग वापस आना चाहते हैं, उन्हें स्वीकार किया जाना चाहिए।

भागवत नेकहा कि घुसपैठ को रोकना सरकार की जिम्मेदारी है। डिटेक्शन होना चाहिए और फिर डिपोर्टेशन। SIR और जनसंख्या गिनती जैसी प्रक्रियाएं आएंगी, जिन्हें रोका नहीं जा सकता, बल्कि समझदारी से अपनाना होगा। रोजगार देश के नागरिकों को मिलना चाहिए, चाहे वह हिंदू हो या मुसलमान, लेकिन विदेशी घुसपैठियों को नहीं। उन्होंने कहा कि देश में रोजगार बढ़ाने के लिए मानवीय तकनीक को बढ़ावा देना होगा। ऐसी अर्थव्यवस्था बनानी होगी, जहां खाली हाथों को काम मिले। साथ ही गुणवत्ता वाला उत्पादन बढ़े, ताकि भारतीय उत्पाद विदेशों तक पहुंच सकें।

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भागवत ने आरक्षण पर कहा कि संविधान सम्मत सभी आरक्षणों का संघ समर्थन करता है। जातिगत भेदभाव खत्म होना चाहिए। जो वर्ग अभी भी पीछे है, उसे ऊपर लाना समाज का दायित्व है। ऊपर बैठे लोगों को झुकना होगा और नीचे वालों को हाथ पकड़कर आगे बढ़ाना होगा। केवल सद्भावना से ही समाज आगे बढ़ सकता है।

RSS चीफ ने कहा कि राजनेता जातिवादी नहीं, बल्कि वोटवादी होते हैं। समाज को समझदारी से चलना होगा ताकि वोट इधर-उधर भटक कर सामाजिक ताने-बाने को नुकसान न पहुंचाएं। उन्होंने कहा कि सोशल मीडिया के दौर में हर व्यक्ति की जिम्मेदारी है कि वह मन, वचन और कर्म से सतर्क रहे। जाति और कर्म को जबरन जोड़ना केवल राजनीति के लिए किया जाता है। अगर कोई विचार अब प्रासंगिक नहीं है, तो उसे शांति से छोड़ देना चाहिए, ताकि समाज को नुकसान न हो।

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