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दलित संगठनों के आगे झुकी मोदी सरकार? SC/ST एक्ट के पुराने प्रावधान वाले बिल को दी मंजूरी

20 मार्च को सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस एक के गोयल और जस्टिय यूयू ललित की खंडपीठ ने एससी/एसटी (अत्याचार रोकथाम) एक्ट में बड़ा बदलाव करते हुए फैसला सुनाया था कि किसी भी आरोपी को दलित अत्याचार के केस में प्रारंभिक जांच के बिना गिरफ्तार नहीं किया जा सकता है।

मोदी सरकार की कैबिनेट की बैठक के दौरान का दृश्य। (फाइल फोटो)

दलित नेताओं और दलित संगठनों की चेतावनी से सहमी केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने अनुसूचित जाति-जनजाति (अत्याचार रोकथाम) कानून के पुराने प्रावधानों को फिर से बहाल करने के लिए संसद के मौजूदा मानसून सत्र में बिल लाने का फैसला किया है। मोदी कैबिनेट ने आज (01 अगस्त) को इस बिल पर मुहर लगा दी। बता दें कि केंद्रीय मंत्री रामविलास पासवान और उनके सांसद बेटे चिराग पासवान ने भी संसद के मौजूदा सत्र में इस कानून की पुनर्बहाली से संबंधित बिल लाने या अध्यादेश लाने का अनुरोध प्रधानमंत्री से किया था। पिछले सोमवार (23 जुलाई) को पासवान के घर पर एनडीए के दलित सांसदों ने भी बैठक कर मोदी सरकार से इस कानून के पुराने प्रावधानों को फिर से बहाल करने का अनुरोध किया था। दलित संगठनों ने भी ऐसा करने और कानून को कमजोर करने वाले सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन जज जस्टिस ए के गोयल को एनजीटी अध्यक्ष पद से हटाने की मांग की थी। दलित संगठनों ने 9 अगस्त को देशव्यापी आंदोलन छेड़ने का एलान किया था।

बता दें कि 20 मार्च को सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस ए के गोयल और जस्टिय यूयू ललित की खंडपीठ ने एससी/एसटी (अत्याचार रोकथाम) एक्ट में बड़ा बदलाव करते हुए फैसला सुनाया था कि किसी भी आरोपी को दलित अत्याचार के केस में प्रारंभिक जांच के बिना गिरफ्तार नहीं किया जा सकता है। इससे पहले केस दर्ज होने के बाद ही गिरफ्तारी का प्रावधान था। कोर्ट के आदेश के मुताबिक, अगर किसी के खिलाफ एससी/एसटी उत्पीड़न का मामला दर्ज होता है, तो वो अग्रिम जमानत के लिए आवेदन कर सकेगा। जस्टिस गोयल 6 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट से रिटायर हुए थे और उसके बाद केंद्र सरकार ने उन्हें एनजीटी अध्यक्ष नियुक्त किया था। दलित सांसदों का तर्क था कि जस्टिस गोयल को एनजीटी अध्यक्ष नियुक्त किए जाने से दलित समुदाय के बीच मोदी सरकार के प्रति संदेश अच्छा नहीं गया है।

राजनीतिक गलियारों में इस बात की भी चर्चा है कि मोदी सरकार चुनावी साल में दलितों को नाखुश नहीं करना चाह रही है। बता दें कि इस साल के अंत तक मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में विधान सभा चुनाव होने हैं, जबकि अगले साल अप्रैल-मई में लोकसभा चुनाव होने हैं। दलितों की बेरुखी से भाजपा को हार का भय सताने लगा था क्योंकि 2014 के चुनावों में दलितों ने भी बढ़ चढ़कर भाजपा के पक्ष में वोट किया था।

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