भारत सरकार ने देश में फैक्ट्री चलाने वाली चार चीनी पावर इक्विपमेंट बनाने वाली कंपनियों को पावर प्रोजेक्ट्स के लिए सरकारी टेंडर में हिस्सा लेने की मंजूरी दे दी है। चीनी कंपनियों पर रोक 2020 में लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल (LaC) पर भारतीय और चीनी सैनिकों के बीच हिंसक झड़प के बाद लगाई गई थीं। जिन चार कंपनियों को मंजूरी दी गई है, उनमें TBEA एनर्जी, नानजिंग इलेक्ट्रिक इंडिया, न्यू नॉर्थईस्ट इलेक्ट्रिक इंडिया और ताइकाई इलेक्ट्रिक (इंडिया) शामिल है।
इन नियमों के मुताबिक भारत के साथ जमीनी बॉर्डर शेयर करने वाले देशों की कंपनियों को सामान, सर्विस या काम की खरीद में बोली लगाने के लिए संबंधित भारतीय अथॉरिटी के साथ रजिस्टर करना होगा। हालांकि वित्त मंत्रालय के खर्च डिपार्टमेंट के 24 जून के आदेश में यह साफ किया गया कि यह छूट जारी होने की तारीख से दो साल तक वैध रहेगी और इसे मिसाल नहीं माना जा सकता।
ऊर्जा विभाग ने मांगी थी छूट
ऊर्जा विभाग ने इस साल जनवरी में भारत में ज़रूरी पावर प्रोजेक्ट्स के लिए मैन्युफैक्चरिंग यूनिट वाली कुछ कंपनियों को सरकारी खरीद में हिस्सा लेने से छूट मांगी थी। इंडियन एक्सप्रेस द्वारा वित्त मंत्रालय और ऊर्जा मंत्रालय को भेजे गए सवालों का कोई जवाब नहीं मिला। यह छूट सेक्रेटरी की कमिटी (CoS) ने सोच-विचार के बाद दी थी और यह डिपार्टमेंट फॉर प्रमोशन ऑफ इंडस्ट्री एंड इंटरनल ट्रेड (DPIIT) के तहत बनी ‘रजिस्ट्रेशन कमिटी’ की सिफारिश पर आधारित थी। यह कमिटी चीनी कंपनियों पर रोक लगाए जाने के बाद आदेवन के रजिस्ट्रेशन प्रक्रिया की जांच करती है और उसे मंजूरी देती है।
ये रोक 2020 में लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल (LaC) पर भारतीय और चीनी सैनिकों के बीच हिंसक झड़प के बाद लगाई गई थीं। इन नियमों के तहत चीनी बोली लगाने वालों को विदेश मंत्रालय और गृह मंत्रालय से ज़रूरी राजनीतिक और सिक्योरिटी क्लीयरेंस लेनी होती थी।
पावर कंपनियों को यह मंजूरी सरकार द्वारा लैंड बॉर्डरिंग देशों (LBCs), या भारत के साथ लैंड बॉर्डर शेयर करने वाले देशों से इन्वेस्टमेंट के लिए फॉरेन डायरेक्ट इन्वेस्टमेंट (FDI) पॉलिसी में सोचे-समझे बदलावों की घोषणा के लगभग तीन महीने बाद मिली है। ये बदलाव छह साल बाद किए गए, जब सरकार ने अप्रैल 2020 में LBC से इन्वेस्टमेंट लेने वाली भारतीय कंपनियों के लिए पहले से मंज़ूरी जरूरी कर दी थी। प्रेस नोट 3 या PN3 नाम के एक दस्तावेज के जरिए ये बदलाव किए गए थे, ताकि Covid-19 के दौरान इक्विटी वैल्यूएशन में आई गिरावट के दौरान लोकल कंपनियों के संभावित टेकओवर को रोका जा सके।
क्या बनाती हैं ये चार कंपनियां?
जिन चारों कंपनियों को छूट दी गई है, वे पावर सेक्टर के ज़रूरी इक्विपमेंट जैसे ट्रांसफ़ॉर्मर, तार, हाई-वोल्टेज स्विच गियर और गैस-इंसुलेटेड स्विचगियर बनाती हैं। इनका इस्तेमाल ट्रांसमिशन लाइनों में होता है। अपनी वेबसाइट पर, न्यू नॉर्थईस्ट इलेक्ट्रिक इंडिया पूरे भारत में करीब 11 ट्रांसमिशन लाइन प्रोजेक्ट दिखाता है।
वर्ष 2000 की शुरुआत से चीनी कंपनियों ने भारत के बढ़ते पावर सेक्टर मार्केट में, खासकर थर्मल पावर प्लांट के लिए जेनरेशन इक्विपमेंट सप्लाई करने में अपनी जगह बनाई है। इस दौरान चीन के तीन बड़े पावर जेनरेशन इक्विपमेंट बनाने वाली कंपनियां (चाइना डोंगफैंग इलेक्ट्रिक ग्रुप, शंघाई इलेक्ट्रिक ग्रुप और हार्बिन इलेक्ट्रिक ग्रुप) भारतीय मार्केट में बल्क एक्सपोर्टर बन गई थीं।
मैनपावर की कमी के कारण कई प्रोजेक्ट अटके
भारतीय इंडस्ट्री के लिए, खासकर जेनरेशन और ट्रांसमिशन प्रोजेक्ट में, चीनी टेक और एक्सपर्टीज़ की मौजूदगी बहुत जरूरी रही है। पिछले साल इंडस्ट्री ने चीनी टेक्नीशियन के लिए वीज़ा नियमों में ढील देने की मांग की थी क्योंकि एक्सपर्ट मैनपावर की कमी के कारण कई प्रोजेक्ट अटके हुए थे। इंडस्ट्री के प्रतिनिधियों ने कहा था कि वीज़ा अप्रूवल में देरी से मैन्युफैक्चरिंग इंडस्ट्री को नुकसान हो रहा है, जिसमें लेदर सेक्टर भी शामिल है, जो तेज़ी से स्पोर्ट्स फुटवियर की ओर बढ़ रहा है। चीनी मशीनरी इंपोर्ट और इंस्टॉल करने के बाद घरेलू इंडस्ट्री ने कहा कि वीज़ा की दिक्कतों के कारण वह प्लांट चालू नहीं कर पा रही है।
भारतीय इंडस्ट्री को चीनी प्रोफेशनल्स की जरूरत है क्योंकि यह ज़्यादातर इलेक्ट्रिकल और इलेक्ट्रॉनिक सेगमेंट में ज़रूरी पार्ट्स के लिए चीन पर बहुत ज़्यादा निर्भर है। ऑफिशियल डेटा से पता चलता है कि चीन से लगभग $112 बिलियन के इंपोर्ट में से लगभग 60 फीसदी इंजीनियरिंग और इलेक्ट्रॉनिक आइटम थे और ये भारत के एक्सपोर्ट ऑर्डर को पूरा करने में भी अहम भूमिका निभाते हैं।
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