AGMUT कैडर के सीनियर IPS मुकेश सिंह अब मणिपुर पुलिस की कमान संभालेंगे। वह अभी तक लद्दाख में तैनात थे। IIT ग्रेजुएट मुकेश सिंह इससे पहले उग्रवाद प्रभावित जम्मू-कश्मीर में अपनी सेवाएं दे चुके हैं।

द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, मुकेश सिंह को 90 के दशक के आखिर में अपनी पहली पोस्टिंग पुंछ के मेंडर में मिली। उस समय कारगिल में युद्ध चल रहा था और मेंडर में भारत और पाकिस्तान की सेनाएं LoC पर एक-दूसरे पर गोला-बारूद से प्रहार कर रही थीं। एक युवा IPS अधिकारी के लिए यह संघर्ष वाले इलाकों में पुलिसिंग की बहुत कठिन और सख्त शुरुआत थी।

इसके बाद तो मानों ‘संघर्षों’ से उनका नाता ही हो गया। बतौर IPS मुकेश सिंह ने अगले तीन दशक में भारत के लगभग हर बड़े सुरक्षा संकट में काम किया। उन्होंने कश्मीर में आतंकवाद, पीर पंजाल इलाके में सेना और पुलिस के अभियान, 26/11 मुंबई हमले के बाद बनी NIA की जांच, दिल्ली से हैदराबाद तक के आतंकी मामलों और जम्मू के पहाड़ों में बढ़ती हिंसा से जुड़े मामलों को संभाला।

अब मणिपुर में मिला नया ‘चैलेंज’

अब जब मणिपुर में नागा और कुकी समुदायों के बीच जातीय संघर्ष बढ़ता जा रहा है, तब केंद्र सरकार ने फिर से लंबे समय तक उग्रवाद और हिंसा से जुड़े हालात संभालने वाले IPS मुकेश सिंह पर भरोसा जताया हैं। 1996 बैच के IPS अधिकारी मुकेश सिंह 30 मई को मणिपुर के डीजीपी का पद संभालेंगे। केंद्र सरकार ने उन्हें ‘जनहित में विशेष मामले’ के तौर पर मणिपुर भेजने की मंजूरी दी है।

इस समय मणिपुर के हालातों से पूरा देश वाकिफ है। वहां जातीय हिंसा, हथियारबंद समूहों की गतिविधियां, सीमा पार से आने वाले उग्रवादी, नशे की तस्करी और पुलिस पर लोगों के कम भरोसे जैसी बड़ी समस्याएं बनी हुई हैं।

केंद्र को IPS मुकेश सिंह पर क्यों भरोसा?

केंद्र सरकार के लिए मुकेश सिंह एक ऐसे अधिकारी हैं, जिसने पहले भी कठिन और हिंसक हालात संभाले हैं। उन्हें आतंकवाद और उग्रवाद से निपटने, गुप्त जानकारी के आधार पर एक्शन लेने और अलग-अलग सुरक्षा एजेंसियों के साथ मिलकर काम करने का लंबा अनुभव है। यह पहचान उन्हें अपने करियर की शुरुआत में ही मिल गई थी।

मेंढर में पहली पोस्टिंग के बाद IPS मुकेश सिंह को साल 2022 में श्रीनगर शहर का एसपी सिटी बनाया गया। उस समय कश्मीर घाटी में आतंकवाद अपने चरम पर था और फिदायीन हमले बार-बार हो रहे थे। इसके बाद वह पूंछ भेजे गए, जहां इंडियन आर्मी ने ऑपरेशन ‘सर्प विनाश’ चलाया हुआ था। ऑपरेशन सर्प विनाश का मकसद पीर पंजाल के जंगलों में भारी हथियारों के साथ छिपे आतंकियों का खात्मा था।

यह आतंकवाद का सबसे बुरा दौर था। उस समय वहां उनके एक साल के कार्यकाल के दौरान 230 से ज्यादा आतंकवादी मारे गए। इसके बाद के सालों में मुकेश सिंह ने रेयासी, पुलवामा और जम्मू जिलों में काम किया।इस दौरान उनकी पहचान एक ऐसे अधिकारी के रूप में बनी, जो मैदान में रहकर काम करता था और आर्मी व केंद्रीय सुरक्षा बलों के साथ मिलकर उग्रवाद के खिलाफ अभियान चलाने में माहिर था।

NIA की शुरुआती टीम का हिस्सा

IPS मुकेश सिंह के करियर का सबसे बड़ा मोड़ 26/11 मुंबई आतंकी हमलों के बाद आया। केंद्र सरकार ने जब आतंकवाद से निपटने के लिए  NIA का गठन किया, तब मुकेश सिंह उसकी शुरुआती टीम का हिस्सा थे। उन्होंने NIA को खड़ा करने में मदद की। NIA में उनका पहला मामला पूर्वोत्तर भारत से जुड़ा था। यहां उन्होंने नॉर्थ कछार हिल्स इलाके में सक्रिय एक उग्रवादी संगठन की जांच की।

इसके बाद अगले कई सालों में मुकेश सिंह ने देश के कई हाई-प्रोफाइल टेरर केस हैंडल किए। इन मामलों में साल 2007 का समझौता एक्सप्रेस और मक्का मस्जिद धमाका केस शामिल हैं। उन्होंने साल 2010 में दिल्ली हाई कोर्ट धमाके से जुड़े केस की भी जांच की।

मुकेश सिंह के साथ करने वाले लोग उन्हें शांत स्वभाव और बहुत सोच-समझकर काम करने वाला जांच अधिकारी बताते हैं। उनके वरिष्ठ अधिकारी उन्हें ऐसा अफसर मानते हैं जो संतुलित तरीके से काम करता है और सिस्टम के साथ मिलकर चलना जानता है।

साल 2015 के आखिर में उन्हें दोबारा NIA में भेजा गया। इस दौरान उन्होंने पठानकोट, उरी, नगरोटा, सुनजवान सैन्य स्टेशन और 2019 के पुलवामा हमले की जांच की। कुल मिलाकर कहें तो यहां तक मुकेश सिंह फिल्ड में काम करने वाले अधिकारी के साथ-साथ आतंकी मामलों की जांच करने वाले अफसर के रूप में अपनी पहचान बना चुके थे। इसी अनुभव को देखते हुए वे जम्मू जोन में IG और फिर डीजीपी बनाए गए।

जम्मू में तैनाती के दौरान मिला ‘टफ चैलेंज’

उनकी पोस्टिंग के एक साल के अंदर ही जम्मू क्षेत्र में फिर से आतंकवादी गतिविधियां बढ़ने लगीं। अच्छी ट्रेनिंग पाए हुए आतंकवादी राजौरी, पूंछ, कठुआ, किश्तवाड़ और डोडा के घने पहाड़ी इलाकों में सेना की गश्ती टीमों को निशाना बनाने लगे। करीब 18 महीनों में, अधिकारियों और पैरा कमांडो सहित लगभग 50 सुरक्षाकर्मी घात लगाकर किए गए हमलों और मुठभेड़ों में मारे गए।

मुकेश सिंह के कार्यकाल में जम्मू में काम कर चुके एक सीनियर अधिकारी ने कहा कि वह एक कठिन समय था। हम लगातार नुकसान झेल रहे थे। लेकिन उस समय जम्मू पुलिस ने काफी अच्छी खुफिया जानकारी जुटाई थी। कई बार उसी जानकारी की वजह से सुरक्षाबल आतंकवादियों तक पहुंचने में सफल हुए थे।

सुरक्षा अधिकारियों का कहना है कि मुकेश सिंह के जम्मू से ट्रांसफर से पहले सुरक्षा एजेंसियों ने धीरे-धीरे हालात पर फिर से नियंत्रण पाना शुरू कर दिया। सेना और पुलिस के बीच बेहतर तालमेल, जंगलों में लड़ाई की बेहतर तैयारी, ऊंचे पहाड़ी इलाकों में ज्यादा तैनाती और लगातार खुफिया अभियानों की वजह से कई आतंकवादी मारे गए और घुसपैठ के नेटवर्क कमजोर पड़ने लगे।

जम्मू जोन में सांप्रदायिक शांति बनाए रखने में भी अहम भूमिका निभाई

मुकेश सिंह के साथ काम कर चुके अधिकारियों का कहना है कि उनका काम सिर्फ आतंकवाद-विरोधी अभियानों तक सीमित नहीं था। जम्मू-कश्मीर में काम कर चुके एक इंटेलिजेंस ब्यूरो अधिकारी के मुताबिक, उस समय जम्मू क्षेत्र के कुछ इलाकों में गुज्जरों और हिंदुओं के बीच तनाव बढ़ने लगा था। ऐसे हालात में मुकेश सिंह ने सांप्रदायिक शांति बनाए रखने में भी अहम भूमिका निभाई।

इस अधिकारी ने द इंडियन एक्सप्रेस को बताया कि उन्होंने उन सभी इलाकों का दौरा किया जहां तनाव था और सभी पक्षों से बात की। उन्होंने लोगों को समझाया कि शांति बनाए रखना सबसे ज्यादा जरूरी है। कई बार उन्होंने एलजी से यह भी कहा कि कुछ राजनीतिक दलों और संगठनों के कार्यक्रम या रैलियां रोक दी जाएं क्योंकि उनसे माहौल खराब हो सकता था।

बिहार के रहने वाले हैं मुकेश सिंह

बिहार के बेगूसराय के रहने वाले मुकेश सिंह को बहादुरी के लिए तीन पुलिस पदक और एक शेर-ए-कश्मीर बहादुरी पदक मिल चुका है।
उन्हें दो पुलिस पदक 2001 और 2003 में मिले थे। उस समय जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद अपने चरम पर था। तीसरा पुलिस पदक उन्हें 2021 में मिला।

जम्मू के बाद मुकेश सिंह को ITBP में भेजा गया। यहां वह अरुणाचल प्रदेश में भारत-चीन सीमा पर तैनात रहे थे। इसके बाद इस साल की शुरुआत में उन्हें लद्दाख का डीजीपी बनाया गया। अब उनका तबादला मणिपुर में हुआ है। यहां उन्हें फिर एक संघर्ष वाले इलाके में काम करना होगा। हालांकि, मणिपुर की स्थिति कश्मीर से काफी अलग मानी जाती है।

जम्मू-कश्मीर से अलग है मणिपुर

जम्मू-कश्मीर की तरह मणिपुर की समस्या सिर्फ आतंकवाद की नहीं है। वहां अलग-अलग समुदायों के लोग आपस में लड़ रहे हैं। जमीन को लेकर झगड़े हैं, कई लोगों के पास हथियार हैं, और समुदायों के बीच भरोसा टूट चुका है। यहां तक कि पुलिस पर भी अलग-अलग समुदाय पक्षपात करने का आरोप लगाते हैं।

सुरक्षा व्यवस्था से जुड़े कई लोगों का मानना है कि ऐसे मुश्किल हालात संभालने के लिए मुकेश सिंह जैसे अधिकारी की जरूरत है। उन्हें सेना, खुफिया एजेंसियों और केंद्रीय सुरक्षा बलों के साथ मिलकर काम करने और हिंसा व उग्रवाद से निपटने का लंबा अनुभव है। हालांकि इसके उलट उनके आलोचकों को डर है कि अगर मणिपुर में ‘कश्मीर मॉडल’ अपनाया गया तो वहां पहले से मौजूद हिंसा और लोगों के विस्थापन की समस्या और बढ़ सकती है।

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13 मई 2026 को मणिपुर के कुकी और नागा समुदायों के बीच तनाव के चलते दोनों पक्षों के दर्जनों ग्रामीणों का अपहरण कर उन्हें बंधक बना लिया गया था। दिनभर चले गतिरोध के बाद, दोनों पक्षों ने 15 मई की सुबह 14-14 बंधकों को रिहा कर दिया था। पूरी खबर पढ़ने के लिए क्लिक करें