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कोविड की दूसरी लहर में कहीं भारी न पड़ जाए यह चूक, बच्चों के नियमित टीकाकरण पर पड़ा असर

कोलंबिया एशिया अस्पताल के बाल रोग विशेषज्ञ सुमित गुप्ता ने कहा कि टीकाकरण में एक या दो महीने की देरी हो सकती है, लेकिन बच्चों में सही समय पर प्रतिरक्षा की सही मात्रा का निर्माण करने के लिए अनिवार्य टीके निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार दिए जाने चाहिए।

Edited By Sanjay Dubey नई दिल्ली | Updated: June 13, 2021 5:06 AM
बच्चों में खून की कमी से निजात दिलाएं आयरनयुक्त फूड्स (फोटो क्रेडिट- Getty Images)

कोविड-19 महामारी की दूसरी लहर के दौरान बच्चों के नियमित टीकाकरण में भारी गिरावट पर चिंता व्यक्त करते हुए स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि बच्चों में उन बीमारियों का खतरा हो सकता है जिनका टीके से बचाव संभव है। उनका कहना है कि यह समस्या एक संभावित चुनौती के रूप में फिर से उभर सकती है। अधिकारियों के अनुसार, देशभर में एक वर्ष से कम उम्र के अनुमानित 20 लाख से 22 लाख बच्चों का हर महीने राष्ट्रीय कार्यक्रमों के तहत टीकाकरण किया जाता है और प्रति वर्ष बच्चों की यह संख्या लगभग 260 लाख होती है।

स्वास्थ्यकर्मियों ने कहा है कि कई माता-पिता अपने बच्चों को इस समय डीटीपी, न्यूमोकोकल, रोटावायरस और एमएमआर (खसरा, कण्ठमाला और रूबेला) जैसी बीमारियों के खिलाफ नियमित टीकाकरण के लिए लाने से डरते हैं। कोलंबिया एशिया अस्पताल के बाल रोग विशेषज्ञ सुमित गुप्ता ने कहा कि टीकाकरण में एक या दो महीने की देरी हो सकती है, लेकिन बच्चों में सही समय पर प्रतिरक्षा की सही मात्रा का निर्माण करने के लिए अनिवार्य टीके निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार दिए जाने चाहिए। उन्होंने कहा, ‘हमने दूसरी लहर के दौरान देखा है कि लगभग 60 फीसद बच्चे टीकाकरण से चूक गये है, जो पिछले साल से अधिक है। लोग अस्पताल आने से डरते हैं, कुछ टीकाकरण से इसलिए चूक गए क्योंकि वे पूर्णबंदी के कारण यात्रा नहीं कर सके।’ उन्होंने कहा, ‘लगभग सभी टीके, जिनमें अनिवार्य (डीटीपी और एमएमआर) और वैकल्पिक (मुख्य रूप से हेपेटाइटिस ए, टाइफाइड और चिकन पॉक्स) टीके शामिल हैं, दोनों साल में पूर्णबंदी के दौरान गिरावट देखी गई। जबकि हम टीकाकरण में एक या दो महीने की देरी कर सकते हैं, सही समय पर प्रतिरक्षा की सही मात्रा का निर्माण करने के लिए अनिवार्य टीकों को लगवाया जाना चाहिए।’

पारस अस्पताल में बाल रोग विभाग के प्रमुख मनीष मन्नान ने कहा कि देरी से टीकाकरण से टीके से बचाव योग्य बीमारियों से पीड़ित होने का खतरा बढ़ सकता है। उन्होंने कहा, ‘इससे इन बीमारियों से बच्चों के पीड़ित होने का खतरा हो सकता है और इससे टीके से बचाव योग्य बीमारियों का जोखिम भी हो सकता है।’

क्लाउडनाइन ग्रुप ऑफ अस्पताल, बंगलुरु के संस्थापक अध्यक्ष और नियोनेटोलॉजिस्ट किशोर कुमार ने कहा कि 70 फीसद नियमित टीकाकरण में कमी आई है। उन्होंने कहा, ‘प्राथमिक टीकाकरण बहुत जरूरी है। यदि प्राथमिक टीकाकरण में देरी होती है, तो बच्चों में टीके से बचाव योग्य बीमारियों के होने का खतरा हो सकता है और ये रोग एक संभावित चुनौती के रूप में फिर से उभर सकते हैं।’ कुछ अस्पतालों ने बच्चों के लिए घरेलू टीकाकरण अभियान भी शुरू किया है।

मदरहुड अस्पताल के सीईओ विजयरत्न वेंकटरमण ने कहा कि कोरोना संक्रमण के डर और अनिश्चितता के बाद के पूर्णबंदी ने लोगों की आवाजाही को बड़े पैमाने पर प्रतिबंधित कर दिया है। वेंकटरमण ने कहा, ‘इससे महामारी की शुरुआत के बाद से हमारी इकाइयों में 0-18 महीने के आयु वर्ग के बच्चों में टीकाकरण में 70 फीसद की गिरावट आई है। इसलिए, इस निराशाजनक प्रवृत्ति को देखते हुए, हमने हाल ही में बंगलुरु, नोएडा, चेन्नई, मुंबई, इंदौर और पुणे में अपनी सभी इकाइयों में घरेलू टीकाकरण अभियान शुरू किया है।’ उन्होंने कहा, ‘अब तक, हमने एक महीने में 1,000 घरेलू टीकाकरण किए हैं, हमें यह देखना चाहिए कि यह महत्त्वपूर्ण है कि बच्चों को बिना किसी देरी के नियमित टीकाकरण करना चाहिए।’

कोलंबिया एशिया अस्पताल के बाल रोग विशेषज्ञ सुमित गुप्ता ने कहा, ‘लगभग सभी टीके, जिनमें अनिवार्य (डीटीपी और एमएमआर) और वैकल्पिक (मुख्य रूप से हेपेटाइटिस ए, टाइफाइड और चिकन पॉक्स) टीके शामिल हैं, दोनों साल में पूर्णबंदी के दौरान गिरावट देखी गई। जबकि हम टीकाकरण में एक या दो महीने की देरी कर सकते हैं, सही समय पर प्रतिरक्षा की सही मात्रा का निर्माण करने के लिए अनिवार्य टीकों को लगवाया जाना चाहिए।’

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