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रक्षा मंत्रालय के वरिष्‍ठ अधिकारी ने 36 रफाल जेट्स की खरीद पर जताई थी आपत्ति, सीएजी के पास है नोट

रक्षा मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने रफाल जेट्स सौदे में मानक कीमत को लेकर आपत्ति जताई थी। वे अधिकारी कांट्रैक्ट निगोशिएशन कमिटी के हिस्सा थे।

Author September 27, 2018 11:16 AM
भारत ने दसॉल्‍ट एविएशन से 36 राफेल लड़ाकू विमानों का सौदा किया है। (Photo : Dassault Aviation Website)

रफाल सौदे को लेकर शुरू हुए विवाद के बीच एक और खुलासा हुआ है। 36 रफाल जेट्स की खरीद को लेकर दिल्ली में भारत के तत्कालीन रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर और फ्रांस के उनके समकालीन के बीच सितंबर 2016 में हस्ताक्षर से करीब एक महीना पहले रक्षा मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने इसके मानक कीमत को लेकर आपत्ति जताई थी। वे अधिकारी उस वक्त रक्षा मंत्रालय में ज्वाइंट सेक्रेटरी और एक्यूशन मैनेजर (एयर) और कांट्रैक्ट निगोशिएशन कमिटी में शामिल थे। उन्होंने इससे संबंधित कैबिनेट को एक नोट भी लिखा था। सूत्रों ने इंडियन एक्सप्रेस को पुष्टि की है कि उनके आपत्तियों की वजह से कैबिनेट द्वारा इस सौदे को मंजूरी देने में देरी भी हुई और इसे तब मंजूरी दी गई जब उनकी आपत्तियों को रक्षा मंत्रालय के एक अन्य वरिष्ठ अधिकारी ने खारिज कर दिया। रक्षा मंत्रालय के अधिकारी द्वारा रफाल सौदे को लेकर दर्ज की गई आपत्ति अभी कैग के पास है और राजनीतिक विवाद शुरू होने के बाद इसका अध्ययन किया जा रहा है।

सूत्रों के अनुसार, दिसंबर माह में संसद के शीतकालीन सत्र में कैग इस रिपोर्ट को प्रस्तुत कर सकता है। कैग रिपोर्ट में रफाल डील को लेकर दर्ज की गई आपत्ति और उस आपत्ति को खारिज करने से जुड़ी विस्तृत जानकारी हो सकती है। रफाल डील को लेकर बनी कांट्रैक्ट निगोशिएशन कमिटी के अध्यक्ष इंडियन एयरफोर्स के डिप्टी चीफ और फ्रांस की टीम जिसकी अध्यक्षता जनरल कर रहे थे, के साथ कीमत को लेकर एक दर्जन से अधिक बार बैठक हुई। उसके बाद अंतिम फैसला लिया गया। रक्षा मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी द्वारा दर्ज कराए गए प्रमुख आपत्तियों में से एक यह थी, “36 नए रफाल की कीमत पिछले 126 प्रस्तावित राफेल विमान की मानक कीमत से अधिक थी।”

बता दें कि अप्रैल 2015 में पीएम मोदी के पेरिस यात्रा के दौरान 36 रफाल जेट्स के लिए दो सरकारों के बीच समझौता हुआ था। इसके बाद 24 जून 2015 को 2007 के 126 रफाल जेट्स के सौदे के प्रस्ताव को रद कर दिया गया। एमएमआरसीए निविदा के तहत, भारतीय वायुसेना ने छः फर्मों के लड़ाकू विमानों के परीक्षण किए थे और 2012 में यूरोफाइटर के साथ अपनी बोली के बाद डसॉल्ट के साथ बातचीत शुरू हुई थी। जेएस एंड एएम (एयर) के नोट ने इस बात की ओर इशारा किया है कि ईएडीएस, जर्मनी, यूरोफाइटर के निर्माताओं (दूसरे विमान जो आईएएफ परीक्षणों में योग्यता प्राप्त कर चुके थे) ने जुलाई 2014 में भारत सरकार को अपनी बोली कीमत पर 20 प्रतिशत छूट की पेशकश की थी। उस नोट में यह भी तर्क दिया गया कि इस 36 रफाल जेट्स की खरीद में भी 20 प्रतिशत की छूट मिलनी चाहिए थी क्योंकि अन्य कंपनियों ने यह पेशकश की थी। नोट में इस बात का भी उल्लेख किया गया है कि इंडियन एयरफोर्स में रूस के सुखोई सू-30 एमकेआई शामिल है, जिसे भारत में हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड द्वारा बनाया जा रहा है। जितनी राशि में 36 रफाल जेट्स खरीदी गई है, उतनी ही राशि में एचएएल से अधिक सुखाई विमान मिल सकता है।

सूत्रों के अनुसार, रक्षा मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारी के नोट पर 2016 के अगस्त महीने में पार्रिकर की अध्यक्षता में रक्षा अधिग्रहण परिषद (डीएसी) द्वारा विचार किया गया था। डीएसी की बैठक 36 राफले सौदे को मंजूरी देने और मंत्रिमंडल की मंजूरी की प्रक्रिश शुरू करने के लिए की गई थी। उस समय सितंबर के पहले सप्ताह में सौदे पर हस्ताक्षर करने के लिए फ्रांसीसी रक्षा मंत्री जीन-येव्स ले ड्रियन की नई दिल्ली की यात्रा पर आने वाले थे, लेकिन किसी कारणवश तब उनकी यह यात्रा स्थगित कर दी गई थी। हालांकि, डीएसी की बैठक के बाद रक्षा मंत्रालय के अधिकारी द्वारा दर्ज कराए गए आपत्तियों को एक अन्य वरिष्ठ अधिकारी द्वारा यह कहते हुए खारिज कर दिया गया कि मानक कीमत उस 18 राफेल विमान की कीमत से करनी चाहिए थी, जो उड़ने वाले स्थिति में फ्रांस से आ रहे हैं। साथ ही अधिक सुखोई विमान की तुलना में राफेल विमान को सही ठहराया गया। इसके बाद अापत्ति दर्ज करवाने वाले अधिकारी को एक महीने की छुट्टी पर भेज दिया गया और सितंबर 2016 के पहले सप्ताह में डीएसी द्वारा 36 रफाल विमान सौदे को मंजूरी दे दी गई। 59262 करोड़ के इस डील पर भारत और फ्रांस के बीच 23 सितंबर 2016 को हस्ताक्षर किया गया।

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