दिल्ली में धूल वायु प्रदूषण की एक सबसे बड़ी वजहों में से एक है। दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम के पास में ही एक छोटी सी पार्किंग वाली जगह से सड़क साफ करने वाली मशीनें शाम होते ही निकल पड़ती हैं, इन मशीनों में सात बड़ी मैकेनिकल रोड स्वीपिंग मशीन (MRSMs) होती हैं।

इंडियन एक्सप्रेस ने इन मशीनों के द्वारा दिल्ली की दो रास्तों पर सड़कों की सफाई कैसे होती है, इसे देखा। एक रास्ता स्टेडियम के पास एमसीडी डॉक से शुरू हुआ। दूसरा रास्ता लगभग 70 किलोमीटर लंबा था और यह नजफगढ़ जोन से होकर गुजरता था।

रात करीब 9 बजे स्टेडियम वाले इलाके में पीएम 2.5 का स्तर काफी ज्यादा बढ़ गया और हवा की गुणवत्ता बेहद खराब हो गई। सुपरवाइजर ने बताया कि जब प्रदूषण का स्तर बहुत ज्यादा बढ़ जाता है तो काम करना मुश्किल हो जाता है और ऐसे हालात में कर्मचारियों को मास्क पहनना जरूरी होता है।

रात करीब 10 बजे मशीन (रूट कोड HQEM_HQEM_4498) डॉक से निकलकर मां आनंदमयी मार्ग पर आ जाती है। मशीन के नीचे लगे ब्रश लगे हुए हैं जो सड़क की सतह तक जाते हैं, इसके बाद सक्शन पाइप धूल को मशीन के कंटेनर में खींच लेते हैं और फिर पानी का छिड़काव होता है जिससे धूल फिर से ना उड़ सके।

सड़कों की सफाई में लगती है काफी मेहनत

सड़कों की सफाई का यह काम बेहद मेहनत भरा है और इसमें कई कर्मचारियों की जरूरत पड़ती है। MRSMs मशीनें जब चलती हैं तो इसकी रफ्तार 8 किलोमीटर प्रति घंटा होती है।

सफाई कर्मी सरवन और सुपरवाइजर मशीन के केबिन से उतरकर गाड़ी के साथ चलते हैं और इस दौरान वह ब्रश पर नजर रखते हैं और सड़क की कंडीशन का भी ध्यान रखते हैं। मशीन के आगे एक फावड़ा लगा होता है, अगर किसी जगह पर धूल को नहीं उठाया जा सकता तो सरवन इसे हाथों से उठाते हैं।

सरवन बताते हैं, “हम लगभग 30 किमी पैदल चलते हैं और कभी-कभी लगभग 8 किमी तक वाहन में बैठते हैं। ठंड और गर्मी में हमें चेहरा ढककर ही काम करना पड़ता है।” हर MRSMs को एक ड्राइवर, एक सफाईकर्मी और एक सुपरवाइजर की जरूरत होती है। काम करने वाले कर्मचारियों के चेहरे मास्क से ढके होते हैं लेकिन उनके पास विशेष सुरक्षा उपकरण नहीं होते।

कई जगहों पर ट्रक, बसें और दूसरी गाड़ियां चलती रहती हैं, जिससे धूल फिर से उड़ने लगती है। सुपरवाइजर कहते हैं, “मशीन के काम करने की क्षमता सड़क की गुणवत्ता पर निर्भर करती है। सड़क जितनी अच्छी होगी, मशीन उतनी ही बेहतर सफाई करेगी।”

हर रात 50 से 70 किमी. तक चलती है मशीन

टूटी हुई सड़कों और निर्माण काम की वजह से मुश्किल पैदा होती है। दिल्ली के पर्यावरण विभाग के अनुसार, एक मशीन रात में 50 से 70 किलोमीटर तक चलती है, इसमें से लगभग 35 किलोमीटर सड़क की सफाई ढंग से होती है।

कुछ वक्त ट्रैफिक में आगे बढ़ने, मैन्युअल सफाई के लिए रुकने और डंपिंग साइट्स तक जाने में निकल जाता है।

1,200 किलोग्राम धूल होती है इकट्ठा

इसके बाद मशीन मां आनंदमयी मार्ग और कालकाजी मंदिर से, गोविंदपुरी, कालकाजी बस डिपो, इंदिरा कल्याण विहार, ईएसआई अस्पताल और आसपास के औद्योगिक इलाकों में जाती है। लगभग रात 2 बजे तक, यह ओखला लैंडफिल साइट तक पहुंचती है और एक पूरा चक्कर लगा लेती है। इस चक्कर में 1,200 किलोग्राम धूल इकट्ठा होती है। सरवन कहते हैं, “इकट्ठा की गई धूल आमतौर पर इससे ज्यादा होती है।”

जैविक कचरे से बनाते हैं खाद

एमसीडी के जूनियर इंजीनियर चंद्रशेखर लैंडफिल साइट में आगे की प्रक्रिया के बारे में बताते हैं। चंद्रशेखर कहते हैं, “यहां लाई गई धूल और ढीली मिट्टी को जमा किया जाता है और फिर जेसीबी और दूसरी भारी मशीनों की मदद से इससे समतल करते हैं। इस पर रास्ते बनाए जाते हैं।”

जब यह धूल नगरपालिका के कचरे में मिल जाती है तो उसे बायो-रिमेडिएशन के लिए भेजा जाता है। यहां कचरे को अलग करके दोबारा इस्तेमाल किया जाता है और जैविक कचरे से खाद बनाई जाती है।”

घर पर पत्नी-बेटी होती हैं परेशान

तीन-चार साल से MRSMs वाहन चला रहे 35 साल के यासीन कहते हैं, “जब मैं घर पहुंचता हूं, तो मेरी हालत ऐसी होती है जैसे मैं बेहोश हो गया हूं। आठ घंटे की रात की शिफ्ट में मुश्किल से दस मिनट का आराम मिलता है। गाड़ियां हर दिन चलती हैं। हम खांसी-जुकाम से जूझते हैं और अपना चेहरा ढकने की कोशिश करते हैं।” घर पर यासीन की पत्नी और सात साल की बेटी इंतजार कर रही होती हैं। यासीन कहते हैं, “जब प्रदूषण और सर्दी सबसे ज्यादा होती है और मुझे काम पर जाना पड़ता है, तो वे बहुत परेशान हो जाते हैं।”

दूसरी ओर, दिल्ली के नजफगढ़ जोन में हालात और भी गंभीर हैं। रात 10 बजे, द्वारका सेक्टर 3 से पांच MRSMs गाड़ियों का एक काफिला रवाना होता है। पहले सात गाड़ियां थीं, जिनमें से दो को सेंट्रल जोन में भेज दिया गया है।

इंडियन एक्सप्रेस ने गोयला डेयरी से दीनपुर गांव, झटीकरा मोड़, छावला नाला, रोशनपुरा और छावला स्टैंड होते हुए एक MRSMs वाहन (रूट कोड MCD_MCD_3535_M) को ट्रैक किया। यहां का रास्ता बहुत खराब था।

यहां पर वाहन के ड्राइवर अमित ने अपने सुपरवाइजर से फोन पर कहा, “आज यह रास्ता बहुत खराब है।” सड़क का एक किनारा स्थानीय वेंडरों और गाड़ियों ने घेरा हुआ था। बीच में गायें प्लास्टिक की थैलियों में खाना खा रही थीं।

डेयरी होने के कारण होती है गंदगी

सफाई इंस्पेक्टर को बार-बार नीचे उतरकर गायों को हटाना और गोबर साफ करना होता है। एमसीडी के सुपरवाइजर धर्मवीर कहते हैं, “हम रात 10 बजे के बाद आते हैं ताकि ट्रैफिक कम हो जाए लेकिन कई बार सड़क जाम हो जाती है। पास में डेयरी होने के कारण यह यहां का सबसे गंदा इलाका है।” भूसा ले जाने वाले बड़े ट्रक रात भर गुजरते हैं और रास्ते में गंदगी गिराते रहते हैं।

मशीन के अंदर बैठे अमित को बार-बार ब्रश चालू और बंद करना होता है क्योंकि कचरा मशीन में फंस जाता है। जब कचरा ज्यादा जमा हो जाता है, तो सफाई कर्मचारी उसे हाथ से निकालते हैं।

धर्मवीर बताते हैं कि पास में सड़कें कच्ची हैं और इस वजह से धूल को साफ करना बहुत मुश्किल होता है। वह कहते हैं, “हम सड़क को कितना भी चमकाने की कोशिश कर लें, धूल देर-सवेर वापस आ ही जाती है।” पूरे रास्ते, तीनों लोग व्हाट्सएप ग्रुप पर लगातार अपडेट देते रहते हैं।

दिल्ली में कहां-कहां हो रही मशीनों से सड़क सफाई?

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