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लोकसभा में कांग्रेस के सदस्य तो बढ़े पर प्रभाव नहीं

सोनिया गांधी जरूर पहले की तरह सक्रिय हैं लेकिन वे कभी खुलकर नहीं बोलती हैं। हिंदी भाषी और बेहतर बोलने वालों का इस बार विपक्ष में भारी अभाव है।

rahul gandhiराहुल गांधी बीते कई दिनों से भारत से बाहर हैं। (एक्सप्रेस फोटो)

लोकसभा चुनाव नतीजों से विपक्ष उबर ही नहीं पा रहा है। 16वीं लोकसभा के मुकाबले 17वीं लोकसभा में विपक्ष के सदस्यों की संख्या ज्यादा कम नहीं हुई है बावजूद इसके संसद चलते हुए महीने से ज्यादा हो गए लेकिन एक दिन भी विपक्ष सदन की कार्यवाही अपने हिसाब से चलवाने में सफल नहीं हो पाया। कर्नाटक में जारी राजनीतिक घटनाक्रम को लेकर कांग्रेस और सहयोगी दलों के सदस्यों ने शुक्रवार को लोकसभा में हंगामा जरूर किया और सत्तारूढ़ भाजपा पर चुनी हुई सरकारों को गिराने का आरोप लगाते हुए सदन से वाकआउट भी किया। पर वह इस मुद्दे को संसद के अंदर ढंग से उठा पाने में एक तरह से विफल ही रही। जबकि कर्नाटक का राजनीतकि संकट कई दिनों से चल रहा है।

इसी तरह गोवा में कांग्रेस के चुने हुए दस विधायक भाजपा में शामिल होने पर कांग्रेस ने कुछ किया ही नहीं। लोकसभा में भाजपा के 303 सांसद राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) के 353 सदस्य हैं। लेकिन कांग्रेस के सदस्यों की संख्या तो पिछली बार से बढ़ी ही है। बावजूद इसके एक दिन भी राहुल गांधी संसद में अब तक ठीक से नहीं बोले और न ही संसद परिसर में कोई धरना-प्रदर्शन हुआ।

पिछले सत्र में नोटबंदी और जीएसटी पर महीनों संसद नहीं चल पाई। कई बिलों को तो केवल पास करने की औपचारिकता पूरी की गई। पर बताते हैं कि 20 सालों के दौरान आहूत किसी भी सत्र के मुकाबले संसद का यह सबसे ज्यादा कामकाज वाला सत्र रहा है। 17वीं लोकसभा के पहले सत्र की उत्पादकता 128 फीसद आंकी गई है। लोकसभा अध्यक्ष सदन में रोज नए प्रयाग कर रहे हैं। बैठक कई बार रात 11 बजे के बाद तक चली है।

बात करें अकेले कांग्रेस की तो एक तो इस बार कांग्रेस के मुखर सांसदों की संख्या कम हो गई है, दूसरे कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ही अपना इस्तीफा देने के बाद से खामोशी ओढ़ रखी है। सोनिया गांधी जरूर पहले की तरह सक्रिय हैं लेकिन वे कभी खुलकर नहीं बोलती हैं। हिंदी भाषी और बेहतर बोलने वालों का इस बार विपक्ष में भारी अभाव है। कहने के लिए करीब दो सौ गैर राजग सदस्य चुनाव जीते हैं लेकिन कांग्रेस के अलावा तृणमूल कांग्रेस और द्रमुक के सदस्य ही खुलकर सरकार का विरोध करते दिखते हैं। द्रमुक के हंगामे पर सरकार के रुख से लगता है कि वह उन्हें अपना घोषित विरोधी बनाए नहीं रखना चाहती है। हर बार द्रुमक के सवाल को सरकार मान लेती है या सफाई देने लगती है।

भाजपा और राजग के सहयोगी दलों के सदस्यों की संख्या पिछली बार से ज्यादा है। दूसरे नंबर पर कांग्रेस है लेकिन उसकी सीटें भी विपक्ष के नेता बनाने वाले दर्जा पाने वाले दल से तीन सीट कम है। अभी उनके सदस्यों की संख्या 52 है। दूसरे बड़े दलों में तृणमूल कांग्रेस और द्रमुक के अलावा बीजू जनता दल पहले ही दिन घोषित कर चुके हैं कि उनके सदस्य आसन के पास कभी नहीं जाएंगे।

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