बिहार के बेगुसराय जिले के बरौनी में इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन लिमिटेड की रिफाइनरी में संविदा कर्मचारी विमलेश अब अपने हक के लिए कानूनी लड़ाई में उलझा हुआ है। दो साल तक विमलेश कुमार रोज करीब 12 घंटे काम करते थे। वे हफ्ते में सिर्फ रविवार और कभी-कभी आने वाली छुट्टियों पर ही आराम करते थे। उन्हें उम्मीद थी कि उन्हें ओवरटाइम का पैसा मिलेगा। उनके दो छोटे बच्चे हैं और घर की आर्थिक हालत ठीक नहीं है, इसलिए वे इस पैसे से अपनी परेशानी कम करना चाहते थे।
यह पैसा कभी नहीं आया। विमलेश ने इंडियन एक्सप्रेस को बताया, “मेरा ओवरटाइम लगभग 2 लाख रुपये बनता है। उन्होंने जांच करने और बकाया भुगतान करने का वादा किया था, लेकिन अभी तक ऐसा नहीं हुआ है।”
वह अकेला नहीं है। 2 फरवरी को आईओसीएल रिफाइनरी में मजदूरों ने हड़ताल की थी। उनकी मांग थी कि उन्हें ओवरटाइम का पैसा समय पर मिले, काम के घंटे सिर्फ 8 हों और जरूरी सुविधाएं दी जाएं। इसके बाद अलग-अलग औद्योगिक इलाकों में ऐसे ही विरोध शुरू हो गए। नोएडा में भी 13 अप्रैल को वेतन को लेकर प्रदर्शन हुआ, जो बाद में हिंसक हो गया।
हालात में कोई बदलाव नहीं आया
एक दिन की हड़ताल के दो महीने बाद भी मजदूरों का कहना है कि हालात में ज्यादा बदलाव नहीं आया है। इस हड़ताल में उन्होंने 8 घंटे काम का नियम, समय पर ओवरटाइम का पैसा, पीएफ जैसी सुविधाएं और काम की जगह पर शेड, पीने का पानी और शौचालय जैसी बुनियादी चीजें मांगी थीं।
इंडियन एक्सप्रेस से बात करने वाले मजदूरों का दावा है कि जमीनी हकीकत में कुछ खास बदलाव नहीं आया है। उनका आरोप है कि हड़ताल के बाद किए गए वादों के बावजूद उन्हें ओवरटाइम का भुगतान नहीं किया गया है। यह मामला तब और भी महत्वपूर्ण हो जाता है जब 13 अप्रैल को नोएडा में वेतन बढ़ोतरी को लेकर हुए श्रमिक विरोध प्रदर्शन हिंसक हो गए थे।
एक स्थायी कर्मचारी के अनुसार, श्रमिकों को अक्सर निर्धारित आठ घंटे की शिफ्ट से ज्यादा ओवरटाइम भुगतान का वादा किया जाता है, लेकिन भुगतान में अक्सर देरी होती है। इस कर्मचारी ने कहा, “नियमित घंटों का भुगतान तो हो जाता है, लेकिन ओवरटाइम, जिसमें दुगना भुगतान शामिल होता है, के मामले में स्थिति अलग है। श्रमिकों ने ठेकेदारों से इस बारे में बात की है और उनसे या तो वर्कशीट का ठीक से पालन करने या गेट पास रद्द करने के लिए कहा है ताकि वे कहीं और काम तलाश सकें।” आईओसीएल ने कहा कि एक समिति का गठन किया गया है और इन 11 श्रमिकों के दावों को सुना और उन पर कार्रवाई की जाएगी।”
क्या कहता है कानून?
भारत के श्रम कानूनों के अनुसार, काम के घंटे आमतौर पर 8-9 घंटे होते हैं और इससे ज्यादा या हर हफ्ते 48 घंटे से ज्यादा काम करने पर अनिवार्य रूप से ओवरटाइम का भुगतान किया जाता है। हालांकि, ओवरटाइम का भुगतान सामान्य वेतन का दोगुना होता है। अप्रैल तक बिहार में अकुशल श्रमिकों के लिए न्यूनतम मजदूरी 428 रुपये प्रतिदिन, अर्ध-कुशल श्रमिकों के लिए 444 रुपये, कुशल श्रमिकों के लिए 541 रुपये और उच्च कुशल श्रमिकों के लिए 660 रुपये प्रतिदिन है। मजदूरी में साल में दो बार 1 अप्रैल और 1 अक्टूबर को संशोधन किया जाता है।
हालांकि, श्रमिकों का दावा है कि इन नियमों का अक्सर उल्लंघन किया जाता है और निजी ठेकेदार संविदा श्रमिकों को ओवरटाइम का भुगतान करने में कंजूसी करते हैं। ज्यादातर अन्य शिकायतें भी निजी ठेकेदारों से जुड़ी हैं जैसे कि मारपीट और दुर्व्यवहार के आरोप।
संविदा कर्मचारियों का यह भी दावा है कि उन्हें न्यूनतम मजदूरी से कम भुगतान किया जाता है और उनकी मजदूरी का एक हिस्सा कमीशन के रूप में ठेकेदारों के पास चला जाता है। विमलेश कुमार ने कहा, “नतीजतन, हमें केवल 400 रुपये प्रतिदिन मिलते हैं, जबकि अकुशल श्रमिकों के लिए निर्धारित दर 551 रुपये प्रतिदिन है।”
वहीं एक अन्य कर्मचारी, रोहित कुमार ने कहा, “कॉन्ट्रैक्टर वर्कर आमतौर पर स्थायी कर्मचारियों से कम कमाते हैं और उन्हें यात्रा और अन्य भत्ते नहीं मिलते। हमारा कार्यकाल भी अनिश्चित होता है और जो लोग सबसे बाद में काम शुरू करते हैं, कॉन्ट्रैक्ट खत्म होने पर सबसे पहले उनकी नौकरी चली जाती है।”
ये शिकायतें 2 फरवरी को अपने चरम पर पहुंच गईं। उस दिन एक कर्मचारी को नौकरी से निकाल दिया गया, जिसके बाद झड़प हुई। इससे बाकी कर्मचारियों को डर लगने लगा कि कहीं उन्हें भी बिना वेतन के नौकरी से न निकाल दिया जाए और इसी वजह से विरोध शुरू हो गया। बाद में कर्मचारियों से बातचीत के बाद आईओसीएल प्रबंधन कुछ बातों पर मान गया। इनमें ओवरटाइम का पैसा देना, हर हफ्ते छुट्टी सुनिश्चित करना, शिकायतें सुनने के लिए साप्ताहिक समिति बनाना और पीएफ, नोटिस वेतन व छंटनी से जुड़े नियमों की हर तीन महीने में समीक्षा करना शामिल है।
आईओसीएल के 2 फरवरी के पत्र में कहा गया, “शेड और पेयजल जैसी साइट सुविधाओं से संबंधित मुद्दों की निगरानी समिति द्वारा की जाएगी। 1 दिसंबर 2025 से, वेतन भुगतान से संबंधित सभी विवादों का समाधान बायोमेट्रिक डेटा के आधार पर किया जाएगा।”
नियमों का ठीक से पालन नहीं हो रहा- श्रमिक
लेकिन श्रमिकों का दावा है कि नियमों का पालन ठीक से नहीं हो रहा है। रिफाइनरी में काम करने वाले राकेश सिंह ने कहा, “कुछ मामलों में, भुगतान दो या तीन महीने बाद आता है। हमें रविवार और छुट्टियों में काम करने के लिए कहा जाता है, लेकिन मुआवजा हमेशा उचित नहीं होता। गणतंत्र दिवस और स्वतंत्रता दिवस को छोड़कर, सार्वजनिक अवकाशों का भी शायद ही कभी पालन किया जाता है।”
अपने ओवरटाइम का भुगतान अभी तक न होने के कारण कम से कम 11 श्रमिकों ने कंपनी के समक्ष अपील दायर की है और कंपनी अब 4 मई को पटना में उनके मामलों की सुनवाई करेगी। इनमें रणजीत कुमार भी शामिल हैं, जो दावा करते हैं कि उन्होंने 14 महीने बिना ओवरटाइम के काम किया है। उन्होंने कहा, “कंपनी का कहना है कि ठेकेदार भुगतान करेगा, ठेकेदार कंपनी की ओर इशारा कर रहा है। अब 4 मई को सुनवाई है।”
भुगतान को लेकर अनिश्चितता जारी रहने के कारण विमलेश कुमार के बिल बढ़ते जा रहे हैं, जिससे उन्हें घर चलाने के लिए 1 लाख रुपये उधार लेने के लिए मजबूर होना पड़ा है। उन्होंने कहा, “हमारा गुजारा बहुत मुश्किल से चल रहा है। स्कूल की फीस, छोटे बच्चे के लिए दूध, सब के लिए खाना, ये बुनियादी चीजें हैं, इसलिए मुझे किसी तरह अपने परिवार के लिए इनका इंतजाम करना पड़ता है।” उन्होंने कहा, “सिर्फ तनख्वाह से कभी गुजारा नहीं होता था, इसलिए मैंने इतने घंटे अतिरिक्त काम किया। अब, हर दिन जब तक हमें बकाया पैसे नहीं मिलते, हम कर्ज में और डूबते जा रहे हैं।”
नोएडा में महिला गिग वर्कर्स का विरोध प्रदर्शन
पिछले कुछ दिनों में नोएडा में वेतन को लेकर मजदूरों ने विरोध-प्रदर्शन किया। इसी के मद्देनजर गिग इकोनॉमी में कार्यरत महिलाओं के एक छोटे समूह ने बुधवार सुबह एक अलग मांग के साथ इकट्ठा होकर अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि हमें ज्यादा वेतन नहीं बल्कि निश्चित काम के घंटे और वर्कप्लेस पर बुनियादी चीजें होनी चाहिए। पढ़ें पूरी खबर…
