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न्यूनतम समर्थन मूल्य व मंडी प्रणाली, किसान हितों के सवाल और पूंजी पर जारी मंथन

कृषक उपज व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सरलीकरण) कानून के तहत किसानों और व्यापारियों को एपीएमसी की मंडी से बाहर फसल बेचने की आजादी होगी। सरकार का कहना है कि वह एपीएमसी मंडियां बंद नहीं कर रही है बल्कि किसानों के लिए ऐसी व्यवस्था कर रही है जिसमें वह निजी खरीददार को अच्छे दामों में अपनी फसल बेच सके।

मंडी में गेहूं उतारते किसान (ऊपर), भारतीय किसान यूनियन के महासचिव धर्मेंद्र मलिक, (नीचे बाएं) और पूर्व कृषि सचिव सिराज हुसैन (नीचे दाएं)।

कृषि कानून में संशोधनों का जबरदस्त विरोध हो रहा है। देश भर में किसान सड़कों पर हैं। विरोध में केंद्रीय मंत्री रहीं हरसिमरत कौर बादल ने इस्तीफा दे दिया और उनकी पार्टी शिरोमणि अकाली दल ने राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन से बरसों पुराना अपना नाता तोड़ लिया। विपक्षी दल लगातार विरोध कर रहे हैं। विधेयकों पर राष्ट्रपति की मुहर लगने के बाद विपक्ष अब अदालत जाने की तैयारी कर रहा है। किसानों का डर न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) और मंडियों (एग्रीकल्चर प्रोड्यूस मार्केट कमेटी, एपीएमसी) को लेकर है, जो आशंका जता रहे हैं कि खेतों और मंडियों पर बड़े कारपोरेट घरानों का कब्जा हो जाएगा। जबकि सरकार का कहना है कि कृषि क्षेत्र के लिए लाए जा रहे बदलावों से किसानों को लाभ होगा। बिचौलिए खत्म होंगे। इससे सबसे ज्यादा फायदा छोटे किसानों को होगा।

क्या चाहते हैं किसान
प्रधानमंत्री और कृषि मंत्री बार-बार यह कह रहे हैं कि न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) और मंडी व्यवस्था (एपीएमसी) पहले की तरह ही रहेगी। लेकिन इसे लेकर किसान संगठन यह चाहते है कि सरकार इसका कानून बना दे। किसान चाहते हैं कि सरकार एमएसपी को लेकर कानून बना दे, जिससे किसान मंडी या उसके बाहर सरकार द्वारा तय एमएसपी पर अपना उत्पाद बेच सकें। साथ ही, मंडियों का सरकार नियमन कर दे, जिससे किसानों के हित सुरक्षित रहें।

कृषि कानूनों को लेकर किसानों की अलग-अलग आशंकाएं हैं। किसानों का मानना है कि धीरे-धीरे एपीएमसी (एग्रीकल्चर प्रोड्यूस मार्केट कमेटी) यानी मंडियां खत्म हो जाएंगी। निजी कंपनियों को बढ़ावा मिलेगा, जिससे किसानों को उनकी फसल का उचित मूल्य नहीं मिलेगा। हालांकि, प्रधानमंत्री और कृषि मंत्री समेत सरकार के विभिन्न स्तरों से कई बार कहा जा चुका है कि एमएसपी (न्यूनतम समर्थन मूल्य) का प्रावधान खत्म नहीं हो रहा है और न ही सरकारी खरीद बंद हो रही है।

क्या हैं आशंकाएं
कृषक उपज व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सरलीकरण) कानून के तहत किसानों और व्यापारियों को एपीएमसी की मंडी से बाहर फसल बेचने की आजादी होगी। सरकार का कहना है कि वह एपीएमसी मंडियां बंद नहीं कर रही है बल्कि किसानों के लिए ऐसी व्यवस्था कर रही है जिसमें वह निजी खरीददार को अच्छे दामों में अपनी फसल बेच सके। कृषक (सशक्तिकरण व संरक्षण) कीमत आश्वासन और कृषि सेवा पर करार कानून कृषि करारों पर राष्ट्रीय फ्रेमवर्क के लिए हैं। इससे कृषि उत्पादों की बिक्री, कृषि सेवाओं, कृषि कारोबार कंपनियों, प्रसंस्करणकर्ताओं, थोक विक्रेताओं, बड़े खुदरा विक्रेताओं और निर्यातकों के साथ किसानों को जुड़ने के लिए सशक्त करने की बात कही गई है। इससे ठेका कृषि में किसानों के आने के लिए एक ढांचा मुहैया कराने की बात है।

दरअसल, ठेका कृषि और फसलों को मंडियों से बाहर बेचने जैसी कवायद पहले भी होते रही है। अब इसमें कॉरपोरेट की पैठ हो जाएगी। साथ ही, कानूनी रूप से किसानों के हाथ बंध जाएंगे। अब ठेका कृषि में किसान सिर्फ एसडीएम के पास जा सकता है। जबकि, पूर्ववर्ती कानून के तहत वह अदालत जा सकता था। साथ ही, कॉरपोरेट कंपनियों को किसी फसल की खरीद के लिए लाइसेंस लेने की जरूरत नहीं होगी।

एमएसपी : संशय और सवाल
नए कानूनों में मंडी के बाहर एमएसपी की व्यवस्था न किया जाना विवाद का बिंदु बना हुआ है। तीनों कानूनों में मंडी के बराबर कोई दूसरी व्यवस्था बनाने का प्रावधान नहीं किया गया है। किसानों की मांग है कि अगर निजी घराने या ठेका कृषि कराने वाले अगर आ रहे हैं तो उनके लिए भी एमएसपी की व्यवस्था होनी चाहिए। उदाहरण के रूप में अगर गेहूं के लिए 1925 रुपए की दर मंडी के लिए तय की जाए तो वही व्यवस्था निजी कंपनियों के लिए भी होनी चाहिए। नए कानूनों के समर्थन में सवाल उठ रहा है कि आखिर कितने किसान एमएसपी व्यवस्था का लाभ उठा पाते हैं?

दरअसल, भारतीय खाद्य निगम की कार्यकुशलता और वित्तीय प्रबंधन में सुधार के लिए बनाई गई शांता कुमार समिति की रिपोर्ट में कहा गया है कि सिर्फ छह फीसद किसान ही एमएसपी पर अपनी फसल बेच पाते हैं। देश में 23 फसलों पर ही एमएसपी है अगर एमएसपी का प्रावधान निजी कंपनियों के लिए किया गया होता तो इससे देश के सभी राज्यों के किसानों को फायदा पहुंचता। 2015-16 में हुई कृषि गणना के अनुसार देश के 86 फीसद किसानों के पास छोटी जोत की जमीन है या उनके पास 2 हेक्टेयर से कम जमीन है।

क्या कहते हैं जानकार
सरकार के हाथ में खाद्यान्न नियंत्रण नहीं रहेगा, सबसे बड़ा खतरा यही है। इससे धीरे-धीरे कृषि से जुड़ी पूरी ग्रामीण अर्थव्यवस्था चौपट हो जाएगी। निजी व्यापारी आपूर्ति शृंखला को अपने हिसाब से तय करते हैं और बाजार को चलाते हैं, जिसका सीधा असर ग्राहकों पर पड़ेगा।
-धर्मेंद्र मलिक, महासचिव भारतीय किसान यूनियन

यह संभव है कि किसान उत्पादक संगठन कुछ नगदी वाली फसलों के लिए छोटे खरीदारों से करार करें। इस बात की संभावना काफी कम है कि किसान बड़े व्यापारियों के साथ अनुबंध करेंगे, क्योंकि वे कॉरपोरेट कंपनियों के राजनीतिक प्रभाव से बेहद भयभीत हैं और कानून रास्ता उनके लिए महंगा साबित होगा।
-सिराज हुसैन, पूर्व कृषि सचिव

मंडी प्रणाली: संशय व सवाल
किसान नेताओं का कहना है कि बड़ी कंपनियां एक साल अच्छे दामों में फसल खरीदेंगी। उसके बाद जब मंडियां बंद हो जाएंगी तो मनमाने दाम लगाएंगी। बिहार का उदाहरण दिया जा रहा है। वहां मंडी प्रणाली खत्म होने के बाद किसानों की हालत ठीक नहीं है और उनसे मनमाने दामों पर फसल खरीदी जाती है। बिहार में 2006 में एपीएमसी एक्ट को खत्म कर दिया गया था। कहा गया था कि किसानों को राज्य में अपनी फसल अपने मनपंसद दामों में बेचने में मदद मिलेगी। लेकिन हर साल वहां के किसानों को अपनी फसल पंजाब और हरियाणा की मंडियों में बेचनी होती है।

इन सबके बीच एपीएमसी मंडियों की हालत को लेकर भी अरसे से उठते रहे सवाल भी हैं। पंजाब में सबसे बड़ा मंडियों का नेटवर्क है। लेकिन वहां बासमती चावल के निर्यातक 4.50 फीसद कर हटाने की अरसे से मांग कर रहे हैं, क्योंकि बाहर से खरीद पर कोई कर नहीं लगता। इसी तरह कपास और दूसरे सामान के निर्यातक भी मंडियों के कर का विरोध करते रहे हैं।

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