एमएसपी और आर्थिकी: कितना फायदेमंद क्या है अंदेशा

एमएसपी यानी न्यूनतम समर्थन मूल्य वह न्यूनतम मूल्य होता है, जिस पर सरकार, किसानों की फसल खरीदती है। इसे ऐसे भी समझ सकते हैं कि सरकार, किसान से खरीदी जाने वाली फसल पर उसे एमएसपी से नीचे भुगतान नहीं करेगी।

क्या पूरे देश के किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य देना संभव है? कहां से आएगा पैसा और अर्थव्यवस्था पर क्या पड़ेगा असर? सरकार द्वारा कृषि कानूनों को वापस लिए जाने के बाद किसानों ने न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की गारंटी को लेकर कानून बनाने की मांग शुरू कर दी है। किसानों की कई और मांगें हैं, लेकिन एमएसपी का मुद्दा ज्यादा गरमाया हुआ है। एमएसपी यानी न्यूनतम समर्थन मूल्य वह न्यूनतम मूल्य होता है, जिस पर सरकार, किसानों की फसल खरीदती है। इसे ऐसे भी समझ सकते हैं कि सरकार, किसान से खरीदी जाने वाली फसल पर उसे एमएसपी से नीचे भुगतान नहीं करेगी।

एमएसपी के पक्ष में तर्क
एमएसपी वह न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी कीमत की गारंटी है, जो किसानों को उनकी फसल पर मिलता है। भले ही बाजार में उस फसल की कीमतें कम हो। इसके पीछे तर्क यह है कि बाजार में फसलों की कीमतों में होने वाले उतार-चढ़ाव का किसानों पर असर न पड़े। उन्हें न्यूनतम कीमत मिलती रहे। सरकार हर फसल के मौसम से पहले सीएसीपी यानी ‘कमीशन फार एग्रीकल्चर कास्ट एंड प्राइसेज’ की सिफारिश पर एमएसपी तय करती है। यदि किसी फसल की अच्छी पैदावार हुई है तो उसकी बाजार में कीमतें कम होती है, तब एमएसपी से राहत मिलती है। यह एक तरह से कीमतों में गिरावट पर किसानों को बचाने वाली बीमा पालिसी की तरह काम करती है।

कब से और क्यों लागू
वर्ष 1950 और 1960 के दशक में किसान परेशान थे। यदि किसी फसल का उत्पादन अच्छा होता था तो उन्हें उसकी अच्छी कीमत नहीं मिल पाती थी। इस वजह से किसान आंदोलन करने लगे थे। लागत तक नहीं निकल पाती थी। ऐसे में अनाज का प्रबंधन बड़ा संकट बन गया था। सरकार का नियंत्रण नहीं था। तब 1964 में एलके झा के नेतृत्व में ‘फूड-ग्रेन्स प्राइस कमेटी’ बनाई गई।

झा कमेटी के सुझावों पर ही 1965 में भारतीय खाद्य निगम (एफसीआइ) की स्थापना हुई और एग्रीकल्चरल प्राइजेस कमीशन (एपीसी) बना। इन दोनों संस्थाओं का काम था देश में खाद्य सुरक्षा का प्रशासन करने में मदद करना। एफसीआइ वह एजंसी है जो एमएसपी पर अनाज खरीदती है। उसे अपने गोदामों में जमा करती है और जन वितरण प्रणाली (पीडीएस) के जरिए जनता तक अनाज को रियायती दरों पर पहुंचाती है। पीडीएस के तहत देशभर में करीब पांच लाख उचित मूल्य दुकानें हैं।

किसानों को किस तरह से लाभ
सरकारी आंकड़े हैं कि नौ सितंबर तक रबी सीजन में गेहूं पर एमएसपी का लाभ लेने वाले 43.33 लाख किसान थे, यह पिछले साल के 35.57 लाख से करीब 22 फीसद ज्यादा थे। बीते पांच साल में एमएसपी का लाभ उठाने वाले गेहूं के किसानों की संख्या दोगुनी हुई है। वर्ष 2016-17 में सरकार को एमएसपी पर गेहूं बेचने वाले किसानों की संख्या 20.46 लाख थी। अब इन किसानों की संख्या 112 फीसद ज्यादा है। रबी के मौसम में सरकार को गेहूं बेचने वाले किसानों में मध्यप्रदेश (15.93 लाख) सबसे आगे था।

पंजाब (10.49 लाख), हरियाणा (7.80 लाख), उत्तरप्रदेश (6.63 लाख) और राजस्थान (2.19 लाख) इसके बाद थे। खरीफ सीजन में एमएसपी पर धान बेचने वाले किसानों की संख्या 2018-19 के 96.93 लाख के मुकाबले बढ़कर 1.24 करोड़ हो गई यानी 28 फीसद ज्यादा। खरीफ सीजन 2020-21 के लिए अब तक खरीद शुरू नहीं हुई है। 2015-16 के मुकाबले यह बढ़ोतरी 70 फीसद से ज्यादा है।

कानूनी गारंटी से क्या है डर
सरकार लारा घोषित 22 फसलों के मौजूदा एमएसपी पर सभी फसलों की खरीद अगर सरकार को करनी होगी, तो इस पर 17 लाख करोड़ रुपए से ज्यादा खर्च होगा। जबकि केंद्र सरकार की राजस्व प्राप्तियां सिर्फ 16.5 लाख करोड़ रुपए हैं। एमएसपी अनिवार्य करने की सूरत में हमेशा सस्ता आयात बढ़ने की आशंका बनी रहेगी क्योंकि अंतरराष्ट्रीय बाजार में अगर कृषि उत्पादों के दाम भारत के मुकाबले कम होंगे तो देश के निजी कारोबारी किसानों से फसल खरीदने के बजाय विदेशों से आयात करेंगे।

अगर सरकार किसानों से सारी फसलें एमएसपी पर खरीदेगी तो इसके बजट के लिए करों में करीब तीन गुना वृद्धि करनी होगी, जिससे देश के करदाताओं पर कर का बोझ बढ़ेगा। करों में ज्यादा वृद्धि होने से देश में निवेश नहीं आ पाएगा और रोजगार के नए अवसर पैदा नहीं हो पाएंगे।

क्या कहते हैं जानकार
यह कहना अतिशयोक्ति है कि एमएसपी को कानूनी दर्जा देने से बड़ा आर्थिक नुकसान होगा। एमएसपी, मुक्त बाजार के विचार के खिलाफ नहीं है। इससे कीमतों में तेज उतार-चढ़ाव से बचने में मदद मिलती है।

अभिजीत सेन, सीएसीपी के पूर्व अध्यक्ष और पूर्ववर्ती योजना आयोग के सदस्य

एमएसपी को कानूनी दर्जा देने से महंगाई काफी बढ़ेगी और ऊंची कीमत पर कृषि उत्पादों का निर्यात मुश्किल होगा। अभी किसानों के सामने एपीएमसी मंडी और मुक्त राष्ट्रीय बाजार के रूप में विकल्प उपलब्ध हैं, जो खत्म हो जाएंगे।

अशोक दलवई, मुख्य कार्य अधिकारी,
नेशनल रेनफेड अथारिटी (किसानों की आय दोगुनी करने की सिफारिश करने वाली समिति)

अमेरिका में कैसे हुई मुश्किल
1977 में जिमी कार्टर अमेरिका के राष्ट्रपति थे। किसानों ने दूध का उत्पादन बढ़ा दिया। तब सरकार ने तय किया कि वो खुद खरीदेगी। लेकिन सरकार के पास भंडारण की सुविधा कम थी। दूध होने लगा तो अमेरिकी सरकार ने तय किया कि वो किसानों से दूध नहीं ‘चीज’ खरीदेगी। सरकार ने चीज खरीदनी शुरू की। जल्दी ही सारे सरकारी गोदाम भर गए। सरकार ने जमीन के 33 फीट नीचे का एक बड़ा गोदाम भी बनवाया। 1980 में जिमी कार्टर की सरकार चली गई। 1981 तक इस योजना पर अमेरिकी सरकार का 200 करोड़ डालर यानी 14 हजार 875 करोड़ खर्च हो चुके थे। आर्थिक दबाव के कारण सरकार को योजना वापस लेनी पड़ी, तब तक वहां की अर्थव्यवस्था तबाह हो चुकी थी।

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