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जब सत्ता ही देश को ठगने लगे

पुण्य प्रसून वाजपेयी एक तरफ विकास और दूसरी तरफ हिंदुत्व। एक तरफ नरेंद्र मोदी, दूसरी तरफ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ। एक तरफ संवैधानिक संसदीय राजनीति, दूसरी तरफ हिंदू राष्ट्र का एलान कर खड़ा हुआ संघ परिवार। और इन सबके लिए दाना-पानी बनता हाशिए पर पड़ा वह तबका जिसकी पूरी जिंदगी दो जून की रोटी के लिए […]

Author December 13, 2014 10:23 AM
अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने कहा था कि भारत में धार्मिक ‘‘असहिष्णुता’’ से महात्मा गांधी को स्तब्ध हो गए होते। (फाइल फ़ोटो पीटीआई)

पुण्य प्रसून वाजपेयी

एक तरफ विकास और दूसरी तरफ हिंदुत्व। एक तरफ नरेंद्र मोदी, दूसरी तरफ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ। एक तरफ संवैधानिक संसदीय राजनीति, दूसरी तरफ हिंदू राष्ट्र का एलान कर खड़ा हुआ संघ परिवार। और इन सबके लिए दाना-पानी बनता हाशिए पर पड़ा वह तबका जिसकी पूरी जिंदगी दो जून की रोटी के लिए खप जाती है। तो अर्से से देश की धारा उस मुहाने पर आकर थमी है जहां विकास के विजन और हिंदुत्व की दृष्टि में कोई अंतर नजर नहीं आता है। विकास आवारा पूंजी पर टिका है तो हिंदुत्व भगवा धारण करने पर जा टिका है।

इन परिस्थितियों को सिलसिलेवार तरीके से खोलें तो सत्ताधारी होने के मायने भी समझ में आ सकते हंै और जो सवाल संसदीय राजनीति के दायरे में पहली बार जनादेश के साथ उठे हंै, उसकी शून्यता भी नजर आती है। मसलन, मोदी विकास और पूंजी के दायरे में पहले देश के सच को समझें। यह रास्ता मनमोहन सिंह की अर्थनीति से आगे जाता है। मनमोहन की मुश्किल, सब कुछ बेचने से पहले बाजार को ही इतना खुला बनाने की थी जिसमें पूंजीपतियों की व्यवस्था ही चले। लेकिन कांग्रेसी राजनीति साधने के लिए मनरेगा और खाद्य सुरक्षा सरीखी योजनाओं के जरिए एनजीओ सरीखी सरकार दिखानी थी।

मोदी के लिए बाजार को खुला बनाना जरूरी नहीं है बल्कि पूंजी को ही बाजार में तब्दील कर विकास की ऐसी चकाचौंध तले सरकार को खड़ा करना है जिसे देखने वाला इस हद तक लालायित हो कि उसका अपना वजूद, अपना देश ही बेमानी लगने लगे। यानी ऊर्जा से लेकर बुनियादी ढांचा और सेहत बीमा, शिक्षा, रक्षा से लेकर स्वच्छ गंगा तक की किसी भी योजना का आधार देश की जनता नहीं है, बल्कि सरकार के करीब खड़े उद्योगपति या कॉरपोरेट के अलावा वह विदेशी पूंजी है जो यह एलान करती है कि उसकी ताकत भारत के भविष्य को बदल सकती है।

विदेशी निवेश का मतलब है देशवासियों तक यह संदेश पहुंचाना कि आगे बढ़ने के लिए सिर्फ सरकार कुछ नहीं कर सकती बल्कि जमीन से लेकर खनिज संपदा और जीने के तरीकों से लेकर रोजगार पाने के उपायो में भी परिवर्तन करना होगा। सरकार तब तक कुछ नहीं कर सकती जब तक देश नहीं बदले।
बदलने की इस प्रक्रिया का मतलब है खनिज संपदा की जो लूट मनमोहन सिंह के दौर में नजर आती थी वह नरेंद्र मोदी के दौर में नजर नहीं आएगी, क्योंकि लूट शब्द नीति में बदल दिया जाए तो यह सरकारी मुहर तले विकास की लकीर मानी जाती है। मसलन, जमीन अधिग्रहण में बदलाव, मजदूरों के कामकाज और उनकी नौकरी के नियमों में सुधार , ऊर्जा क्षेत्र के लिए लाइसेंस में बदलाव, खादान देने के तरीकों में बदलाव, सरकारी योजनाओं को पाने वाले कारपोरेट और उद्योगपतियों के नियमों में बदलाव।

यहां यह कहा जा सकता है कि बीते दस बरस के दौर में विकास के नाम पर जितने घोटाले, जितनी लूट हुई और राजनीतिक सत्ता का चेहरा जिस तरह जनता को खूंखार लगने लगा, उसमें परिवर्तन जरूरी था। लेकिन परिवर्तन के बाद पहला सवाल यही है कि जिस जनता में जो आस बदलाव को लेकर जगी, क्या उस बदलाव के तौर-तरीकों में जनता को साथ जोड़ना चाहिए या नहीं। या फिर जनादेश के दबाव में जनता पहली बार इतनी अलग थलग हो गई कि सरकार के हर निर्णय के सामने खड़े होने की औकात ही उसकी नहीं रही। सरकार बिना बंदिश तीस बरस बाद देश की नीतियों को इस अंदाज से चलाने, बदलने लगी कि वह जो भी कर रही है, वह सही होगा या सही होना चाहिए।

यहीं से दूसरा सवाल उसी सत्ता को लेकर खड़ा होता है जिसमें पूर्ण बहुमत की हर सरकार के सामने यह सवाल हमेशा से रहा है कि देश का वोटिंग पैटर्न उसके पक्ष में रहे जिससे कभी किसी चुनाव में सत्ता उसके हाथ से न निकले, या सत्ता हमेशा हर राज्य में आती रहे। कांग्रेस का नजरिया हमेशा से ही यही रहा है। इसलिए राजीव गांधी तक कांग्रेस की तूती अगर देश में बोलती रही और राज्यों में कांग्रेस की सत्ता बरकार रही तो उस दौर के विकास को आज के दौर में उठते सवालों तले तौल कर देख लें।

यह बेहद साफ लगेगा कि कांग्रेस ने हमेशा अपना विकास किया। यानी विकास का ऐसा पैमाना नीतियों के तहत विकसित किया जिससे उसका वोट बैंक बना रहे। चाहे वह आदिवासी हो या मुसलमान। किसान हो या शहरी मध्यवर्ग। अब इस आईने में भाजपा या मोदी सरकार को फिट करके देख लें। जो सपना राजीव गांधी के वक्तदेश के युवाओं ने देखा उसे नरेंद्र मोदी चाहे न जगा पाएं , लेकिन सरकार चलाते हुए जिस वोट बैंक को बनाने का सवाल है तो भाजपा के पास हिंदुत्व का कारगर मंत्र है।

यह राष्ट्रीयता के पैमाने से भी आगे निकल कर जनता की आस्था, उसके भरोसे और जीने के तरीके को प्रभावित करता है। यह पैमाना कांग्रेस के एनजीओ चेहरे से कहीं ज्यादा धारदार है। धारदार इसलिए कि कांग्रेस के सपने दो जून की रोजी-रोटी के सवाल के सामने नतमस्तक हो जाते हैं। लेकिन हिंदुत्व का नजरिया मरने-मारने वाले हालात में जीने से कतराता नहीं है। इसकी बारीकी को समझें तो दो धर्म के लोगों के बीच का प्रेम कैसे लव-जेहाद में बदलता है और मोदी सरकार की एक मंत्री ‘रामजादा’ और ‘हरामजादा’ कहकर समाज को कुरेदती है। फिर ताजमहल और गीता का सवाल रूमानियत और आस्था के जरिए संवैधानिक तौर-तरीकों पर अंगुली उठाने से नहीं कतराता।

इस तरह के सियासी खेल को संविधान या कानून का खौफ भी नहीं हो सकता है क्योंकि सत्ता उसी की है। यानी अपने-अपने दायरे में अपराधी कोई तभी होगा जब वह सत्ता में नहीं होगा। याद कीजिए , कंधमाल में धर्मांतरण के सवाल पर ही ग्राहम स्टेंस की हत्या और बंजरग दल से जुड़े दारा सिंह का दोषी होना। 2008 में ओड़िशा में ही धर्मांतरण के सवाल पर स्वामी लक्ष्मणनंद की हत्या। यूपी, बिहार, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड, कर्नाटक, केरल, गुजरात में धर्मांतरण के कितने मामले बीते एक दशक के दौर में सामने आए और कितने कानून के दायरे में लाए गए , जिनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई हुई हो।

ध्यान दें तो बेहद बारीकी से धर्म और उसके विस्तार में दंगों की राजनीति ने सियासत पर हमला भी बोला है और सियासत को साधा भी है। चाहे 1984 का जनसंहार हो या 1989 का भागलपुर दंगा। फिर 2002 में गुजरात हो या 2013 में मुजफ्फरनगर के दंगे। असर समाज की टूटन पर पड़ा, आम लोगों की रोजी-रोटी पर पड़ा। तो फिर 2014 में सियासत की कौन-सी परिभाषा बदली है।

दरअसल पहली बार गुस्से ने सियासत को पलटा है। विकास को अगर चंद हथेलियों तले गुलाम बनाने या मजहबी दायरे में समेटने का सोच जगाया जा रहा हो तो यह खतरे की घंटी है। राष्ट्रवाद की चाशनी में कभी आत्मनिर्भर होने का सपना जगाने की बात हो या कहीं हिंदुत्व को जीने का पैमाना बताकर, सत्ता की राहत देने की सौदेबाजी का सवाल, हालात और बिगड़ेंगे, इससे इनकार नहीं किया जा सकता। ये हालात आने वाले वक्त में सत्ता की परिभाषा को भी बदल सकते हैं, इससे भी इनकार नहीं किया जा सकता।

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