रमजान के समाप्त होने के बाद जामिया मस्जिद में नमाज पढ़ने की अनुमति मिलने पर मीरवाइज़ उमर फारूक ने बुधवार को मुठभेड़ के दौरान गांदरबल निवासी राशिद अहमद मुगल की मौत पर दुख व्यक्त किया। नौहट्टा की जामिया मस्जिद में शुक्रवार की नमाज के दौरान मीरवाइज ने सभा को संबोधित करते हुए “गहरा दुख” व्यक्त किया और कहा, “उनके (मुगल के) परिवार ने बताया था कि वह कंप्यूटर ऑपरेटर थे और उनका उग्रवाद से कोई संबंध नहीं था। उन्हें उठाकर बेरहमी से मार डाला गया। उन्होंने कहा कि इस घटना से इस तरह की मुठभेड़ों की दर्दनाक यादें ताजा हो गईं।

मीरवाइज ने कहा कि हालांकि उनका परिवार निष्पक्ष जांच के माध्यम से न्याय की मांग कर रहा है। उन्होंने कहा कि हम केवल यही आशा कर सकते हैं कि न्याय होगा, लेकिन पिछले अनुभव विश्वास पैदा नहीं करते हैं।

उन्होंने कहा कि लेकिन उम्मीद करते हैं कि जैसे ही यह खबर आई है कि एलजी साहब ने खुद जांच के आदेश दिए हैं। इस बार न्याय होगा और दोषियों को जवाबदेह ठहराया जाएगा और उन्हें सजा दी जाएगी। उन्होंने आगे कहा कि शव को अंतिम संस्कार के लिए परिवार को न लौटाना “अमानवीय और निंदनीय” है।

मीरवाइज ने जामिया मस्जिद के बार-बार बंद होने पर भी चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि कश्मीर के मुसलमानों के इस प्रमुख नमाज स्थल तक पहुंच को अधिकारियों की मनमानी से बार-बार प्रतिबंधित किया जाता है। ईद की नमाज से वंचित रखा गया। साथ ही रमजान के दौरान कई शुक्रवारों की नमाज भी नहीं अदा की गई। उन्होंने कहा कि इस तरह के बार-बार लगाए जाने वाले प्रतिबंध सिर्फ एक मस्जिद को बंद करने तक सीमित नहीं हैं, बल्कि ये उस व्यापक वास्तविकता को दर्शाते हैं, जब प्रतिबंधों, रोक और सेंसरशिप के माध्यम से लोगों के मौलिक अधिकारों को कुचलकर सामान्य स्थिति का ढोल पीटा जाता है। दुर्भाग्य से, कश्मीरियों का उत्पीड़न निरंतर जारी है।

उन्होंने अपने भाषण में दावा किया कि जम्मू-कश्मीर में कार्यरत विभिन्न एजेंसियों, जिनमें एसआईए, सीआईके, साइबर सेल, एसीबी और एनआईए शामिल हैं। उनके द्वारा कश्मीरियों के खिलाफ विभिन्न आधारों पर मामले दर्ज करने, आरोपपत्र दाखिल करने और गिरफ्तारियां करने की खबरें अखबारों में लगभग रोजाना आती रहती हैं। उन्होंने कहा कि इसके अलावा, कश्मीरी सरकारी कर्मचारियों की बार-बार गैर-न्यायिक बर्खास्तगी भी की जाती है, जिसमें न्यायिक उपचार का कोई सहारा नहीं होता है।

मीरवाइज ने आगे कहा कि इससे भय का माहौल बनता है और उस धारणा को बल मिलता है जो एक पूरे समुदाय को “खतरनाक और संदिग्ध” के रूप में चित्रित करती है, जिन पर नियंत्रण करके शासन किया जाना चाहिए। इस नीति को “दबावपूर्ण” बताते हुए उन्होंने कहा कि यदि अधिकारी यही दावा करते हैं, तो इससे न तो स्थायी शांति स्थापित हो सकती है और न ही प्रगति हो सकती है।

बता दें, भारतीय सेना ने 1 अप्रैल को एक बयान में कहा था कि इलाके में संदिग्ध गतिविधि देखे जाने के बाद एक आतंकवादी मारा गया। हालांकि, मृतक की पहचान जारी नहीं की गई थी।

गुरुवार को राशिद अहमद मुगल के परिवार ने दावा किया कि उनका उग्रवाद से कोई संबंध नहीं था। उनके भाई एजाज अहमद मुगल ने इंडियन एक्सप्रेस को बताया था कि राशिद एम.कॉम डिग्री धारक थे और मामूली शुल्क पर ग्रामीणों को दस्तावेज़ीकरण में मदद करते थे। गांव के दो पूर्व पंचायत सदस्यों ने भी इसकी पुष्टि की थी। जम्मू और कश्मीर के गृह विभाग, जो उपराज्यपाल मनोज सिन्हा के अधीन आता है। उन्होंने अब मुठभेड़ की मजिस्ट्रियल जांच के आदेश दिए हैं।

तमिलनाडु: चुनाव मैदान से दूर क्यों है बीजेपी का ‘सिंघम’? प्रत्याशियों की लिस्ट में नहीं मिली जगह 

बीजेपी ने शुक्रवार दोपहर तमिलनाडु विधानसभा चुनाव के लिए 27 उम्मीदवारों की लिस्ट जारी कर दी। बीजेपी की इस लिस्ट में सबसे ज्यादा चौंकाने वाली बात उसके स्टार नेता के.अन्नामलाई का नाम न होना था। बीजेपी की इस लिस्ट में केंद्रीय मंत्री एल. मुरुगन को अविनाशी, पूर्व राज्यपाल तमिलिसाई सुंदरराजन को मायलापुर (चेन्नई में बीजेपी को मिली एकमात्र सीट) से प्रत्याशी बनाया गया है। पढ़ें पूरी खबर।