प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जी-7 शिखर सम्मेलन में कहा कि आज के समय में आपसी विश्वास सबसे बड़ी रणनीतिक ताकत है और दुनिया विश्वास की कमी का सामना कर रही है। उन्होंने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप समेत जी-7 देशों के नेताओं से कहा कि देशों के बीच साझेदारी का भविष्य इसी विश्वास को दोबारा मजबूत करने पर निर्भर करेगा।

नरेंद्र मोदी ने पश्चिम एशिया में जारी संकट को खत्म करने के प्रयासों का स्वागत किया। उन्होंने होर्मुज जलमार्ग की स्थिति पर चिंता जताई और कहा कि इस संघर्ष में भारतीय नाविकों समेत कई भारतीयों की मौत हुई है। प्रधानमंत्री ने क्षेत्र में शांति और स्थिरता बहाल करने की जरूरत पर भी जोर दिया।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा, “हम पश्चिम एशिया में शांति स्थापित करने के लिए किए जा रहे प्रयासों का स्वागत करते हैं। इस संघर्ष के कारण क्षेत्र के हमारे मित्र देशों को जान-माल का नुकसान उठाना पड़ा है। होर्मुज़ जलमार्ग में समुद्री व्यापार बाधित होने से वैश्विक अर्थव्यवस्था प्रभावित हुई है। कई भारतीय नागरिकों की भी जान गई है।”

भारतीय नाविकों की मौत

उन्होंने कहा, “दुनिया के देशों को जोड़ने वाले समुद्री व्यापार में काम करने वाले नाविकों की सुरक्षा सुनिश्चित करना हमारी जिम्मेदारी है। यह जरूरी है कि समुद्री मार्ग सुरक्षित रहें और नाविक बिना किसी डर के अपना काम कर सकें।”

पिछले साढ़े तीन महीनों में अलग-अलग घटनाओं में तीन नाविकों समेत कम से कम 13 भारतीयों की मौत हुई है। भारतीय नाविकों वाले कई जहाज हमलों की चपेट में आए। ऐसी ही एक घटना में ओमान के पास अमेरिकी नौसेना के हमले में तीन भारतीयों की मौत हो गई। इसके बाद भारत ने अमेरिका के समक्ष आधिकारिक विरोध दर्ज कराया। नई दिल्ली ने अमेरिकी कार्यवाहक राजनयिक (चार्ज डी’अफेयर्स) को दो बार तलब किया और विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो से फोन पर इस मुद्दे को उठाया।

G7 के मंच से मोदी का संदेश

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा, “अंतरराष्ट्रीय साझेदारियां और वैश्विक एकजुटता तभी सार्थक होती हैं, जब हम साझा चुनौतियों का मिलकर सामना करें। भारत का दृढ़ विश्वास है कि दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में जारी तनाव और संघर्षों का स्थायी समाधान केवल संवाद, कूटनीति और अंतरराष्ट्रीय सहयोग के जरिए ही संभव है।”

मोदी ने यह बात जी-7 शिखर सम्मेलन में कही, जहां उनकी मुलाकात अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से हुई। फरवरी 2025 में व्हाइट हाउस में हुई मुलाकात के बाद यह दोनों नेताओं की पहली आमने-सामने की बैठक थी। हालांकि, पिछले 16 महीनों के दौरान दोनों नेताओं के बीच कई बार फोन पर बातचीत हो चुकी है।

जी-7 की यह बैठक ऐसे समय में हो रही है, जब अमेरिका और ईरान पश्चिम एशिया में युद्ध खत्म करने के लिए एक समझौते पर सहमत हो गए हैं। इस संकट और होर्मुज जलमार्ग के लगभग बंद होने की स्थिति का असर वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति और दुनिया की अर्थव्यवस्था पर पड़ा है।

‘नई साझेदारियां और अंतरराष्ट्रीय एकजुटता को फिर से मजबूत करने (Forging New Partnerships and Rebuilding International Solidarity)’ विषय पर आयोजित सत्र को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा, “आज की दुनिया पहले से कहीं अधिक आपस में जुड़ी हुई और एक-दूसरे पर निर्भर है। किसी भी देश की ऊर्जा सुरक्षा, खाद्य सुरक्षा, स्वास्थ्य सुरक्षा, साइबर सुरक्षा और आर्थिक समृद्धि अब केवल उसकी सीमाओं के भीतर तय नहीं होती।”

उन्होंने कहा, “लोगों की आवाजाही, डेटा, पूंजी और तकनीक जैसी चीजें आज पूरी दुनिया को एक-दूसरे से जोड़ती हैं। इसलिए साझा चुनौतियों का समाधान भी मिलकर ही तलाशना होगा।”

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा, “ऐसे समय में साझेदारियों का महत्व स्वाभाविक रूप से बढ़ जाता है। लेकिन कोई भी साझेदारी तभी सफल होती है जब उसकी नींव विश्वास पर टिकी हो। आज सबसे महत्वपूर्ण रणनीतिक संपत्ति कोई खनिज, तकनीक या बाजार नहीं बल्कि आपसी भरोसा है।”

उन्होंने कहा, “यह भरोसा होना चाहिए कि तकनीक और आपूर्ति श्रृंखलाओं (सप्लाई चेन) का इस्तेमाल वैश्विक भलाई के लिए होगा ना कि उन्हें हथियार बनाया जाएगा। यह विश्वास होना चाहिए कि विकास के अवसर कुछ चुनिंदा देशों तक सीमित नहीं रहेंगे। इसके साथ ही वैश्विक संस्थाएं सभी देशों की आकांक्षाओं को पूरा करने में सक्षम होंगी।”

मोदी ने कहा, “पिछली सदी में मानवता ने दो विश्व युद्धों का दर्द झेला। भारी बलिदान के बाद दुनिया ने शांति, स्थिरता और समृद्धि की दिशा में आगे बढ़ने के लिए कई व्यवस्थाएं विकसित कीं और उनकी नींव विश्वास पर रखी गई। लेकिन दशकों में बना यह भरोसा आज कमजोर पड़ रहा है। कोविड महामारी ने हमें आईना दिखाया और बताया कि विश्वास और एकजुटता के दावे कितने खोखले साबित हुए।”

उन्होंने कहा, “आज दुनिया संसाधनों की कमी से नहीं बल्कि भरोसे की कमी से जूझ रही है। हमारी साझेदारियों का भविष्य इसी विश्वास को फिर से कायम करने पर निर्भर करता है।”

अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन का जिक्र करते हुए मोदी ने कहा, “‘भरोसा करो, लेकिन सत्यापन भी करो’ (Trust, but verify) की बात आज भी उतनी ही प्रासंगिक है। आने वाली पीढ़ियों के लिए भरोसे पर आधारित और नियमों से संचालित वैश्विक व्यवस्था बनाना हमारी जिम्मेदारी है।” उन्होंने कहा कि भारत हमेशा दुनिया को एक परिवार के रूप में देखता आया है। भारत का अनुभव बताता है कि विकास तभी सबसे प्रभावी होता है, जब वह लोगों की आकांक्षाओं के अनुरूप हो। यही सिद्धांत हमारी अंतरराष्ट्रीय साझेदारियों की भी नींव है।

जी7 मंच पर कोविड वैक्सीन का जिक्र

कोविड महामारी का जिक्र करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा, “भारत ने 150 से अधिक देशों को दवाइयां और वैक्सीन उपलब्ध कराईं। भारत का मानना है कि साझेदारी की असली कसौटी यह नहीं है कि हम दूसरों के लिए क्या बनाते हैं बल्कि यह है कि हम दूसरों को अपने लिए निर्माण करने में कितना सक्षम बनाते हैं।”

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वैश्विक दक्षिण (ग्लोबल साउथ) की आवाज उठाते हुए कहा, “आज ग्लोबल साउथ को अंतरराष्ट्रीय समुदाय से काफी उम्मीदें हैं। लेकिन उन्हें सिर्फ मदद नहीं बल्कि बराबरी की साझेदारी चाहिए। वे वैश्विक विकास के केवल लाभार्थी नहीं बल्कि उसमें भागीदार बनना चाहते हैं।”

उन्होंने कहा, “हमें ‘दाता और प्राप्तकर्ता’ (Donor-Recipient) की सोच से आगे बढ़ना होगा और समान साझेदार के रूप में काम करना होगा। हमें उनके साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलना होगा सिर्फ उनके करीब खड़े होकर नहीं। साझेदारी की नींव निर्भरता नहीं बल्कि सम्मान और गरिमा पर आधारित होनी चाहिए।”

मोदी ने कहा कि “इन्हीं प्रयासों के जरिए हम आने वाली पीढ़ियों के सतत विकास के लिए मजबूत आधार तैयार कर सकते हैं।” जी-7 शिखर सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी, ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर और संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) के राष्ट्रपति मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान से भी मुलाकात की।